जाति की संकल्पना - Concept of Caste
जाति की संकल्पना - Concept of Caste
जाति (Cast) सामाजिक विज्ञान से जुड़ी एक अवधारणा है। उसका नामकरण भारत पर नज़र डालने वाले पश्चिमियों ने औपनिवेशिक काल के प्रारंभिक दौर में किया था। कुछ विद्वान भारतीय जाति व्यवस्था को भारतीय संस्कृति को परिभाषित करने वाला एक मुख्य कारक मानते हैं। जाति को समझने के लिए विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई जाति की परिभाषाओं को देखेंगे साथ ही जाति की विशेषताएं एवं उत्पत्ति को भी देखेंगे।
सर हरबर्ट रिजले ने जाति को परिभाषित करते हुए लिखा है, जाति ऐसे परिवारों का समुच्चय है जिनके नाम एक से हों, जो एक ही वंश से संबंध रखते हों जिनके मिथकीय काल्पनिक पूर्वज चाहे वे मानवीय हो या अलौकिक, एक ही हो, जो एक ही पदानुक्रम व्यवस्था का पालन करते हो तथा जिसका अनुपालन ऐसे लोग करते हो, जो एक जातीय समुदाय का निर्माण कर सकने में सक्षम हो।" सी. एच. कुले ने जाति को परिभाषित हुए कहा है कि "जब एक वर्ग विशेष मुख्य रूप से वंशागत पदानुक्रम व्यवस्था पर आधारित हो तो हम उसे जाति का नाम दे सकते हैं।
रॉबर्ट वीरस्टीड ने जाति प्रथा की एक सामान्य परिभाषा देते हुए लिखा है जब वर्ग प्रथा का ढांचा एक या एक से अधिक विषयों पर पूर्णतया बंद होता है तो उसे जाति प्रथा कहते हैं।"
मैकाइवर एवं पेज के जाति के संबंध में विचार है कि जब प्रस्थिति (Stutis) पूर्वनिश्चित तथा लोगों को इसमें सुधार की कोई संभावना नज़र न आए तब वर्ग जाति का रूप धारण कर लेता है।" श्री केतकर ने इसे परिभाषित करते हुए लिखा है, जाति एक सामाजिक समूह है जिसकी दो विशेषताएँ हैं. एक जाति की सदस्यता उन व्यक्तियों तक सीमित है, जो कि जाति विशेष के सदस्यों से ही पैदा हुए हैं और इस प्रकार उत्पन्न होने वाले सभी व्यक्ति जाति में आते हैं, दो जिसके सदस्य एक अविछिन्न सामाजिक नियमों के द्वारा अपने समूह के बाहर विवाह करने से रोक दिए गए हैं।"
उपरोक्त विवेचनाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि जाति मुख्यतः जन्म के आधार पर सामाजिक संस्तरण और खंड विभाजन की वह गतिशील या कुछ प्रतिबंधों को अपने सदस्यों पर लागू करती है। उक्त विद्वानों की परिभाषाओं से जाति प्रथा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत है-
श्री एन. के दत्ता ने जाति प्रथा की छह विशेषताओं का उल्लेख किया है -
1) एक जाति के सदस्य जाति के बाहर विवाह नहीं कर सकते।
2) प्रत्येक जाति में दूसरी जातियों के साथ खाने-पीने के कुछ-न-कुछ प्रतिबंध होते हैं।
3) अधिकांश जातियों के पेशे निश्चित होते हैं।
4) जातियों में ऊँच-नीच का संस्तरण है जिसमें ब्राह्मण जाति की स्थिति सर्वमान्य रूप से सबसे ऊपर है।
5) जन्म ही एक व्यक्ति की जाति को जीवन पर्यंत निश्चित करता है, केवल जाति से नियमों को तोड़ने
पर उसे जाति से बहिष्कृत किया जा सकता है, एक जाति से दूसरी जाति में जा नहीं
6) समस्त व्यवस्था ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा पर निर्भर है।
डॉ. घुर्ये ने जाति-प्रथा की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख किया हैं -
1) समाज का खंडात्मक विभाजन
2) भोजन और सामाजिक सहवास पर प्रतिबंध
3) संस्तरण
4) पेशों के अप्रतिबंधित चुनाव का अभाव
5) विभिन्न जातियों की सामाजिक और धार्मिक निर्योग्यताएँ तथा विशेषाधिकार एवं
6) विवाह संबंधी प्रतिबंध
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