अन्य पिछड़े वर्ग की संकल्पना - Concept of Other Backward Classes

अन्य पिछड़े वर्ग की संकल्पना - Concept of Other Backward Classes

अन्य पिछड़ा वर्ग किसे माना जाता है उनकी ऐतिहासिक पृष्टभूमि क्या है और साथ ही उनके विकास के लिए किए गए प्रयासों के बारे में जानेंगे 'पिछड़ा वर्ग' (Backward Classes) एक ऐसा ही शब्द है, जिसके अंतर्गत अनुसूचित जनजाति अनुसूचित जाति एवं वैसी तमाम जातियाँ आती हैं, जो शैक्षणिक एवं आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए हैं तथा हिंदू धर्म व्यस्था में द्विज की श्रेणी में नहीं आते हैं। वैसे ही लोगों के लिए राजनीतिक कारणों से उन्हें दलित कहकर पुकारा गया है और ब्राह्मणवादी व्यवस्था पर प्रहार किया गया है, लेकिन वर्तमान समय में पिछड़ा वर्ग' शब्द ने तीन खंडों में विभक्त होकर विशिष्ट अर्थ को प्राप्त किया, जैसे अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)

पिछड़ा वर्ग तथा अन्य पिछड़ा वर्ग एक-दूसरे के पर्यायवाची नहीं है। अन्य पिछड़ा वर्गOBC) पिछड़ा वर्ग (BC) का एक छोटा-सा हिस्सा है। आरक्षण का प्रावधान आने के बाद अन्य पिछड़े वर्ग को दो भागों में विभक्त किया गया है Creamy Layer Non-Creamy Layer OBC अन्य पिछड़ा वर्ग भारतीय समाज का सबसे बड़ा पटक है, जो राजनैतिक, शैक्षणिक और आर्थिक दृष्टि से कमजोर और उपेक्षित है। सामाजिक वैज्ञानिकों ने अनुसूचित जातियों और जनजातियों का काफ़ी अध्ययन किया, लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग तबका उपेक्षित रहा। पिछड़े वर्ग' शब्द का संदर्भ पहले 1917-18 में प्रचलित हुआ। 1930 31 में इसका उपयोग विशिष्ट रूप से किया गया था। 1937 में बावनकोर राज्य में शैक्षणिक दृष्टि से सभी पिछड़े समुदाय के लिए पिछड़े वर्ग शब्द का प्रयोग हुआ। भारत का संविधान भारतीय समाज में तीन 'पिछड़े' अगों को मान्यता देता है अनुसूचित जातिया अनुसूचित जनजातियाँ तथा अन्य पिछड़े वर्ग आरंभ से ही प्रथम दो श्रेणियों पर कोई मतभेद नहीं रहा है लेकिन तीसरी श्रेणी अस्पष्टता से घिरी रही है। आम तौर पर यह माना गया है कि इस श्रेणी में मध्य स्तर की उन सभी जातियों को रखा जा सकता है. जिनकी सामाजिक प्रस्थिति अनुसूचित जातियों से ऊपर है।

सरल तथा लोकप्रिय अर्थों में अगड़े के अंतर्गत ब्राह्मण तथा क्षत्रिय वर्ण से निकली हुई जातियाँ आती हैं, जिन्हें द्विज' भी कहा जाता है। इस श्रेणी में उत्तर भारत के कायस्थ, बंगाल के वैद्य और केरल के नायर भी आर्थिक राजनीतिक तथा प्रशानिक शक्ति प्राप्त करके शामिल हो गए। इसके विपरीत पिछड़े वर्ग के अंतर्गत अस्पृश्य जातियों को छोड़कर उन सभी निम्न जातियों को शामिल किया जा सकता है, जिनका (राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक) शक्ति स्रोता पर अधिकार नहीं रहा है। अनुसूचित जातियां तथा अनुसूचित जनजातियां संविधान की सूची में शामिल है। इस प्रकार गैर द्विज, गैर-अनुसूचित जातिया जो संविधान में सूचित नहीं है अन्य पिछड़े वर्गों के अंतर्गत रखी जा सकती है इस जनसंख्या में लगभग 3,700 जातियां रखी जा सकती है। संविधान निर्माताओं ने भारतीय जनसंख्या के इस पिछड़े अंग को जातियों के रूप में नईबल्कि वर्गों के रूप में वर्णित किया है। इसके कई कारण हो सकते हैं। पहला कारण शायद ऐतिहासिक प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है।

आजादी के पहले दलित वर्ग (Depressed Classes) का प्रयोग सभी निम्न व वंचित जातियों के लिए किया जाता था, जिनमें अस्पृश्य जातियां (वर्तमान की अनुसूचित जातियां भी सम्मिलित थी। दूसरा यह कारण हो सकता है कि आधुनिक भारत के निर्माताओं व ग्रहरियों के लिए जातिCaste) शब्द रूढ़िवादिता से जुड़ा हुआ था इसलिए वे जाति की अवधारणा के पोषण को हतोत्साहित करना चाहते थे। तीसरा कारण भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है चूंकि अनुसूचित जातियों की श्रेणी में केवल हिंदू अस्पृश्य जातियों को ही शामिल किया गया था और उसके समक्ष मुस्लिम व ईसाई दलित जातियाँ छूट गई थी।


इसलिए इस अन्याय को सुधारने के लिए ऐसी गैर हिंदू जातियों को किसी तीसरी श्रेणी में ही शामिल किया जा सकता था। चूंकि मुस्लिम व ईसाई समाजों में जाति को सामाजिक धार्मिक मान्यता नहीं है, इसलिए ऐसी पिछड़ी जातियों के लिए 'जाति' शब्द का इस्तेमाल न करके वर्ग' का प्रयोग किया गया, जिसमें ऐसी सभी हिंदू मुस्लिम सिख व ईसाई धर्म की पिछड़ी जातियों को शामिल कर लिया गया। गैर-द्विन, मध्य स्तर की या निम्न जातियाँ (अनुसूचित जातियों को छोड़कर भी जाति व्यवस्था का शिकार रही हैं। ऐसी अधिकतर पिछड़ी जातियाँ दस्तकार (artisans) या छोटे कृषक हैं गरीबी व वंचन की मार सहते हुए इनका जीवनयापन होता रहा है। मोटे तौर पर अन्य पिछड़े वर्गों को दो प्रकार की पिछड़ी जातियों में बांटा जा सकता है।

पहली श्रेणी में पिछड़ी कृषक जातियाँ रखी जा सकती हैं जबकि दूसरी में दस्तकार या शिल्पकर जातिया, जैसे अनुकर बढ़ई, लोहार सुनार आदि आती है। यद्यपि जनसंख्या दृष्टि से ऐसी कृषक जातियाँ 60-70 प्रतिशत से अधिक हैं, लेकिन उनमें अधिकतर कृषकों के पास छोटी जोतें हैं या वे बटाईदार व खेतिहर मजदू रहें। इस प्रकार पहली श्रेणी की पिछड़ी जातियों की अर्थव्यवस्था कृषि पर ही निर्भर है। उत्तर प्रदेश, बिहार की यादव व कुम जैसी जातियों व दूसरे क्षेत्रों में भी कुछ ही पिछड़ी जातियों के पास अच्छी मात्र में भूमि है। दस्तकार पिछड़ी जातियों की स्थिति अधिकतर दयनीय है। बढ़ते हुए औद्योगीकरण एवं मशीनीकरण के कारण उनकी पारंपरिक कलाएं विनाश के कगार पर पहुँच चुकी हैं। बुनकरों कुम्हारों, बढ़ई मछुआरे व मल्लाह, लोहार, सब्जी बेचने वाले मास बेचने वाले तथा अनेकों ऐसी जातियों की स्थिति संपूर्ण ग्रामीण भारत में अच्छी नहीं है। शैक्षिक वंचन ने स्थिति को और खराब किया है।


संगठित औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वालों को आसान ऋण संसाधनिक समर्थन और करदाताओं की कीमत पर अनेकों को लाभ व सुविधाएं उपलब्ध है लेकिन दस्तकार पिछड़ी जातियों के लिए राज्य समर्थित प्रयास बहुत कम व कमजोर रहे है। इन हालात के परिणामस्वरूप यह कमजोर वर्ग गरीबी व वंचन की चक्की में पिस रहा है। देश के विभिन्न क्षेत्र में किए गए सर्वेक्षणों व अध्ययनों से पता चला है कि अन्य पिछड़े वर्गों की पहुँच रोजगार व शिक्षा में बहुत कम है इनमें साक्षरतावर निम्न स्तर की है और यह चिरकालिक ऋण से ग्रस्त रहे हैं। इनमें ऋणग्रस्तता की ऊंची दर फैली हुई निरक्षरता व शिक्षा, गरीबी व सामाजिक प्रथाओं के द्वारा भी समझी जा सकती है।


जाति व्यवस्था नामक सामाजिक वर्गीकरण के एक रूप के सदियों से चले आ रहे अभ्यास के परिणामस्वरूप भारत अनेक अंतर्विवाही समूहों या जातियों और उपजातियों में विभाजित है। आरक्षण नीति के समर्थकों का कहना है कि परंपरागत रूप से चली आ रही जाति व्यवस्था में निचली जातियों के लिए पोर उत्पीड़न और अलगाव है और शिक्षा समेत उनकी विभिन्न तरह की आजादी सीमित है।