दिव्यांग का अवधारणा - The Concept of Special Persons

विशेष योग्यजन का अवधारणा - The Concept of Special Persons

अल्बर्ट आइंस्टाइन की सीखने की क्षमता कम थी फिर भी उन्होंने सापेक्षता का सिद्धांत विकसित कर दिया, जिसने आज दुनिया को देखने और समझने के लोगों के दृष्टिकोण पर बहुत प्रभाव डाला। धामस अल्वा एडिसन ऊचा सुनते थे लेकिन जिस आधुनिक दुनिया में हम रह है उसके निर्माण में उसके आविष्कार बिजली जितना योगदान किसी और चीज़ ने नहीं किया। लुई ब्रेल देख नहीं सकते थे किंतु उनके ही नाम से प्रसिद्ध उनकी रचना ब्रेल ने दुनिया भर के नेत्रहीन लोगों को पढ़ने और लिखने की क्षमता दी। इन लोगों ने सिद्ध किया कि किसी की अक्षमता नहीं, बल्कि क्षमता महत्वपूर्ण होती है। भारत में वर्ष 2001 से 2011 के बीच विशेष योग्यजनों की संख्या 22.4 प्रतिशत बढ़ गई है। 2001 में 2.19 करोड़ विशेष योग्यजन थे जो वर्ष 2011 में 2.68 करोड़ हो गए, जिनमें 1.5 करोड़ महिलाएं थीं। विशेष योग्यजनों की संख्या में वृद्धि की दर शहरी क्षेत्रों में एवं शहरी महिलाओं में अधिक है। समूचे दशक के दौरान शहरी क्षेत्रों में 48.2 प्रतिशत और शहरी महिलाओं में55 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई। अनुसूचित जातियों में विशेष योग्यजनों की वृद्धि दर 2.45 प्रतिशत है। ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष योग्यजनों की कुल संख्या 1.8 करोड़ से अधिक है और शहरों में केवल 81 लाख है। पुरुषों में 2.41 प्रतिशत तथा महिलाओं में 2.01 प्रतिशत विशेष योग्यजन हैं ( 2011 की जनगणना)

1895 में मानसिक रूप से विकलांगता के लिए रिटार्डेड (मंदबुद्धि शब्द का प्रयोग मिलता है ऐसा कहा जाता है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कुछ पेशेवरों ने इस शब्द के उपयोग को हतोत्साहित करने के प्रयास किए। रिटाडेंड लॅटिन भाषा के रिटार्डेयर शब्द से आया है, जिसका अर्थ धीमी गति से, देरी से, पीछे की ओर या बाधा होता है। उसके बाद मानसिक विकलांगता शब्द का प्रयोग किया जाने लगा। इस समय में मानसिक विकलांगता शब्द का उपयोग नैदानिक शब्द के रूप में होता था जो मानसिक कामकाज के अतार्किक श्रेणियों के समूह की ओर संकेत करता है जैसे मूर्ख हीन बुद्धि और 'बेवकूफ' इसे प्रारंभिक सुद्धि परिक्षण के जरिए तय किया जाता था विकलांगता शब्द का प्रयोग बेवकूफ, मूर्ख, हीनबुद्धि जैसे शब्दों की जगह इस्तेमाल किया गया जाने लगा क्योंकि उस समय तक वह अपमानजनक शब्द नहीं माना गया था। हालांकि 1960 तक इस शब्द का उपयोग आंशिक रूप में अपमानजनक अर्थ में होने लगा था। वर्तमान में विकलांगता शब्द का उपयोग समाज में नकारात्मक संकेतार्थ के रूप में प्रतिबिंबित होने लगा है। इस कारण 2010 से विकलांगता शब्द का प्रयोग सरकारी तथा गैर-सरकारी संस्थानों में और अन्य जगहों पर खत्म करने का प्रयास अंतरराष्ट्रीय सांठन और राष्ट्रीय संगठन कर रहे हैं।


आज 'विकलांग' शब्द धीरे-धीरे 'विशेष योग्यजन', 'चुनौती ग्रस्त', 'विकासात्मक देरी' जैसे नए शब्दों द्वारा प्रतिस्थापित किया जा रहा है। व्यक्ति किसी भी स्थान पर हो किसी भी उम्र का हो, स्त्री हो या पुरुष हो अथवा विकलांग या विशेष योग्यजन हो, प्रत्येक की एक जीवन योजना है, एक उद्देश्य है, एक मूल्य है। यह स्वीकार करने की आवश्यकता है कि विशेष योग्यजन व्यक्ति सर्वाधिक प्रेरणास्पद व्यक्ति होते हैं। विशेष योग्यजन कहने से सम्मानपूर्ण प्रोत्साहित, आनंदमय प्रेरणादायी वातावरण सृजन करने का और उनके पास सामान्य व्यक्तियों से अलग क्षमता या विशेष योग्यता होने का अर्थबोध होता है, जो उन्हें आत्मविश्वास की भावना का विकास एवं कौशल्य विकास में सहायता देता है। विशेष योग्यजन शब्द से तात्पर्य क्या है? जब किसी बालक को सीखने समझने में विशेष समस्या उत्पन्न होती है तो वह बालक विशेष योग्यजन कहलता है। यदि कोई बालक सामान्य बच्चों की तरह देख नहीं सकता है, तो वह दृष्टिहीन विशेष योग्यजन कहलाएगा। इसी प्रकार विशेष योग्यजन मानसिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक अथवा शैक्षिक क्षेत्र में रेखांकित किए जा सकते हैं। जिन बच्चों में कोई भी विशेष योग्यता पाई जाती है, वह विशेष योग्यजन कहलाता है। विशेष योग्यजन बच्चों का व्यवहार, स्वभाव और शारीरिक संरचना प्रायः स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। विशेष योग्यजन एक ऐसी अवस्था है जो किसी भी व्यक्ति को किसी भी आयु में उसके सामान्य व्यवहार कार्य शक्ति, विचार एवं भाषा को प्रभावित कर शारीरिक, मानसिक, समाजिक एवं भावात्मक असंतुलन पैदा कर देती हैं।


विशेष योग्यजन वे है कि जो अपनी व्यक्तिगत, शरीरिक, मानसिक और सामाजिक सीमाओं और परिस्थितियों के कारण अपना जीवन सामान्य रूप से बिताने में असमर्थ है। वास्तवतः वे अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के कारण अपना सामान्य जीवन बिना किसी सहायता के नहीं बिता सकते और इस प्रकार असंतुलन एवं असामंजस्य उनके जीवन की विकट समस्याएं बन जाती है। उनका व्यवहार एवं सामाजिक प्रकार्यात्मकता दूषित और कठिन हो जाती है और वे समान पर भार बन जाते हैं के विकासशील, सजग और प्रजातांत्रिक समाज उनके विकास और पुनर्गठन के उत्तरदायित्व से अपने आपको अलग नहीं रख सकता।


विशेष योग्यजन समाज के उतने ही अनिवार्य अंग हैं जितना स्वस्थ व्यक्ति उनके उत्थान या विकास एवं पुनर्वास हेतु प्रयत्न करना हमारा नैतिक कर्तव्य है। यहदेखा गया है कि अधिकांश मामलों में अशक्त व्यक्तियों में सामान्य जीवन जीने की इच्छा तथा जीवन के प्रति उत्साह होता है और केवल यह प्रमाणित करने के लिए अवसर की प्रतीक्षा होती है कि वह भी अपने सुपुर्द कार्यों को उतने ही प्रभावी ढंग से पूरा कर सकते हैं, जैसे अन्य सामान्य व्यक्ति थोडी सी सहायता से अशक्त व्यक्ति अपने दुर्भाग्य पर विजय पा सकते हैं। उनके कौशल एवं उनकी प्रतिभाओं का उपयोग राष्ट्र निर्माण की गतिविधियों के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। अतएव उनमें आत्मविश्वास की भावना का विकास किया जाना चाहिए, ताकि वे भी जीवन की मुख्यधारा में सम्मिलित हो सकें।