अन्य पिछड़ा वर्ग के संवैधानिक प्रावधान - Constitutional Provisions of Other Backward Classes

अन्य पिछड़ा वर्ग के संवैधानिक प्रावधान - Constitutional Provisions of Other Backward Classes

भारतीय संविधान में प्रस्तावना के जरिए भारतीय गणतंत्र को अपने नागरिकों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, आजादी, समानता और भ्रातृत्व सुनिश्चित करने के उद्देश्य की प्राप्ति की परिकल्पना की गई है। यह सामाजिक न्याय के इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अनुसरण की जाने वाली रीतिविधान भी प्रतिपादित करता है।


अनुच्छेद 14- राज्य को किसी व्यक्ति की कानून के समक्ष समानता या कानून की समान रक्षा की मनाई


नहीं करने का आदेश देता है। समानता के अधिकार के सिद्धांत को अनुच्छेद 15 से 18 में सकारात्मक और स्वीकारात्मक शब्दों में पुनः दुहराया गया है।


अनुच्छेद 15- किसी नागरिक से विभेद नहीं करने पर विचार करता है और अनुच्छेद 15 के खड़ (5) के तहत राज्य को शैक्षिक संस्थानों में प्रवेश के मामले में नागरिकों के किसी सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की उन्नति के लिए कानून द्वारा विशेष प्रावधान करने की शक्ति दी गई है।


अनुच्छेद 16- द्वारा आम रोजगार के मामले में अवसर की समानता घोषित करने का विशेष ध्यान रखा गया है। इस अनुच्छेद का खंड(1) घोषित करता है कि राज्य के अधीन किसी कार्यालय में रोजगार या नियुक्तियों के मामले में इस देश के सभी नागरिकों को समान अवसर होगा। इसी के साथ खं4) घोषित करता है कि उक्त अनुच्छेद में कुछ भी राज्य को नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए कोई प्रावधान बनाने से नहीं रोकेगा जिसका राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं


में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। अनुच्छेद 46 समाज के कमजोर वर्गों के शैक्षिक व आर्थिक हित को संदर्भित करता है। अनुच्छेद 15 के खंड (5) और अनुच्छेद 16 के खंड (4) के अंतर्गत राज्य सरकारें भी आयोग की नियुक्त


करके विभिन्न पिछड़ी जातियों की आर्थिक और शैक्षिक समस्याओं की जानकारी ले सकती है। ऐसे आयोगों की रिपोर्ट के आधार पर शैक्षिक संस्थाओं और सरकारी संस्थाओं में आरक्षण लागू कर सकती है। चूंकि पिछड़ेपन की कसोटियाँ विभिन्न राज्यों में भिन्न भिन्न है, इसलिए पिछड़ेपन को मापने का कोई अखिल भारतीय मापदंड नहीं है।