अनुसूचित जाति की संवैधानिक स्थिति - Constitutional Status of Scheduled Castes
अनुसूचित जाति की संवैधानिक स्थिति - Constitutional Status of Scheduled Castes
'अनुसूचित जाति (Scheduled Caste) मूलत: एक संवैधानिक संकल्पना है। ब्रिटिश सरकार ने इसका पहली बार प्रयोग 1935 के भारत सरकार अधिनियम में किया था। अप्रैल 1936 में ब्रिटिश सरकार ने भारत सरकार (अनुसूचित जाति आदेश जारी किया था जिसमे असम, बंगालु बिहार, मुंबई मध्य प्रांत उड़ीसा, पंजाब और संयुक्त प्रांत के तत्कालीन प्रांतों की कुछ जातियों, वर्गों व जनजातियों को 'अनुसूचित विनिर्दिष्ट किया गया था। इसके पहले ये जातियाँ दलित वर्ग (Depressed Classes) कहलाती थी।
1931 की जनगणना के अनुसार आगे दिए गए मानकों के आधार पर पहचान की गई ऐसे वर्ग, जिन्हें ब्राह्मणों, नाइयों, भिस्तियों, दर्जियों और ऐसी ही अन्य सेवाओं से वंचित किया गयासाथ ही, जिन्हें हिंदू मंदिरों और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं जैसे सड़कों, नौकाओं, कुओं अथवा विद्यालयांक प्रयोग से वंचित किया गया और अस्पृश्य के मानदंड के आधार पर सुव्यवस्थित ढंग से वर्गीकृत किया गया था। 1936 में जारी की गई अनुसूचित जातियों की सूची दलित वर्गों की पहली सूची जैसी ही थी। 1950 में, जो सूची बनाई गई वह पहली सूची में परिवर्धन करके बनाई गई।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 में किसी राज्य अथवा केंद्र शासित प्रदेशों में अनुसूचित रहने वाली जातियों को परिभाषित किया गया है। तत्संबंधित संवैधानिक प्रावधान निम्नवत है अनुच्छेद 341 (1) राष्ट्रपति किसी राज्य अथवा केंद्र शासित प्रदेश के संबंध में और जहां यह राज्य है में राज्यपाल के परामर्श से सार्वजनिक अधिसूचना द्वारा जातियों वर्गों अथवा जनजातियों या जातियों, वर्गों अथवा जनजातियों के हिस्सों या जाति के भीतर कुछ समूहों को इस संविधान के प्रयोजन से संबंद्ध राज्य अथवा केंद्र शासित प्रदेश जो भी लागू हो, के संबंध में अनुसूचित जाति घोषित कर सकते हैं।
अनुच्छेद 341 (2) संसद कानून बनाकर इस अनुच्छेद की धारा (1) के अंतर्गत जारी किसी अधिसूचना में निर्दिष्ट अनुसूचित जातियों की सूची में किसी जाति, वर्ग अथवा किसी जाति के अंतर्गत किसी हिस्से या समूह को शामिल या उससे निकाल सकती है। किंतु उपरोक्त धारा के अधीन जारी किसी भी परवर्ती अधिसूचना से अलग नहीं होनी चाहिए।
अनुच्छेद 15(4) में कहा गया है कि इस अनुच्छेद कि या अनुच्छेद 29 के खंड (2) की कोई बात राज्य को सामाजिक और शौक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्हीं क्यों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई सुविधा उपलब्ध करने से नहीं रोकेगी। अनुच्छेद 16(4) में स्पष्ट किया गया है कि इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपलब्ध करने से वंचित नहीं करेगी।
अनुच्छेद 17 द्वारा अस्पृश्यता के उन्मूलन की बात कही गई है और किसी भी रूप में उसके आचरण को निषिद्ध किया गया है। अनुच्छेद 15(2) के ज़रिए वे सभी नियम्यताएं, दायित्व निबंधन या शर्तें हटाई गई हैं, जो दुकानों सार्वजनिक भोजनालयों, होटलों और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों में प्रवेश या पूर्णतः या अंशतः राज्य निधि से पोषित या साधारण जनता के प्रयोग के लिए समर्पित कुओं तालाबी, स्नान घाटों, सड़कों और सार्वजनिक समागम के स्थानों के उपयोग से संबंधित हैं। अनुच्छेद 25(2) के तहत हिंदुओं के सार्वजनिक धार्मिक स्थलों को हिंदुओं के सभी वर्गों और अनुभाग के लिए खोलने का उपबंध किया गया है।
संविधान अनुसूचित जाति आदेश 1950 में कहा है कि हिंदू या सिक्खधर्म से अलग किसी धर्मावलंबी को अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा। परंतु अनुसूचित जनजाति समझे जाने के लिए कोई धार्मिक प्रतिबंध नहीं है। वर्तमान में आरक्षण का लाभ उन अनुसूचित जातियों के सदस्यों को भी पहुंचाने की व्यवस्था की गई है, जिन्होंने बाद में धर्म परिवर्तन करके बौद्ध धर्म अपना लिया है।
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