भारत में अपराध की स्थिति - Crime Status in India

भारत में अपराध की स्थिति - Crime Status in India

भारत में एनसीआरबी के 2014 के आंकड़ों के अनुसार कुल 1387 जेल हैं, जिसमें केंद्रीय जेल की संख्या 131 है, जिला स्तरीय 364 जेल है, उप-जेल की संख्या 758 हैं, तथा महिलाओं के तेल की संख्या है। प्रायोगिक जेलों में खुले जेल 54 है, बोस्टल स्कूल 20. विशेष जेल 37 तथा अन्य जेलों की संख्या 4 है। पूरे देश के जेलों की क्षमता 13,56,561 है, जिसमें प्रायोगिक जेलों की क्षमता सामान्य जेलों से बहुत ही कम है।2014 के अंत तक के आंकड़े बताते है कि जेलों में 18-30 वर्ष आयु वर्ग के अभिसशित (Convicted) अपाधियों का प्रतिशत 30.6 है. 30 से 50 आयु वर्ग के अभिसंशित अपराधियों का प्रतिशत 51.6 है तथा 50 से आगे के आयु वर्ग में आने वाले अभिसशित अपराधियों का प्रतिशत 17.8 है। 2014 के अंत तक 63,256 कैदियों को विभिन्न व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों के अंतर्गत प्रशिक्षित किया गया। कार्मिक स्तर पर इन जेलों में 52666 जेल ओफिशियल्स 4,18,536 कवियों की देखरेख के लिए उपलब्ध है। अर्थात । जेल आफ्रिशियस 8 कैदियों पर कार्यरत है।


2014 के अंत तक कुल 32,890 कैदियों को पैरोल पर रिहा किया गया। हालांकि इसमें से 374 कैदियों को फरार पाया गया। फरार कैदियों में से 225 कैदियों को पुन गिरफ्तार कर लिया गया। NCRB- 2014 के आंकड़ों के अनुसार भारत में2014 के अंत तक 33981 हत्याओं से संबंधित केस दर्ज हुए करने की कोशिश से संबंधित4 1791 मामले दर्ज हुए हैं. 777237 अपहरण 38071 लूट के मामले तथा महिलाओं से संबंधित अपराधों में 36735 रेप, 8455 दहेज मृत्यु तथा महिलाओं के विरुद्ध किए गए अपराधों की संख्या 42560 बताई जा रही है। बावजूद इसके बच्चों के विरुद्ध दलितों के विरुद्ध वृद्धों के विरुद्ध किए जाने वाले अपराधों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।


लेकिन वास्तविक व्यवहार में जब किसी व्यक्ति पर एक बार अपराधी का लेबल लग जाता है, ऐसे में समाज उसके उस दर्जे को भूलने नहीं देता है। वैसे तो अपराध की विभिन अवधारणाएं हैं, बावजूद इसके कानूनी रूप में अपराध की परिभाषा अधिक सटीक मानी जाती है क्योंकि यह माना जाता है कि अपराध की कानूनी परिभाषा यथार्थवादी स्पष्ट अर्थ में तथा नाप के योग्य होती है।


अपराध की विधिक परिभाषा के अनुसार अपराध एक ऐसा व्यवहार या कृत्य माना जाता है, जो विधि संहिता का उल्लंघन है। पॉल टप्पेन (Paul Tappen, 1960) के अनुसार इरादतन किया गया कारी या अपराधी कानून का उल्लंघन या अवहेलना जो कि बिना किसी औचित्य वा बचाव के किया गया हो और जिसे राज्य द्वारा गंभीर अपराध या साधारण अपराध के रूप में दंडके लिए अनुमानित किया गया है" इस परिभाषा में मूलत: छह बातों पर जोर दिया गया है। इन्हें हम निमन्वत देख सकते हैं


1. कृत्य वास्तव में किया गया हो या यह किसी वैधानिक कर्तव्य की अवहेलना हो।


2. कृत्य एच्छिक होना चाहिए और तब किया जाना चाहिए जब कर्ता का अपने कृत्य के ऊपर पूरा नियंत्रण हो। 


3. कृत्य इरादतन होना चाहिए, भले ही इरादा सामान्य हो वा विशिष्ट


4. कृत्य अपराधी कानून का उल्लंघन होना चाहिए जो गैर अपराधी कानून, दीवानी या प्रशासनिक कानून से भिन्न होना चाहिए,


5. कृत्य बिना औचित्य और बचाव के किया जाना चाहिए


6. कृत्य राज्य द्वारा गंभीर अपराध अथवा साधारण अपराध के रूप में संस्तुत होना चाहिए कानूनी परिभाषा के अंतर्गत अपराध को इन तत्वों के आधार पर टटोलकर अपराध का निर्धारन किया जा सकता है। बावजूद इसके अपराध को समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से भी परिभाषित किया गया है। यह बात महत्वपूर्ण है कि क्लासिकल, नव-विचलनवादी तथा मार्क्सवादी विद्वान अपराध की कानूनी परिभाषा को ही मान्यता देते हैं। किंतु कुछ अन्य समाजशास्त्री है, जिन्होंने अपराध को समाजशास्त्रीय परिघटना के रूप में परिभाषित किया है। थोस्टर्न सेलिन (Thorsten Sellin, 1970)व्यवहारवादी दृष्टिकोण से अपराध की परिभाषा करते हैं। 


इनके अनुसार अपराध, व्यवहार आदर्श प्रतिमान से विचलन या इसे भंग करना है। यह विचलन या भंग समाज द्वारा अपने दंडविधान द्वारा दंडित किया जाता है। परंतु दंड मूल्य का एकमात्र आधार नहीं है। धर्म, कला, शिक्षा व अन्य समाजशास्त्रीय अभिकरण भी मूल्य प्रकट करते हैं। दूसरी परिभाषा के रूप में हम काल्डवेल आर जी. (Caldwell R. G.. ) अपराध की समाजशास्त्रीय परिभाषा देख सकते हैं, जिसमें वे कहते हैं कि "अपराध किसी निश्चित स्थान पर संगठित समाज द्वारा स्वीकृत मूल्यों के संग्रह का उल्लंघन हैं। इससे तात्पर्य यह है कि सामाजिक रूप से किसी खास समाज या संगठन के मूल्यों का उल्लंघन अपराध है। रूढ़िवादी विद्वान अपराध को अलग दिशा देते हैं जिसमें निम्बेट (Nisbet, 1970) महत्वपूर्ण हैं। रूढ़िवादियों के अनुसार अपराध वे कृत्य हैं जो सामाजिक व्यवस्था के लिए खतरा है, नैतिकता के लिए आघात हैं, तथा जान-माल के लिए खतरनाक है। परंपराओं और लोगों की सत्ता के प्रति सम्मान पर आधात सामान्य समाज के लिए काफ़ी घातक है। अश्लील साहित्य और उत्तेजनात्मक फिल्में लोगों की नैतिकता का पतन करती हैं इसलिए वे भी समाज के लिए उतनी ही खतरनाक हैं, जितना कि शत्रु का कोई गुमचर