अपराध शास्त्र के दृष्टिकोण एवं सिद्धांत - Criminology Approaches and Principles

अपराध शास्त्र के दृष्टिकोण एवं सिद्धांत - Criminology Approaches and Principles

शुरुआत में ही हमने देखा है कि अपराधशास्त्र के निर्माण में विभिन्न ज्ञानानुशासनों (Discipline) एवं व्यवसायिकों (Professionals) का सहभाग रहा है। समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, मानव विज्ञान तथा विधि इसमें से महत्वपूर्ण है। दर्शनशास्त्र में भी अपराध पर बातचीत नज़र आती है। आधुनिक समाजशास्त्र में दुखम मटन तथा पारसन्स अप्रतिमानता (Anomic) की अवधारणा देते हैं। इसे विसंगति, आदर्श विहीनता, नियमहीनता भी कहा जाता है। अप्रतिमानता शब्द का प्रयोग पहली बार दुखम के साहित्य में मिलता है। अप्रतिमानता से तात्पर्य है समाज द्वारा स्वीकृत व्यवहार से हटकर व्यवहार की प्रवृत्ति का बढ़ जाना। इसलिए अप्रतिमानता को सामाजिक संरचना से जुड़ा हुआ माना जाता है।

दुर्खिम के अनुसार अप्रतिमानता आदर्शविहीनता अथवा आदशात्मक संरचना के अव्यवस्थापन की एक सामाजिक दशा है। अर्थात् यह अत्यंतिक अभिलाषा लालच व अनगिनत आकाक्षाओं की सामूहिक नैतिक व्यवस्था द्वारा नियंत्रण की असफलता है। अपराधशास्त्र में अपराध को अप्रतिमानता के दृष्टिकोण के अंतर्गत देखा जाता है। जैसे अपराध सामाजिक विचलन की अवस्था है और यह विचलन सामाजिक मूल्यों के विरोध करने पर मजबूर करता है। पारंपारिक मूल्य और चेतना को आघात पहुँचाना तथा नियमों का उल्लंघन अपराध ही है।


अपराधशास्त्र में प्रचलित दूसरा दृष्टिकोणसामाजिक व्याधिकी (Social Pathology) है। सामाजिक व्याधिकी सामाजिक विघटन का ही एक रूप माना जाता है। इसके अंतर्गत समाज में उत्पन्न विकारों का अध्ययन किया जाता है, जो त्रुटिपूर्ण समायोजन के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता है। व्याधिकीय परिस्थिति में सामाजिक व्यवस्था में असंतुलन पैदा होता है। ऐसे में सामाजिक व्याधिकी से ग्रस्तव्यक्ति का समाज में सामाजिक संसाधनों के साथ उचित समायोजन महत्वपूर्ण होता है इसका अध्ययन ही सामाजिक व्याधिकी कहलाता है। फेयरचाइल्ड एच. पी. डिक्शनरी ऑफ सोशियोलोजी में सामाजिक व्याधिकी को परिभाषित करते हुए लिखते हैं सामाजिक व्याधिकी, सामाजिक विघटन या त्रुटिपूर्ण अनुकूलन का अध्ययन है, जो अनुकूलन को रोकते या कम करते हैं और वृद्धावस्था अस्वस्थता, मानसिक दुर्बलता पागलपन, अपराध, विवाह-विच्छेद, वेश्यावृत्ति और पारिवारिक तनाव की वृद्धि करते हैं।

कुल मिलाकर सामाजिक व्याधिकी सामाजिक संरचना सामाजिक समस्या को देखने का एक दृष्टिकोण है। बीसवी शताब्दी के शुरुआत में सभ्यता का पतन समाज का विनाश आदि जुमले ने इस अवधारणा की पृष्टभूमि प्रदान की थी। फ्रांस के पॉल वॉल लिलियनफेल्ड उन विद्वानों में से एक हैं जिन्होंने सामाजिक व्याधिकी का विकास किया। उन्होंने अपने ग्रंथ Pathology Sociale (1886) में सामाजिक व्याधिकी पर बात रखी। सामाजिक व्याधिकी पर यह पहली पुस्तक थी। इस पुस्तक में वे लिखते है कि समाज में दो तरह के व्यक्ति होते हैं सामान्य और रोगी वैसे ही दो तरह के समाज भी होते हैं सामान्य और रोगी समाज इसलिए सामाजिक व्याधिकी वह विज्ञान है, जो समाज के तीन रोगों-उद्योग, न्याय और राजनीति के रोगों के अध्ययन, विश्लेषण और निराकरण से संबंध रखता है। उनका यह भी कहना था कि उद्योग के रोग उन्माद है, न्याय का रोग मानसिक दौर हैं तथा राजनीति का रोग लकवा है। बदलते स्वरूप में आज इसको सामाजिक विचलन, असमान्यता, विसमान्यता आदि शब्दों में उपयोग में लाया जाता है, जिसका सीधा संबंध अपराधशाख से है।