अपराधशास्त्र - Criminology

अपराधशास्त्र - Criminology

जन्म से कोई व्यक्ति अपराधी नहीं होता है। सामाजिक पर्यावरण के साथ सामंजस्य न होने के कारण व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन आता है और उसकी प्रवृत्ति आपराधिक हो जाती है। अपराध से सीधे तात्पर्य है, नियम कानून का उल्लंघन अब सवाल उठाता कि व्यक्ति सामाजिक नियमों का उल्लंघन क्यों करता है। इसके कारणों की खोज के बाद पता चला कि व्यक्ति सामान्य रूप से अपने कुसमायोजन, गलत संगत आदि कारणों से आपराधिक व्यवहारों के गिरफ्त में आ जाता है।


विभिन्न देशों में अपराध के लिए संवैधानिक दंड निर्धारित किए गए हैं। भारतीय परिदृष्य अपराध एवं आपराधिक प्रवृत्तियों पर रोक लगाने के लिए पुलिस न्यायालय एवं जेल है। इस संरचना का उपयोग अपराधी को दंड दिलाने के लिए किया जाता है। दंड देने के पीछे यह धारणा थी कि दंड के भय से क् अपराध करना या उस प्रवृत्ति को छोड़ देगा परंतु इसका परिणाम उलटा ही हुआ अपराधियों के लिए जेल एक ऐसी जगह बन गई है, जहाँ दो वक्त की रोटी नसीब होती थी। इस कारण छिट-पुट अपराध में बढ़ोतरी ही हुई। अपराध पर किए गए अध्ययनों के बाद यह तय हुआ कि दंड के साथसाथ सुधार को भी अपनाया जाए, जिससे अपराधी फिर इन गतिविधियों में न पड़े। इन्हीं सेवाओं कोसुधारात्मक सेवाओं के रूप में भी जाना जाने लगा।


सुधार आपराधिक न्यायव्यवस्था का ही एक हिस्सा है, जिसमें बार-बार होने वाले आपराधिक व्यवहारों को ढूंढ़ना और असामाजिक व्यवहारों के कारणों को रेखांकित कर समझ बनाते हुए उसकी रोकथाम करना। इस प्रक्रिया का मूल उद्देश्य अपराधियों का पुन समाज में पुनर्वास करना है। पुलिस और न्यग्रालय की धीमी प्रक्रिया और साथ ही अधिनियमों में दोष के कारण इनकी पुर्नबलन की प्रक्रिया बहुत ही लंबी lengthy) हो जाती है। ऐसे में कई सारे मामले देरी के कारण खारिज भी हो जाते हैं या कभी-कभी अपराधी को अपराध से ज्यादा दंड मिल जाता है। ऐसे में सुधारात्मक प्रक्रिया के अंतर्गत समाज कार्य अपराधियों के सुधार की जिम्मेदारी लेता है।


अपराध और अपराधी को समझने के लिए विभिन्न विद्वानों ने अपने सिद्धांत दिए हैं। समाजशास्त्र तथा मनोविज्ञान के विद्वानों का इस क्षेत्र में योगदान काफी महत्वपूर्ण रहा है। अन्य विषयों के विशेषज्ञों ने भी अपराध और अपराधी को समझने का भरसक प्रयत्न किया है, जिसमें वकील, न्यायाधीश, चिकित्सक तथा मानववैज्ञानिक आदि हैं। इन्हीं विद्वानों के विचारों की बुनियाद पर अपराधशास्त्र का सूत्रपातहोता है। अपराधशास्त्र शब्द के उदय का श्रेय फ्रांसीसी मानवशास्त्री टोपिनाई (Topinard) (1889) को दिया जाता है। अपराधशास्त्र पर प्रथम पाठ्य पुस्तक 1920 में समाजशास्त्री मौरिस पार्माली (Maurice Parmalee) द्वारा अपराधशास्त्र' (Criminology) शीर्षक से अमेरिका में लिखी गई। भारत में अपराधशास्त्र का शिक्षण लखनऊ के जेल अधिकारी प्रशिक्षण महाविद्यालय में 1940 से शुरू हुआ। 1949 में लखनऊ विश्वविद्यालय में अपराधशास्त्र में एक डिप्लोमा कोर्स शुरू किया गया। बाद के समय में हम देखते हैं कि अपराधशास्त्र एक विषय के रूप में पदया जाने लगा, जिसमें टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल सायसेस (1954), सागर विश्वविद्यालय (1959), मद्रास विश्वविद्यालय (1965) आदि।


1950-70 के दशक तक ऐसे ही इसका विकास होता रहा; किंतु 1970-80 के बीच अपराधशास्त्र प्रचलन अधिक तीव्रता से हुआ इस कारण इसे एक अलग विषय के रूप में समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, समाज कार्य और कानून जैसे विषयों में शामिल किया जाने लगा। जैसे कि समाज कार्य का संबंध लोगों के सुधार तथा अपराध का निरोध से है। जेल की अवधारणा में आए बदलावों के अनुसार जेल अब केवल दंड का उपकरण नहीं रहा जेलों में कैदियों के सुधार पर जोर दिया जाने लगा है। बावजूद इसके बाल अपराध का अपना एक अलग दृष्टिकोण है जिसमें बालकों के सुधार, शिक्षा आदि पर जोर दिया जाता रहा है। समाज कार्य अपराधी सुधार प्रशासन के अंतर्गत अपनी भूमिका बखूबी निभा रहा है। इसी परिदृश्य में अपराधशास्त्र की अवधारणा सिद्धांत तथा इसमें आए बदलाव एवं सुधारात्मक सेवाओं को समझने की कोशि इस इकाई में हम करेंगे।


अपराध शास्त्र: एक परिचय


सामान्यत: अपराधशास्त्र से तात्पर्य एक ऐसा विज्ञान, जिसमें अपराध की व्याख्या की जाती है। शुरुआती समय में अपराधशास्त्र को दंडशाख (Penology) के नाम से भी जाना जाता था, किंतु आज अपराधशास्त्र का प्रयोग इस संकुचित अर्थ में न करके विस्तृत अर्थ में किया जाने लगा जिसमें दडशास्त्र एवं अपराधियों के उपचार और सुधार को भी सम्मिलित किया जाने लगा है। वेबस्टर डिक्शनरी के अनुसार अपराधशास्त्र अपराध का सामाजिक तथ्य के रूप में वैज्ञानिक अध्ययन है तथा अपराधी और उसके मानसिक गुणों आदतों एवं अनुशासन आदि का अध्ययन भी इसमें किया जाता है। इस परिभाषा के आधार पर हम कह सकते हैं कि अपराधशास्त्र समाज में मनुष्य के बिचलित व्यवहारों का अध्ययन करता है।


सुदरलँड एवं क्रेसी (Sutherlandand Cressey) अपनी किताब (principles of Criminology) में लिखते हैं कि अपराधशास्त्र ज्ञान की वह शाखा है, जो सामाजिक तथ्य के रूप में अपराध की व्याख्या करता है। इसके क्षेत्र में हम कानून बनाना कानून को तोड़ना तथा कानून को तोड़ने के प्रतिप्रतिक्रिया को सम्मिलित करते हैं।"


टेफ्ट डी. आर. एवं इंग्लैंड आर डब्ल्यू (Taft D. Rand England R. W.) अपनी पुस्तक Criminology में अपराधशास्त्र के बारे में अपने विचार रखते हुए लिखते हैं अपराधशाख ऐसा अध्ययन है, जिसकी विषय-वस्तु के अंतर्गत अपराध का अर्थ और निरोध, अपराधियों और बाल अपराधियों के दंड तथा उपचार को सम्मिलित किया जा सकता है।" टेफ्ट की अपराधशास्त्र की यह परिभाषा समाज कार्य के भूमिका को एक उचित लक्ष्य प्राप्त कराती है। साथ ही अपराध शास्त्र के विषय वस्तु का निर्धारण करने में मदद भी करती हैं।


न्यूमेन (Neuman) ने अपराधशास्त्र को सामाजिक विज्ञान की वह शाखा कहा है, जो आपराधिक व्यवहार से संबंधित हैं। धर्मवीर महाजन एवं कमलेश महाजन अपनी किताब अपराधशास्त्र में बताते हैं कि अपराधशास्त्र मुख्यतः तीन प्रकार के परस्पर संबंधित तथ्यों का अध्ययन करता है।


1. अपराध की व्याख्या


2. अपराधों का प्रतिशोधन अर्थात दंड व्यवस्था 


3. आपराधिक का उपचार सुधार एवं पुनर्स्थापना


किसी भी ज्ञानशाखा का अपना विषय-क्षेत्र होता है। अपराधशास्त्र के विषय क्षेत्र के बारे में यह बात महत्वपूर्ण है कि कुछ विद्वान इसे केवल विधि सम्मत व्यवहार तकसीमित रखना चाहते हैं, जबकि कुछ विद्वान इसे सामाजिक व्यवहार की ही श्रेणी मानते हैं। इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच एक तीसरा दृष्टिकोण उन विद्वानों का है, जो अपराध को सामाजिक कानूनी दृष्टिकोण से देखते हैं। अपराधशास्त्र के विषय क्षेत्र पर विभिन्न विद्वानों ने अपने विचार रखें है, जिसमें काडवेल, इलियट, सदरलैंड एवं क्रेसी तथा जेफरी आदि हैं। इन सभी के बावजूद बाल्टर सी रैकलस (Walter C. Reckless, 1955) ने अपनी किताब The Crime Problem में अपराधशास्त्र के विषय-क्षेत्र पर विस्तृत बिंदु पर बात की है। उनके अनुसार अपराधशास्त्र के विषय-क्षेत्र में निम्नलिखित केंद्रीय रुचियाँ हैं।


1. कानून के उल्लंघनों का लेखाजोखा रखना, गिरफ्तारियों की संख्या का संकलन करना तथा अपराधियों का तादात्मीकरण करना।


2. विभिन्न देशों के आपराधिक कानूनों का उनकी सामाजिक आर्थिक व्यवस्था के अनुरूप उनका तुलनात्मक अध्ययन करना।


3. बाल तथा वयस्क अपराधियों के वैयक्तिक, सामाजिक तथा आर्थिक कारकों का विश्लेषण करना, ताकि उनके वैज्ञानिक अध्ययन हेतु समाजशास्त्रीय अध्ययन सामग्री उपलब्ध हो सके। 


4. उन सिद्धांतों एवं उपकल्पनाओं का प्रतिपादन परीक्षण एवं संशोधन करना जो अपराध तथा बाल अपराध की घटनाओं का स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने में सहायक है। 


5. अपराधी व्यवहार के उन तत्वों का स्पष्टीकरण करना, जिन्हें वैधानिक रूप से अपराध घोषित किया जाता है। 


6. उन अपराधियों का वैयक्तिक तथा सामाजिक अध्ययन करना, जो अपनी मानसिक विकृतियों के फलस्वरूप प्रथम बार अपराध करते हैं पर स्वभाव से अपराधी नहीं होते हैं।


7. व्यवहार विचलन की उन समस्याओं का अध्ययन करना तथा उनके नियंत्रण की विधियों की खोज करना, जो असामाजिक कृत्यों जैसे- वेश्यावृत्ति, आत्महत्या, मादक पदार्थ व्यसन आदि आपराधिक व्यवहार को जन्म देने में प्रमुख योगदान देते हैं। 


8. आपराधिक कानूनों के कार्यान्वयन हेतु उन वैज्ञानिक विधियों का अध्ययन एवं खोज करना।  जिससे अपराध की समस्या का समाधान हो सके। 


9. अपराधियों के सुधार एवं पुनर्वास की उन प्रमुख विधियों की सार्थकता एवं प्रभावशीलता का अध्ययन एवं मूल्यांकन करना, जिनका प्रयोग आज हो रहा है। 


10. बाल तथा वयस्क अपराध के निरोधक कार्यक्रमों की संचालन व्यवस्था का मूल्यांकन एवं संशोधन करना।


अतः अपराधशास्त्र के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि अपराधशास्त्र अपराध के कारणों की जाँच पड़ताल कर उसके निरोध में सहयोग प्रदान करते हुए अपराधियों के सुधार में सहायक ज्ञान उपलब्ध करता है। अपराधशास्त्र का महत्व इस कारण भी बढ़ जाता है, क्योंकि वह केवल अपराध ही नहीं, बल्कि अपराध एवं अपराधियों के निर्माण में शामिल सामाजिक कारकों प्रक्रियाओं का अध्ययन भी यह करता है। जैसे सामाजिक विघटन, सामाजिक विचलन, समाज विरोधी व्यवहार आदि प्रक्रियाओं का समाज मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कर उसका कानून के साथ तालमेल बिठाने का कार्य इस ज्ञानशाखा में किया जाता है। अपराधशास्त्र के महत्व का विश्लेषण धर्मवीर महाजन एवं कमलेश महाजन निम्न बिंदूओं के आधार पर करते हैं.


1. विचलित व्यवहार का ज्ञान


2. अपराध के कारणों का ज्ञान


3. अपराध निरोध में सहायक


4. अपराधियों के सुधार में सहायक 


5. जेल-सुधारों में सहायक


6. सामाजिक संगठन एवं विघटन को समझने में सहायक


7. अनेक व्यवसायों के प्रशिक्षण में सहायक


8. कानून के अध्ययन में सहायक


9. अपराधी प्रवृत्तियों का ज्ञान 


10. समाज के दृष्टि से उपयोगी