पर्यावरण - Environment
पर्यावरण - Environment
भारतीय परिदृश्य में चल रहे पर्यावरण प्रबंधन एवं विकास संबंधी क्रियाकलापों को समझने की कोशिश करेंगे। साथ ही आपदा प्रबंधन के अंतर्गत पर्यावरण विकास कैसे किया जाए इस पर भी चर्चा करेंगे। पर्यावरण विकास करना हो तो उसके लिए आपदा प्रबंधन आवश्यक शर्त है क्योंकि पर्यावरण विकास हमारा साध्य है तो आपदा प्रबंधन इस साध्य को प्राप्त करने का महत्वपूर्ण साधन है। ऐसे में हम शुरुआत में पर्यावरण के सभी आयामों को समझने की कोशिश करेंगे तत्पश्चात आपदा प्रबंधन की प्रक्रिया पर चर्चा करते हुए पर्यावरण विकास को समझेंगे।
पर्यावरण शब्द संस्कृत भाषा के परि' उपसर्ग (चारों ओर) और 'आवरण' से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है ऐसी चीजों का समुच्चय जो किसी व्यक्ति या जीवधारी को चारों ओर से आवृत्त किए हुए हैं। पारिस्थितिकी और भूगोल में यह शब्द अंग्रेजी के Environment के पर्याय के रूप में इस्तेमाल होता है। अंग्रेजी शब्द Environment स्वयं उपरोक्त पारिस्थितिकीय अर्थ में काफ़ी बाद में प्रयुक्त हुआ है। यह में शब्द शुरूआती दौर में आसपास की सामान्य दशाओं के लिए प्रयुक्त होता थाऑनलाइन इंटिमोलोजी विश्वकोश के अनुसार 1600 सदी के शुरुआत में फ्रांसीसी भाषा से उद्भूत यह शब्द"state of being environed" (see environment) के अर्थ में प्रयुक्त होता था और इसका पहला ज्ञात प्रयोग कार्लाइल (1956) द्वारा जर्मन शब्द Umgebung के अर्थ को फ्रांसीसी में व्यक्त करने के लिए हुआ।
ब्रिटेनका विश्वकोश (2016) के अनुसार पर्यावरण उन सभी भौतिक, रासायनिक एवं जैविक कारकों की समष्टिगत इकाई है, जो किसी जीवधारी अथवा पारितंत्रीय आबादी को प्रभावित करते हैं तथा उनके रूप, जीवन और जीविता को तय करते हैं।"
जमिसन डी. (Jamieson D.) (2007) के अनुसार सामान्यतः पर्यावरण को मनुष्य के संदर्भ में परिभाषित किया जाता है और मनुष्य को एक अलग इकाई और उसके चारों ओर व्याप्त अन्य समस्त चीजों को उसका पर्यावरण घोषित कर दिया जाता है। किंतु यहाँ यह भी जरूरी है कि अभी भी इस धरती पर बहुत सी मानव सभ्यताएँ हैं, जो अपने को पर्यावरण से अलग नहीं मानतीं और उनकी नज़र में समस्त प्रकृति एक ही इकाई है जिसका मनुष्य भी एक हिस्सा है।"
पाण्डेय के. पी. एवं अन्य (2005) के अनुसार आमतौर से उन सभी दशाओं तथा प्रभावों का कुल योग जो प्राणी के जीवन और उसके विकास को प्रभावित करता है, पर्यावरण कहलाता है।" सामान्य अर्थों में पर्यावरण मानवीय जीवन को प्रभावित करने वाले सभी जैविक और अजैविक तत्वों तथ्यों, प्रक्रियाओं और घटनाओं के समुच्चय से निर्मित इकाई हैं। यह हमारे चारों ओर व्याप्त है और हमारे जीवन की प्रत्येक घटना इसी के अंदर संपादित होती हैं तथा हम मनुष्य अपनी समस्त क्रियाओं से इस पर्यावरण को भी प्रभावित करते हैं। इस प्रकार एक जीवधारी और उसके पर्यावरण के बीच अन्योन्याश्रय का संबंध भी होता है।
पर्यावरण के जैविक संघटकों में सूक्ष्म जीवाणु से लेकर कीडमकोड़े, सभी जीव-जंतु और पेड़पौधे आ जाते हैं और इसके साथ ही उनसे जुड़ी सारी जैव क्रियाएं और प्रक्रियाएं भी। अजैविक संघटकों में जीवनरहित तत्व और उनसे जुड़ी प्रक्रियाएं आती हैं जैसे चट्टानें, पर्वत, नदी, हवा और जलवायु के तत्व इत्यादि।
मानव हस्तक्षेप के आधार पर पर्यावरण को दो प्रखंडों में विभाजित किया जाता है प्राकृतिक या नैसर्गिक पर्यावरण और मानव निर्मित पर्यावरण। हालांकि पूर्ण रूप से प्राकृतिक पर्यावरण (जिसमें मानव हस्तक्षेप बिल्कुल न हुआ हो) या पूर्ण रूप से मानव निर्मित पर्यावरण (जिसमें सब कुछ मनुष्य निर्मित हो), कहीं नहीं पाया जाता। यह विभाजन प्राकृतिक प्रक्रियाओं और दशाओं में मानव हस्तक्षेप की मात्रा की अधिकता और न्यूनता का द्योतक मात्र है। पारिस्थितिकी और पर्यावरण भूगोल में प्राकृतिक पर्यावरण शब्द का प्रयोग पर्यावास (habitat) के लिए भी होता है। पाण्डेय के. पी. एवं अन्य (2005) पर्यावरण को समझने के लिए उसे विभिन्न प्रकारों में बाँटकर देखते हैं।
साथ ही विभिन्न विषयों के अंतर्गत पर्यावरण को अलग-अलग रूपों में देखा जाता है। जैसे भौतिक पर्यावरण: यह प्रमुख रूप से जैकमंडल (Biosphere) से घिरा है। मिटटी की कुछ गहरी परतो पृथ्वी से आसमान की 2 किमी. की दूरी तथा उतनी दूरी तक समुद्र तल के भीतसाई जाने वाली समस्त जीव-योनियों से मिलकर बना है।
सामाजिक पर्यावरण यह पर्यावरण व्यक्ति के आपसी संबंधों सामाजिक संरचनाओं सामाजिक रीति रिवाजों एवं संस्थाओं से बना हुआ है। मनोवैज्ञानिक पर्यावरण: यह पर्यावरण व्यक्ति की अपनी आंतरिक दुनिया है तथा उसकी उम्मीदों एहसासों एवं विश्वास से सृजित होता है। इसके बावजूद आर्थिक सांस्कृतिक शैक्षिक आदि प्रकारों में पर्यावरण को बाँटा जाता है। इस इकाई में हम प्राकृतिक पर्यावरण से संबंधित मुद्दों पर केंद्रि होकर बात करेंगे।
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