पर्यावरण ह्रास की समस्याएँ - Environmental Degradation Problem
पर्यावरण ह्रास की समस्याएँ - Environmental Degradation Problem
प्रतिदिन विज्ञान के नए नवाचारों से प्रकृति में मानवीय हस्तक्षेप में बढ़ोतरी हो रही हैं। विज्ञान के क्षेत्र में असीमित प्रगति तथा नए आविष्कारों की स्पर्धा के कारण आज का मानव प्रकृति पर पूर्णतया विजय प्राप्त करना चाहता है। इस कारण प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया है। वैज्ञानिक उपलब्धियों से मानव प्राकृतिक संतुलन को उपेक्षा की दृष्टि से देख रहा है। दूसरी ओर धती पर जनसंख्या की निरंतर वृद्धि औद्योगीकरण एवं शहरीकरण की तीव्र गति से प्रकृति के हरे भरे क्षेत्र समाप्त हो रहे हैं।
ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियर पिघलने एवं वनों की अत्यधिक कटाई से नदियों में बाढ़ आ रही है। समुद्र का जलस्तर सन् 1990 के मुकाबले सन् 2011 में 10 से 20 सेमी तक बढ़ गया है। संयुक्त राष्ट्र ने मई 1969 की रिपोर्ट में पर्यावरण असंतुलन पर गंभीर चिंता व्यक्तकी किमानव जाति के इतिहास में पहली बार पर्यावरण असंतुलन का विश्वव्यापी संकट खड़ा हो रहा है। मानव जनसंख्या में असीमित वृद्धि पर्यावरणीय आवश्यकताओं का सक्षम एवं वनस्पति जीवन का बढ़ता हुआ विकास का खतरा ये सब उसके लक्षण है। यही वर्तमान प्रवृत्ति जारी रहती है तो पृथ्वी पर जीवन खतरे में पड़ सकता है।"
प्रदूषण
सामान्य अर्थ में पर्यावरण में अवांछनीय तत्वों का मिलना तथा इनके फलस्वरूप असंतुलन की स्थिति उत्पन्न होना ही प्रदूषण है। पर्यावरण प्रदूषण के कुछ दूरगामी दुष्प्रभाव, नो अतीव घातक हैं, जैसे के आणविक बिस्फोटों से रेडियोधर्मिता का आनुवांशिक प्रभाव वायुमंडल का तापमान बढ़ना ओजोन परत की हानि, भूक्षरण आदि ऐसे घातक दुष्प्रभाव हैं। प्रत्यक्ष दुष्प्रभाव के रूप में जलवायु तथा परिवेश का दूषित होना एवं वनस्पतियों का विनष्ट होना मानव का अनेक नये रोगों से आक्रांत होना आदि देखे जा सकते हैं। बड़े कारखानों से विषैला अपशिष्ट बाहर निकलने से तथा प्लास्टिक आदि के कचरे से प्रदूषण की मात्रा उत्तरोत्तर बढ़ रही है।
संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपति की विज्ञान सलाहकार समितिने प्रदूषण को परिभाषित करते हुए लिखा
"मनुष्य के कार्यों द्वारा ऊर्जा प्रारूप विकिरण प्रारूप, भौतिक एवं रासायनिक संगठन तथा जीवों की बहुलता में किए गए परिवर्तनों से उत्पन्न प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभावों के कारण आस-पास के पर्यावरण में अवांछित एवं प्रतिकूल परिवर्तन ही प्रदूषण है।
राष्ट्रीय पर्यावरण अनुसंधान परिषद् (1976) द्वारा की गई प्रदूषण की परिभाषा भी महत्वपूर्ण हैं। इस परिषद् के अनुसार मनुष्य के क्रियाकलापों से उत्पन्न अवशिष्ट उत्पादों के रूप में पदार्थों एवं ऊर्जा के विमोचन से प्राकृतिक पर्यावरण में होने वाले हानिकारक परिवर्तनों को प्रदूषण कहते हैं।
कुल मिलाकर प्रदूषण पर्यावरण में दूषक पदार्थों के प्रवेश के कारण प्राकृतिक संतुलन में पैदा होने सो दोष को कहते हैं। प्रदूषक पर्यावरण को और जीवजंतुओं को नुकसान पहुँचाते हैं। प्रदूषण का अर्थ है 'हवा, पानी, मिट्टी आदि का अवाछित द्रव्यों से दूषित होना जिसका सजीवों पर प्रत्यक्ष रूप से विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान द्वारा अन्य अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ते हैं। वर्तमान समय में पर्यावरणीय अवनयन का यह एक प्रमुख कारण है।
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