तृतीय पंथी जन का इतिहास - History of the Third Gender People

तृतीय पंथी जन का इतिहास - History of the Third Gender People

उक्त तृतीय पंथी जन की अवधारणा में यौनिकता और जेंडर आधारित पहचान जानने के बाद हम अभी उनके इतिहास को सरलता से पहचान कर सकते हैं। भारतीय समाज में तृतीय पंथी जन के इतिहास को देखते हैं तो हिजड़ा या किन्नर तथा विभिन्न संस्कृति के अनुसार विभिन्न नामों का उल्लेख मिलता है। के हिंदू धर्म ग्रंथ महाभारत में शिखंडीबृहन्नड़ा, किलबा, किन्नर आदि नामों मिलते हैं। महाभारत में अर्जुन जब अपने पिता इंद्र से मिलने स्वर्ग गया था तो वहाँ उसने देवी उर्वशी को देखकर कामुक हावभाव किए तो उसने अर्जुन को शाप दिया कि क्लिबा' बनोगे। क्लिब संस्कृत शब्द है जिसका प्रयोग व्यापक अर्थों में किया जाता रहा है, जैसे कि "व्यक्ति जो बांझ हो नपुंसक हो बधिया हो, विपरीत लिंग के वस्त्र पहनने वाले हो, ऐसा व्यक्ति हो, जिसने किसी अन्य व्यक्ति के साथ मुख मैथुन करवाया हो ऐसा व्यक्ति, जिसके जननांग विकृत अथवा अपूर्ण हो ऐसा व्यक्ति, जिसने केवल लड़कियाँ ही पैदा की हो अथवा अंतिम श्रेणी में जो उभयलिंगी हो (ल. त्रिपाठी, 2013)|

तृतीय पंथी जन के अन्य नामों से जुड़ी कहानियों का भी महाभारत में उल्लेख मिलता है। रामायण में हिजड़े से जुड़ी कहानी का उल्लेख मिलता है कि "जब राम वनवास गए थे, तब आयोध्या के द्वार पर हिजड़े उनका इंतजार कर रहे थे। जब राम वनवास से लौटे तो देखा द्वार पर नगर के किन्नर इंतजार कर रहे है जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने जवाब दिया आपने सभी नर-नारियों को लौट जाने के लिए कहा था और हम न नगपुरुष) हैं और न ही नारी (स्त्री) तो हम यहीं पर आपके आने का इंतजार कर रहे थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न राम ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि आज से तुम्हारा आशीर्वाद सब लोगों के लिए शुभ होगा। इसी धारणा से लोगों द्वारा आज भी किन्नरों का आशीर्वाद लिया जाता है तथा शुभ कार्यों में आना अच्छा माना जाता है( ल त्रिपाठी, 2013 ) बुद्धिस्त विनय के अनुसार दूसरी शताब्दी के आसपास बुद्ध ने अपने उपदेशों के द्वारा सेक्सजेंडर को चार भागों में बांटा है पुरुष स्त्री, स्त्री-पुरुष दोनों की तरह प्रवृत्ति वाले और पंडक्वजिसमें स्त्री-पुरुष दोनों तरह की प्रवृत्ति होती है परंतु पुरुष प्रवृत्ति की प्रधानता होती है। विनय परंपरा के विकास के साथ पंडका अर्थात, जो चतुर्थ श्रेणी का जेंडर है उसे उनकी शारीरिक और व्यावहारिक प्रवृत्तियों के आधार पर थर्ड जेंडर ही माना गया।

प्रारंभिक तमिल व्याकरण तोलकप्पीयम (Tolkappiyam3rd century BC) ने भी तीन प्राकृतिक जेंडर की बात कही है। वैदिक खगोलशास्त्र ज्योतिष), जो ग्रहों को तीनों जेंडर का प्रतिनिधित्व करते हुए मानते हैं, जिसमें तीसरा जेंडर बुद्ध शनि तथा केतु से जुड़े हुए हैं। वात्स्यायन ने कामसूत्र में किन्नरों को तृतीय पंथी के रूप में वर्णन करते हैं किन्नरों की कामप्रवृत्ति को लेकर बृहद वर्णन किया गया है, साथ ही किन्नर शब्द को बड़े व्यापक रूप से परिभाषित किया है- 'किम अहं नरः इति किन्नर ऐसा पुरुष जिसको अपने पुरुष होने में संदेह उत्पन्न होता है किन्नर है। अपने को पुरुष न मानना ही किन्नरता के सीमा की शुरुवात है इसका संबंध केवल प्रजनन अंगों से न होकर भावनात्मक और मानसिक स्तर पर ज्यादा होता है।

(मितवा संकल्प समिति वेब पृष्ठ- 3 खिलजी वंश खिलजी वंश के अलाउद्दीन खिलजी 1296-1316ई.) के काल में एक हिंदू हिजड़ा का  वर्णन मिलता है, जिसे गुजरात सैन्य अभियान | 297ई) के खंभात बंदरगाह के आक्रमण के दौरान एक हिंदू हिजड़ा दास के रूप में प्राप्त हुआ जिसका नाम मालिक काफूर रखा गया। इसे एक हजार स्वर्ण दीनारों में खरीदा गया था, इसलिए वह हजार दीनारी भी कहा जाता था। मालिक काफूर ने अलाउद्दीन के दक्षिण अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। मालिक कापुर को ताकउल-मुल्क काफुरी की उपाधि प्राप्त थी। खिलजी वंश में मालिक काफुर का वर्णन एक वीर पराक्रमी योद्धा के रूप में किया जाता है। (डिसेन्ट कुमार, 2014)


मुगल काल मुगल काल व उससे पहले भी हिजड़ों का उल्लेख राजा, नवाबों के हरम में, हरम के रक्षकों के रूप में होता रहा है। मुगल काल में गरीब परिवार अपने बच्चों में से किसी एक को किन्नर बनाकर राजमहल भेज दिया करते थे। औरंगजेब के राज्य में लिंगच्छेद पर बंदी लगाई गई थी लेकिन तब भी चोरी छुपे किया जाता था। लिंगच्छेद की प्रक्रिया हिजड़ों में निर्वाण प्राप्त करने या पूर्ण स्री बन जाने के रूप में देखा जाता है। उस समय मुस्लिम हिजड़ों तथा हिंदू हिजड़ों की आर्थिक स्थिति का भी पता चलता है "मुस्लिम हिजड़ों को सम्मान था और वे अमीर भी थे लेकिन हिंदू हिजड़े उनसे गरीब खेल. वर्तमान में तृतीय पंथी जन समाज में हाशिये पर जिंदगी व्यतित कर रहे हैं जिनकी शैक्षिक, आर्थिक एवं त्रिपाठी, 2013)