बाल अपराधी सुधार कार्यक्रम - Juvenile Delinquency Reform Program
बाल अपराधी सुधार कार्यक्रम - Juvenile Delinquency Reform Program
भारत में बाल अपराध की रोकथाम एवं उपचार के लिए स्वातंत्र्य पूर्व समय से ही कदम उठाए जा रहे हैं। 1883 में डॉ. बुइस्ट (Dr. Buist) द्वारा मुंबई में सबसे पहले सुधारात्मक स्कूल बाल अपराधियों के लिए खोला गया, जो आज भी द डेविड ससुन इंडस्ट्रियल स्कूल के नाम से जाना जाता है और अपनी तरह का भारत में एक ही संगठन है। 1876 में सुधार स्कूलों के लिए कानूनी व्यवस्था की गई, जो बाद में 1897 में The Indian Reformatory SchoolsAct के रूप में पारित की गई। इसके अनुसार मुंबई में में 16 वर्ष से कम और अन्य जगहों पर 15 वर्ष से कम अपराधी बच्चे सुधार स्कूल में भेजे जा सकते थे। स्वतंत्रता के बाद बाल अपराधियों के प्रति सरकार अधिक सतर्कता से काम करने लगी, किंतु वह भी केवल अधिनियमों तक ही सीमित था।
संस्थागत रूप में बाल अपराधियों के सुधार के लिए बोस्टल स्कूल सुधार स्कूल बाल बंदीग्रह रिमांड होम प्रमाणित स्कूल, बाल सलाह केंद्र, बाल क्लब, फोस्टर होम प्रोवेशन हॉस्टल तथा किशोर न्यायालय आदि के अंतर्गत बाल अपराधियों पर नियंत्रण लय आदि के रखा जाता रहा है। भारत में 1974 में बाल नीति को सरकार ने अपनाया है और उसी आधार पर बच्चों की सहायता के लिए सरकारी यंत्रणा काम भी कर रही है। बाल अपराधियों के सुधार हेतु बाल न्यालयों की स्थापना एवं सुधारगृह जैसी संरचनाओं को खड़ा किया गया है। बाल न्यालयों को अपने निर्णय देने में बड़े विवेकाधिकार प्राप्त होता है। सामान्य न्यायालय मुकदमों को यह रद्द कर सकता है बालक तथा उसके माता-पिता को चेतावनी दे सकता है या उन पर जुर्माना लगा सकता है। बालक को किसी सुधार कार्य करने वाली संस्था की देखरेख में रहने का आदेश दे सकता है या बाल सुधार संस्थानों में रखे जाने का निर्णय दे सकता है।
सन 1986 में किशोर न्याय अधिनियम पारित किया गया, यह अधिनियम उपेक्षित वा अपराधी किशोरों की देखरेख संरक्षण, उपचार विकास और पुनर्वास तथा बाल अपराधियों से संबंधित विषयों के न्याय निर्णयन का और आवास आदेश (Disposition) का उपबंध करना आदि कार्य इस अधिनियम में अंतर्गत आता है। इसमें बाल अपराधी ऐसे किशोर को कहा गया जिसने कोई अपराध किया है। बाल से अभिप्राय ऐसा लड़का जिसने 16 वर्ष की आयु पूरी नहीं की है अथवाऐसी लड़की, जिसने 18 वर्ष की आयु पूर्ण नहीं की है। यह अधिनियम जम्मू और कश्मीर को छोड़कर संपूर्ण देश में लागू हैं। इस अधिनियम के मुख्य उद्देश्य है।
1. संपूर्ण देश में किशोर न्याय का रूप न्यायिक ढाँचा स्थापित करना, जिससे किसी भी परिस्थिति में कोई भी बालक कारागार या पुलिस थाने में न रखा जाए। यह किशोर न्यायालय एवं किशोर कल्याण बोर्डों की स्थापना कर आश्वस्त किया जा रहा है।
2. किसी भी सामाजिक असमायोजन की परिस्थिति में बालक के विकास की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए बाल अपचार के समस्त स्वरूपों के निरोध एवं उपचार के लिए एक विशिष्ट दृष्टिकोण को स्थापित करना।
3. किशोर न्याय व्यवस्था के अंतर्गत आने वाले विभिन्न वर्गों के बालकों के संरक्षण देखभाल,
उपचार, विकास एवं पुनर्वास के लिए आवश्यक यंत्रों एवं डाँचे के स्वरूप का निरूपण करना है। यह संप्रेषण किशोर एवं विशिष्ट गृहों की स्थापना द्वारा प्रदान किए जाने का प्रयास किया जाएगा।
4. छानबीन गिरफ्तारी न्यायिक प्रक्रिया, दंड के विकल्पों संरक्षण देखभाल, उपचार एवं पुनर्वास से संबंधित मानकों एवं मानदंडों को स्थापित करके किशोर न्याय व्यवस्था के क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना।
5. किशोर न्याय की औपचारिक व्यवस्था तथा उन स्वैच्छिक संस्थाओं के बीच उपयुक्त तालमेल एवं समन्वय स्थापित करना जो उपेक्षित अथवा सामाजिक कुसमायोजन से ग्रसित बालकों के लिए काम कर रही है।
6. किशोरों से संबंधित विशिष्ट अपराधों को निश्चित कर उनके लिए उपयुक्त ढंग का प्रावधान करना तथा 7. देश में किशोर व्यवस्था तथा किशोर न्याय के क्रियान्वयन को संयुक्त राष्ट्र संघ के न्यूनतम मानक
नियमों के अनुरूप बनाना। सन 2000 में किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण अधिनियम, 2000 और संशोधन अधिनियम, 2006 को पारित किया गया। यह एक व्यापक कानून है जो बच्चे की संवृद्धि और विकास के लिए न्याय और अवसरों की व्यवस्था करता है। यह अधिनियम भारतीय संविधान के प्रावधानों तथा राष्ट्र संघ बाल अधिकार सम्मेलन के चार मुख्य अधिकारों पर आधारित है। यह अधिनियम विकास संबंधी जरूरतों की पूर्ति द्वारा उचित देखरेख संरक्षण और उपचार की व्यवस्था करके और बच्चों के सर्वोत्तम हित में और उनके अंतिम पुनर्वास के लिए मामलों के अधिनिर्णय और व्यवस्था के मामले में बाल मैत्रीपूर्ण दृष्टिकोण अपना कर विधि के उल्लंघन की स्थिति में आए किशोरों और देखरेख और संरक्षण के जरूरतमंद बच्चों से संबंधित कानून को समेकित और संशोधित करता है।
यह अधिनियम राष्ट्र संघ बाल अधिकार सम्मेलन किशोर न्याय के प्रशासन के लिए राष्ट्र संघ के मानक न्यूनतम नियमों (बीजिंग नियमावली) 1985, स्वतंत्रता से वंचित किशोरों के संरक्षण के लिए राष्ट्र संघ नियमावली 1990; तथा अन्य सभी प्रासंगिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संधियों और सम्मेलन से सुसंगत है। साथ ही यह बालकों और बालिकाओं के 18 वर्ष से कम की एकरूप आयु से निम्न आयु का होने पर बच्चों के रूप में मान्यता देता है। इस अधिनियम की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह किसी व्यक्ति के अधिकारों की उस मामले में रक्षा करता है जब उसके बच्चा होने पर उसके साथ कोई घटना घटी हो और इस दौरान वह बच्चा न रहा हो और उसकी आयु 18 वर्ष से अधिक हो गई हो।
इस अधिनियम में किशोर अपराधी और उपेक्षित बच्चे के बीच स्पष्ट भेद किया गया है। इसका उद्देश्य किशोर न्याय परिषदों और बाल कल्याण समितियों की तथा प्रेक्षण गृह और विधि का उल्लंघन करने वाले बच्चों के लिए विशेष गृह और देखरेख व संरक्षण के जरूरतमंद बच्चों के लिए बात गृहों और आश्रय गृहाँ सहित विभिन्न प्रकार के गृहों की स्थापना करके दोनों वर्ग के बच्चों को न्याय और अक्सर उपलब्ध कराना है। यह अधिनियम दत्तक ग्रहण, पोषण, देखरेख, स्पॉसरशिप आदि जैसी गृह आधारित गैर-संस्थागत देखरेख के माध्यम से एक कानूनी पुनर्वास और सामाजिक पुनकीकरण (Reunification) का ढाँचा तैयार करता है।
किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण अधिनियम, 2000 को 2006 में संशोधित किया गया। था। संशोधनों का उद्देश्य पिछले अधिनियम को अधिक विस्तृत बनाना है और देश में उसके कार्यान्वयन का विस्तार करना था। इन संशोधनों का संबंध मुख्यत इन पहलुओं से है शीर्षक, परिभाषाएं, कुछ अभिव्यक्तियों को हटाना, किशोर न्याय बोड़ों और किशोर कल्याण समितियों के गठन के लिए निर्धारित समय, किशोर होने का दावा, देखरेख और संरक्षण के जरूरतमंद बच्चों और विधि का उल्लंघन करने वाले किशोरों के मामलों को निबटाने की कार्य प्रक्रियाएं, आदि यह संशोधित अधिनियम पहली बार "दत्तक ग्रहण की परिभाषा स्पष्ट रूप से प्रदान करता है और इसने बाल भिखारियों गली कूचों के बच्चों, कामकाजी बच्चों को इस वर्ग में शामिल करके देखरेख और संरक्षण के जरूरतमंद बच्चों के दायरे को और व्यापक बनाया है। यह अधिनियम राज्य को हर जिले के लिए एक किशोर न्याय बोर्ड बाल कल्याण समिति और एक विशेष किशोर पुलिस इकाई के गठन का आदेश देता है। किशोरों के मामलों के निबटरों में विलंबों के मुद्दे को हल करने के लिए यह अधिनियम यह विहित करता है कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट हर छह महीने पर बोर्ड के सम्मुख मामलों में विलम की समीक्षा करेगा और परिषद को अपनी बैठकों की बारंबारता को बढ़ाने का आदेश देगा या वह अतिरिक्त परिषदों का गठन भी करा सकता है। यह किशोरों के मामलों से निबटते समय बाल मैत्रीपूर्ण कार्य प्रक्रियाएँ अपनाने पर बल देता है।
अधिनियम यह निर्देशित करता है कि विधि का उल्लंघन करने वाले किसी किशोर या देखरेख और संरक्षण के जरूरतमंद किसी बच्चे के बारे में किसी समाचारपत्र, पत्रिका, दृश्य माध्यम में किसी भी रिपोर्ट में नाम, पता या विद्यालय का नाम, फोटो या कोई भी ऐसे विवरण नहीं दिया जाएगा, जिनसे किशोर या बच्चे की पहचान हो सके।
(किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण अधिनियम, 2000 को 2006 के संबंध में अधिक
• जानकारी के लिए देखें http://indiacode.nic.in/indiacodeinhindi/2006/Juvenile Justice (A) Act 2006.pdf) भारत की राजधानी दिल्ली में दिसंबर 2012 को हुए निर्भया बलात्कार कांड के बाद देश में अपराधिक मामलों में नाबालिगों की आयु को लेकर खासा विवाद उत्पन्न हुआ था। इसके पीछे मुख्य कारण इस घिनौने और निर्मम हत्याकांड को अंजाम देने वाले मुख्य आरोपी का नाबालिक होना था। निर्भया कांड के नाबालिग दोषी की रिहाई पर देश में उठी तमाम बहसों के बाद जुवेनाइल जस्टिस बिल 22 दिसंबर 2015 को राज्यसभा में पारित हो गया. निर्भया कांड के दोषी नाबालिग की रिहाई के बाद आक्रोशित हुई जनता के दबाव में आकर लोकसभा तथा राज्यसभा में भी किशोर न्याय अधिनियम (बाल देखभाल और संरक्षण), 2015 पास कर दिया गया. अधिनियम पास हो जाने से अब जघन्य अपराध करने वाले 16-18 आयुवर्ग के बच्चों पर वयस्कों की तरह मुकदमा चलाए जाने का रास्ता साफ हो गया। हालांकि उन्हें सजा 21 साल की उम्र के बाद ही दी जा सकेगी। इस अधिनियम ने मौजूदा किशोर न्याय अधिनियम 2000 की जगह ली है। किशोर न्याय अधिनियम (बाल देखभाल और संरक्षण), 2015 अधिनियम के कुछ प्रमुख प्रावधान निमन्वत है
• इसके तहत ऐसे नाबालिग, जिनकी उम्र 16 साल या उससे ज्यादा है और उसकी संलिप्तता किसी गंभीर अपराध में पाई जाती है तो उन्हें बालिग मानकर मुकदमा चलाया जाएगा और उसी हिसाब सजा का प्रावधान भी होगा. इसके अलावा जुबेनाइल जस्टिस बोर्ड को नाबालिगों को नियमित अदालत ले जाने या सुधार केंद्र भेजने का फैसला लेने का अधिकार मिलेगा मौजूदा किशोर न्याय अधिनियम के तहत सिर्फ तीन साल की सजा का प्रावधान है,
• अधिनियम में हर जिले में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड और बाल कल्याण समिति का गठन करने का प्रावधान किया गया है.
• बिल पारित होने के बाद 16 या उससे अधिक उम्र के नाबालिगों के जघन्य अपराधों में शामिल होने की स्थिति में उनके खिलाफ बालिग के हिसाब से मुकदमा चलाने का निर्णय जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड लेगा
• हर जिले की बाल कल्याण समिति ऐसे नाबालिगों की संस्थात देखभाल करेगी हर समिति एक अध्यक्ष और चार सदस्य होंगे, जो बच्चों से जुड़े मामलों के विशेषज्ञ होंगे
• अधिनियम के तहत बच्चों के गोद लेने की प्रक्रिया को भी विधिसम्मत बनाया गया है. साथ ही गोद लेने वाले अभिभावकों की योग्यता भी तय की गई है सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स एजेंसी (सीएआरए) गोद लेने की प्रक्रिया से जुड़े नियम बनाएगी जिसे हर जिले में लागू करवाने की जिम्मेदारी बाल कल्याण समिति की होगी. अत: वर्तमान में 15 जनवरी, 2016 से भारत में यह कानून लागू हो गया है जिसके अंतर्गत अपराधिक मामलों में नाबालिग आयु 16 वर्ष कर दी गई है।
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