चिकित्सकीय समाज कार्य : Medical Social Work
चिकित्सकीय समाज कार्य : Medical Social Work
अस्पतालों में रोगियों को मनो-सामाजिक रूप सहायता देने के लिए चिकित्सकीय समाज कार्य का उद्भव हुआ। इसे अस्पताली समाज कार्य के नाम से भी जाना जाता है। प्रो राजाराम शाखी (2015) अपनी किताब समाज कार्य में चिकित्सकीय समाज कार्य के उद्भव के चार स्तरों की बात करते हैं.
1. 1880 में इंग्लैंड में अस्पतालों से मुक्त हुए मानसिक रोगियों की उत्तरचर्या के विचार
2. 1890 में सर चार्ल्स एस. लांच द्वारा लंदन में स्वायसेवी स्वागत कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया की मान्यता सेवा कार्य
3. 1893 में न्यूयार्क के हेनरी स्ट्रीट सेटलमेंट हाउस से संबंधित लिनियन बाल्ड तथा मैरीब्रीडस्ट द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर बीमार व्यक्तियों की सेवा-सुश्रुषा करना
4. 1902 में बाल्टीमोर स्थित जॉन हॉपकिन्स विश्वविद्यालय में डॉ. चार्ल्स पी० एमर्सन द्वारा चिकित्सा शास्त्र शिक्षा में सामाजिक और संवेगिक समस्या के अध्ययन की व्यवस्था करने के लिए किया गया आवेदन
उनका मानना है कि इन्हीं अनुभवों के आधार पर 1905 में चिकित्सकीय समाज कार्य की शुरुआत हुई। इस कार्य की शुरुआत एक साथ चार जगह पर लगभग एक ही समय पर शुरू हुई। बोस्टन मैसाच्युसेट्स जनरल हॉस्पिटल न्यूयार्क के बेलेब्यू हॉस्पिटल बाल्टीमोर स्थित जॉन हॉपकिन्स हॉस्पिटल तथा बोस्टन के अपंगाश्रम में सामाजिक कार्यकर्ता को स्टाफ में शामिल किया गया। ब्रिटेन में 1918 में डॉ. इला वेब (Dri Ella Webb) द्वारा अल्मोनर्स (Almoners) हॉस्पिटल में अस्वस्थ बच्चों के लिए डिस्पेंसरिज में चिकित्सकीय समाज कार्य का काम शुरू हुआ 1945 में इंस्टीट्यूट ऑफ अल्मोनर्स का स्वरूप प्राप्त किए हुए इस अस्पताल का नाम 1964 में बदलकर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल सोशल वर्कर्स रखा गया। भारत जैसे देशों में इसका समर्थन इस बात से किया जाता है कि यहाँ डॉक्टरों की संख्या कम है और सभी मरीजों के साथ परामर्शन करना संभव नहीं है इसलिए आज भारत जैसे देशों में भी बड़े-बड़े अस्पतालों में चिकित्सकीय समाज कार्य शुरू है। चिकित्सकीय सामाजिक कार्यकर्ता को परिभाषित करते हुए कॉलिन्स डिक्शनरी में लिखा है, "एक ऐसी व्यक्ति जो अस्पताल में काम करती हो और जिसका काम रोगियों और उनके परिवारों के लिए परामर्श को सुनिश्चित करना साथ ही छुट्टी पाए हुए रोगियों को समुदाय में उचित देखभाल प्राप्ति के लिए जिम्मेदार भी है।"
दिल्ली विश्वविद्यालय के समाज कार्य से संबंध रखने वाले प्रो. पाठक एच एस. (1961) के अनुसार चिकित्सकीय समाज कार्य उन रोगियों को सहायता प्रदान करने से संबंधित है जो सामाजिक व मनोवैज्ञानिक कारकों के कारण उपलब्ध चिकित्सकीय सेवाओं का प्रभावी उपयोग करने में असमर्थ होते हैं।"
प्रो. राजाराम शास्त्री (2015) के अनुसार चिकित्सकीय समाज कार्य का मुख्य ध्येय यह होता है कि वह चिकित्सकीय सहूलियतों का उपयोग रोगियों के लिए अधिकाधिक फलप्रद एवं सरल बनायें तथा चिकित्सा में बाधक मनोसामाजिक दशाओं का निराकरण करा दूसरी ओर अमेरिकन सामाजिक कार्यकर्ता संघ के अनुसार चिकित्सकीय समाज कार्य स्वास्थ्य एवं चिकित्सकीय देखरेख के क्षेत्र में समाज कार्य की पद्धतियों एवं दर्शन का उपयोग एवं स्वीकरण है। चिकित्सकीय समाज कार्य समाज कार्य के ज्ञान के उन पक्षों को वर्गीकृत कर उसका विस्तृत उपयोग करता है, जो स्वास्थ्य व चिकित्सा संबंधी समस्याओं से ग्रस्त व्यक्तियों की सहायतार्थ विशिष्ट रूप से उपयुक्त हैं।
चिकित्सकीय समाज कार्य का निहितार्थ संक्षेप मे
1. चिकित्सकीय समाज कार्य का अभ्यास क्षेत्र चिकित्सालय है।
2. चिकित्सकीय समाज कार्य का केंद्रबिंदु रोगी एवं उसके परिज है।
3. चिकित्सकीय समाज कार्य का संबंध चिकित्सकीय स्थितियाँ एवं उपचार वाली मनोसामाजिक समस्याओं से (9) संक्षेप में कहें तो स्वास्थ्य के विकास रोग निवारण तथा उपचार के क्षेत्र में समाज कार्य की प्रणालियों व तकनीकि के उपयोग को ही चिकित्सकीय समाज कार्य कहा जाता है। जैसे कि समाज कार्य का विश्वास है स्वस्थ जीवन व्यतीत करने का अवसर प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है। स्वास्थ्य मानव जीवन का महत्वपूर्ण पक्ष है जिसके बिना व्यक्ति अन्य क्षेत्रों में कोई उपलब्धि नहीं हासिल नहीं कर सकता है। निर्धन रोगियों की सेवा के सिद्धांत के आधार पर चिकित्सालयों की स्थापना हुई, जो आज के आधुनिक स्वरूप तक विकसित हो चुकहै। इसी प्रकार बाह्य रोगियों की सहायतार्थ निदानशालाओं व औषधालयों की स्थापना की गई। चिकित्सालय का प्रमुख उद्देश्य समुदाय की स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं की प्रभावशाली ढंग से पूर्ति करना है। व्यक्ति चिकित्सालय में इस अपेक्षा के साथ आता है कि हर बीमारी का निश्चित एवं कम समय में इलाज में उपलब्ध है।
एक सामान्य व्यक्ति चिकित्सालय को हर बीमारी का उपचार समझता है। चिकित्सालय की अपनी सीमाएँ होती है यह स्थिति रोगी एवं उसके रिश्तेदारों को स्वीकार नहीं होती है उनकी माँग अधिक देखभाल एवं तुरंत उपचार की होती है। हर रोगी लीत देखभाल चाहता है। रोगी एवं उनके रिश्तेदार अस्पताल में कार्यरत कर्मियों से अपने प्रति सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार की अपेक्षा करते हैं। रोगी की गरिमा रोगी का एक महत्त्वपूर्ण अधिकार एवं आवश्यकता है। रोगी की उत्तम देखभाल के लिए चिकित्सालय में कार्यरत सभी लोगों के योगदान की आवश्यकता होती है। चिकित्सालय एक संगठनात्मक व्यवस्था है जिसमें कई विभाग होते हैं, जिनकी स्वायत्त स्थिति होती है एवं उन्हें अपने कार्यों के प्रबंधन करने के तरीकों का विवेकाधिकार होता है। सबसे महत्वपूर्ण कार्य इन सभी विभागों के कार्यों में समन्वय करके उन्हें रोगी की अपेक्षाओं के अनुरूप बनाना होता है।
यह सर्वमान्य हो चुका है कि रोगी के सुधार में औषधि जितनी महत्वपूर्ण है उतनी ही महत्वपूर्ण सामाजिक मानसिक स्थितियाँ भी है। स्वास्थ्य की आधुनिक अवधारणा में चिकित्सकीय समाज कार्य चिकित्सालयों में उपचारात्मक एवं निरोधात्मक पक्ष में कार्यरत होता है साथ ही शारीरिक और सामाजिक पक्ष की अच्छी समझ से इसे बेहतर बनाने की कोशिश करता है।
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