वृद्धावस्था - Old Age
वृद्धावस्था - Old Age
वैश्विक स्तर पर वृद्ध जनसंख्या की बढ़ोतरी को लेकर काफ़ी चिंता जताई जा रही है। चिकित्सा सुविधाओं के बढ़ोतरी से मानव के जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) में वृद्धि हुई है। यु एस. ब्यूरो ऑफ़ व सेन्सस के अनुसार सन 2000 में वृद्धों की वैश्विक जनसंख्या420 मिलियन मानी जा रही थी, जिसमें वृद्धि होकर 2025 तक 761 मिलियन तक पहुँच जाएगी। इसका अर्थ है कि सन 2025 तक प्रत्येक सातवाँ व्यक्ति 65 आयु प्राप्त कर चुका होगा। औद्योगिक और विकसित राष्ट्रों में वृद्धजनसंख्या नाटकीय ढंग से बढ़ रही है। पश्चिमी यूरोपीय देशों में उच्च जीवन प्रत्याशा नापी गई है। जापान जैसे विकसित देश में इस बढ़ोतरी को सन 2000 में 17 प्रतिशत नापा गया।
दक्षिण एशिया और उप सहारा आफ्रिका में वृद्धों का वृद्धि दर अंतर्विरोधाभासी रूप से3 प्रतिशत है। अगर आने वाले समय में विकासशील देशों में स्वच्छता न्यूट्रीशन तथा चिकित्सा सेवा का वितरण ठीक रहा तो वहाँ पर भी वृद्ध जनसंख्या में बढ़ोतरी होगी। यहाँ सन 1975 में वृद्ध जनसंख्या का वृद्धिदर 8 प्रतिशत था, जो सन 1995 में बढ़कर 17 प्रतिशत होने की आशंका जताई गई थी। फिलहाल विकसित राष्ट्रों में विश्व की कुल वृद्ध आबादी के 70 प्रतिशत निवास कर रही है। वह सारे आंकड़े वृद्ध जनसंख्या के वृद्धि दर को दर्शा रहें हैं। विश्व में विकसित राष्ट्रों के लिए, वृद्ध जनसंख्या एक समस्या बनी हुई है। ऐसे में भारत जैसे विकासशील राष्ट्र के लिए यह एक चुनौती का विषय है।
अब तक भारत के वृद्ध कृषक समाज रचना के परिवारों पर निर्भर रहते रहे हैं। किंतु भारत में भी औद्योगिक युग के प्रारंभ और विकास के कारण वृद्धों की आलंबन आवश्यकताओं और अपेक्षाओं में पर्याप्त परिवर्तन आया है। संक्रमण काल एवं नई व्यवस्था की माँगों के अनुरूप समय पर पर्याप्त ध्यान न देने के कारण सामाजिक-सांस्कृतिक रचना और उनके उपलब्धि की विरासत पर आघात पहुँचता है। बृद्धावस्था स्वयं में एक समस्या है। इसके बावजूद वृद्धावस्था में व्यक्ति को विभिन्न समस्याओं जैसे शारीरिक, मानसिक, सामाजिक-सांस्कृतिक एवं पारिवारिक आदि से जूझना पड़ता है।
भारत सरकार की वृद्ध स्थिति विश्लेषण रिपोर्ट (2011) में बताया गया है कि 65 प्रतिशत वृद्ध अपनी दैनंदिन सुविधाओं की प्राप्ति के लिए दूसरों पर निर्भर है।0 प्रतिशत वृद्ध महिला जिसमें प्रमुखता से पुरुष आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं। 6-7 प्रतिशत ऐसे वृद्ध पुरुष है जो अपनी पत्नी को आर्थिक सहयोग प्रदान करते हैं। 85 प्रतिशत वृद्ध अपने बच्चों पर आर्थिक रूप से निर्भर है, 2 प्रतिशत अपने नाते-पोते पर आश्रित है तथा 6 प्रतिशत अन्य पर आश्रित हैं। वृद्ध महिलाओं में20 प्रतिशत से कम अपने पति पर निर्भर हैं, 70 प्रतिशत से अधिक अपने बच्चों पर आर्थिक रूप से निर्भर हैं 3 प्रतिशत अपने बच्चों के बच्चों पर तथा 6 प्रतिशत वृद्ध महिलाएं उन लोगों पर निर्भर है इनके नाते-संबंधी नहीं है।
2002 के आँकड़े बताते हैं कि ग्रामीण इलाके के वृद्धव्यक्तियों में से 50 प्रतिशत लोगों की मासिक प्रति व्यक्ति खर्च का स्तर 420 रुपये से 775 रुपये के बीच है और शहरी इलाके के वृद्ध व्यक्तियों का 665 रूपये से 1500 रूपये के बीच प्रति व्यक्ति खर्च का स्तर है। इतना ही नहीं 75 प्रतिशत से ज्यादा वृद्ध पुरुष और 40 प्रतिशत से कम वृद्ध महिलाएं अपने साथी के साथ जीवनयापन कर रही हैं। बाकी 20 प्रतिशत वृद्ध पुरुष और इसमें से आधी वृद्ध महिलाएं अपने बच्चों के साथ जीवनयापन कर रही हैं। इन आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में वृद्धों की स्थिति कितनी भयावह है। वृद्धावस्था जिसे दूस बचपन के रूप में परिभाषित किया जाता है, ऐसे में उन्हें विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है और उसी समय बुनियादी संकट पर नकेल कसने लगते हैं। शुरूआती समय में परिवार में वृद्धों की एक खास जगह होती थी, किंतु परिवार विघटन की समस्या ने वृद्धों को अपने ही घरों से बर होने पर मजबूर किया है। जिस समय में वृद्धों को परिवार की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है उस समय उन्हें अकेलेपन का दंश झेलना पड़ता है।
अनगिनत समस्याओं के घेरे में वृद्ध अपने आप पहुंच जाता है जिसका अंत उसके अपने अंत तक नहीं होता है। नई नीतियों और बदली हुई सोच ने फिर से वृद्धों को समाज में समायोजित करने के लिए विभिन्न योजनाओं का निर्माण किया है। उनके कल्याण हेतु अलगअलग कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इन सब का एक मात्र उद्देश्य है, वृद्धों को सहायता प्रदान करना। इस इकाई में हम वृद्धों के स्थितियों को समझते हुए उनके सहयोग के लिए बनी सेवाओं के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे। साथ ही समाज कार्य के अंतर्गत राविज्ञानी समाज कार्य (Geriatric Social Work) के रूप में एक क्षेत्र का उभार हुआ है, उससे भी होंगे।
प्रत्येक जीव की तीन अवस्थाएँ होती हैं, उत्पत्ति, विकास और हासा मनुष्य जीवन में हास की ओर अग्रसर होने की शुरुआत वृद्धावस्था से होती है। इस अवस्था का प्रारंभ50 वर्ष की आयु से आगे माना जाता है और जीवन के शेष समय तक यह अवस्था रहती है। इस अवस्था में हास की गति तीव्र हो जाती है और व्यक्ति में शारीरिक एवं मानसिक दुर्बका आने लगती है। स्मरण शक्ति कमजोर पड़ने के कारण समायोजन की समस्या स्थायी स्वरूप धारण कर लेता है। व्यक्ति में रूढ़िवादिता बढ़ जाती है और उसमें हीनता की भावना उत्पन्न होने की संभावना होती है। नई पीढ़ी के साथ बुजुर्गों का संबंध संतोषजनक ही रहता और वे अकेले पड़ जाते हैं। समन्वय का अभाव उन्हें असहाय अवस्था में पहुंचा देता है। नया कुछ करने की प्रवृत्ति के हास के कारण इस अवस्था में एक स्थायी मानसिकता उत्पन्न होती है। वृद्ध से तात्पर्य है जीवन का अंतिम पड़ाव लेकिन इस अवस्था को सीमांकित नहीं किया जा सकता, क्योंकि प्रत्येक समाज में इसका एक जैसा अर्थ नहीं होता और नाही इसे वैश्विक रूप में व्याख्यायित किया जा सकता है। आमतौर पर 60 साल की उम्र का अर्थ होता है मुद्धा
1999 के भारत सरकार के वृद्ध व्यक्तियों पर राष्ट्रीय नीति में 'वरिष्ठ नागरिक' या वृद्ध से तात्पर्य है ऐसा व्यक्ति, जिसकी आयु 60 या उससे आगे है।" इसी बात को 2007 में बने वृद्ध अधिनियम में दोहराया गया है। इस अधिनियम के अनुसार वरिष्ठ नागरिक से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो भारत का नागरिक है और जिसने साठ वर्ष या अधिक आयु प्राप्त कर ली है लेकिन वैश्विक स्तर पर वृद्धावस्था का वर्गीकरण दो वर्गों में मिलता है
60 साल से 74 साल की आयु मर्यादा के व्यक्ति को वृद्ध (Younger Old)
75 साल से आगे की आयु के व्यक्ति के लिए अतिवृद्ध(Oldest Old) इस इकाई में हम भारतीय परिप्रेक्ष्य के अंतर्गत वृद्धों की समस्याएँ और उनके समायोजन, कल्याण हेतु में उपलब्ध सेवाओं के बारे में चर्चा करेंगे। इसलिए 50 वर्ष की आयु के आगे के सभी व्यक्तियों के लिए यहाँ 'वृद्ध' शब्द उपयोग किया गया है।
वृद्धावस्था की कोई वैश्विक परिभाषा नहीं है जो सर्वमान्य हो, प्रत्येक सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में
इसका आशय अलग है। बावजूद इसके विद्वानों ने वृद्धावस्था को परिभाषित किया है जिसमें से कुछ
विद्वानों के विचारों को यहाँ दिया जा रहा है एलिजाबेथ बी हरलांक वृद्धावस्था को व्याख्याथीत करते हुए कहते हैं, वृद्धावस्था एक पतनोन्मुख अवस्था है तथा यह दूसरा बाल्यकाल है। उनके अनुसार मानसिक और शारीरिक हासोन्मुख क्षमताएं पहले तो हलके रूप में होती हैं और इनकी पूर्तिपूर्व-जीवन के ज्ञान के उपयोग से हो जाती है। वृद्धावस्था के साथ व्यक्ति में क्रय-शक्ति और प्रतिक्रिया की गति में शिथिलता आने लगती है, किंतु वह इसकी पूर्ति कौशल विकास करके कर सकता है। वृद्धावस्था में हास की गति धीमी और क्रमगत हो साथ ही उसकी क्षतिपूर्ति की जा रही है तो उसे जरागमन की अवस्था कहते हैं। यह अवस्था50 से 65 वर्ष के बीच होती है। इसके बाद की अवस्था जराजीर्ण अवस्था कहलाती हैं जिसमें व्यक्ति व्यक्तिगत भेद के अनुसार कमोबेश भुलक्कड़ लापरवाह, सामाजिक रूप से विमुख तथा एकाग्रचित्त की कमी से ग्रसित होता है ?"
भाटिया(1983) ने वृद्धावस्था को तीन दृष्टिकोणों से परिभाषित किया है। इस कारण हम इस परिभाषा को व्यापक सर्वव्यापि परिभाषा (Umbrela Defination) के रूप में देख सकते हैं। इसके अनुसार वृद्धावस्थाको तीन आयामों से परिभाषित किया जा सकता है जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक-सांस्कृतिक
● जैविक वृद्धावस्था से तात्पर्य है बालों में सफेदी दाँतों की हानि और दृष्टि की स्पष्टता का स
● मनोवैज्ञानिक रूप से वृद्धावस्था के संदर्भ में तंत्रिका तंत्र का अध्ययन किया जाता है इसमें मानसिक क्षमताओं में गिरावट उनके प्रति दूसरों के दृष्टिकोण और व्यवहार शामिल हैं।
• सामाजिक सांस्कृतिक दृष्टिकोण परिवार समुदाय और समाज के सदस्य के रूप में व्यक्ति में परिवर्तन और बदलती परिस्थितियों को दर्शाता है। इन परिवर्तनों को माता-पिता की भूमिका काम से सेवानिवृत्ति कम आय, रोग, विकलांगता और उनकी जरूरतें शामिल हैं।
• सामाजिक सांस्कृतिक दृष्टिकोण परिवार समुदाय और समाज के सदस्य के रूप में व्यक्ति में परिवर्तन और बदलती परिस्थितियों को दर्शाता है। इन परिवर्तनों को माता पिता की भूमिका काम से सेवानिवृत्ति कम आय रोग, विकलांगता और उनकी जरूरतें शामिल हैं।
ज्ञान शांति मैत्री पी. बी. लैम्कर ने वृद्धा की शारीरिक अवस्था का वर्णन करते हुए लिखा है कि वृद्धावस्था में शारीरिक गिरावट की गति अपेक्षाकृत तेज हो जाती है और लंबी बीमारी तथा अक्षमताओं की उपस्थिति में वृद्धि हो जाती हैं।
डॉ. ऋचा (1996) अपने आलेख वृद्ध कल्याण' में वृद्धावस्था का वर्णन करते हुए लिखती हैं कि "वृद्धावस्था की अपनी विशेष समस्याएँ होती हैं। इनमें से कुछ का संबंध तो शारीरिक परिवर्तनों सेहोता है जैसे-शक्ति या बल का हास तथा मानवीय पर्यावरण के परिवर्तन जैसे जीवन साथी मित्र या परिजनों की मृत्यु और कार्य से अवकाश और समाज का बदला हुआ व्यवहार इसका दूसरा रूप है।
जी. एल. शर्मा (2015) अपनी पुस्तक सामाजिक मूदे में वृद्धावस्था के बारे में लिखते हैं कि
"वृद्धावस्था जीवन की शाम है। इस शाम के गहराने के साथ ही वृद्धावस्था से जुड़ी अनेक समस्याएँ सर
उठाने लगती हैं और जीवन की यह शाम चोझिल होने लगती है। वस्तुत वृद्धावस्था अपने आप में एक
ऐसी बीमारी है, जिससे उबार पाना इस उम्र में संभव नहीं हो पाता।"
उक्त परिभाषाओं से ज्ञात होता है कि वृद्धावस्था एक समस्या है। विद्वानों के परिभाषाओं से निम्न बिंदु निकल कर सामने आते हैं.
1. वृद्धावस्था शारीरिक, मानसिक क्षमताओं के हास की अवस्था है।
2. वृद्धावस्था को दो रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है जरागमन और जराजीर्ण 3. वृद्धावस्था एक खास आयु वर्ग का स्थायी भाव है
4. वृद्धावस्था समस्याओं का जटि Complex) रूप है
5. वृद्धावस्था मानवीय जीवन का यथार्थ है।
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