जाति की उत्पत्ति - Origin of Caste
जाति की उत्पत्ति - Origin of Caste
भारतीय जाति प्रथा अत्यधिक जटिल संस्था है। भारत में जाति की उत्पत्ति के संबंध में अलग-अलग मैत्री, सिद्धांत प्रतिपादित किए गए है। जाति की उत्पत्तिके संबंध में निम्नवत सिद्धांत प्रमुख माने जा सकते हैं
1. परंपरागत सिद्धांत
इस सिद्धांत की विवेचना मनु ने प्रस्तुत की है और इसकी सबसे प्राचीन व्याख्या ऋग्वेद की ऋचाओं में मिलती है। इस सिद्धांत के अनुसार ब्राह्मण ब्रह्म के मुख से क्षत्रीय बाहु से, वैश्य जाँघ से और शूद्र पैर से पैदा हुए है। मनु ने इसी आधार जाति के कार्यों को निश्चित कर दिया है। ब्राह्मणों की उत्पत्ति मुख से हुई इसलिए ब्राह्मणों का कार्य अध्ययन करना, शिक्षा देना आदि है, जिससे वेदों की रक्षा हो सके। बाँह शक्ति का द्योतक है, इसलिए क्षत्रियों का कार्य शक्ति संबंधित कार्य था। वैश्यों का कार्य कृषि करना व्यापार करना आदि है, और पैरों से उत्पत्ति होने के कारण शूद्रों का कार्य ऊपर के तीनों वर्णों की सेवा करना है।
2. धार्मिक सिद्धांत:
इस सिद्धांत के प्रवर्तकों में होकार्ट और सेनार्ट इन दो विद्वानों का नाम उल्लेखनीय है। होकार्ट का सिद्धांत इनके अनुसार समाज का विभाजन धार्मिक सिद्धांतों और प्रथाओं के कारण हुआ है। इनका कहना है कि जाति प्रणाली देवताओं को भेंट चढ़ने का संगठन है। प्राचीन भारत में धर्म का महत्व अत्यधिक था और उसकी एक सामान्य अभिव्यक्ति देवताओं को बलि चढ़ाने की प्रथा थी। पशुओं को बलि देने का काम करने को प्रत्येक व्यक्ति राजी नहीं हो सकता, क्योंकि इस प्रकार पशुओं की हत्या धर्म से सम्बद्ध होने पर भी कुछ निकृष्ट या अपत्रि स्तर का कार्य है। अतः ऐसे कार्यों को करने के लिए कुछ ऐसे लोगों की सेवाओं की आवश्यकता हुई, जिनकी स्थिति समाज में नीची थी, जो वास आदि होते थे। कालांतर में आर्थिक कृत्यों से सबद्ध विशिष्ट सेवाओं को करने वालों का एक अलगअलग समूह बन गया और जाति प्रथा की उत्पत्ति हुई। सेनार्ट के सिद्धांत में हेकार्ट के द्वारा दिए गए सिद्धांत की कमियों को दूर करने का प्रयत्न किया है। इन्होंने भोजन संबंधी निषेध के आधार पर जाति प्रथा की उत्पत्ति को समझाया है।
3. प्रजातीय सिद्धांतः
इस सिद्धांत का प्रतिपादन हरबर्ट रिजले द्वारा किया गया है। इनके सिद्धांत का अनुमोदन घुर्ये, मजूमदार, वैस्टरमार्क और आदि विद्वानों ने किया है। इस सिद्धांत के अनुसार संस्कृतियों के संघर्ष तथा प्रजातियों के संपर्क से भारत में जाति के निर्माण की प्रक्रिया संभव हुई। रिजले ने जाति प्रथा के विकास के क्रम में छह प्रक्रियाओं का विश्लेषण किया है जो निम्नलिखित है.
1. परंपरागत व्यवसाय में परिवर्तन
II.प्रव्रजन
III. रीति-रिवाजों में परिवर्तन
IV. पुरानी परंपराओं की सुरक्षा
V. हिंदुओं की श्रेणी में अपने आपको मिलाना
4. राजनैतिक सिद्धांत
प्रारंभिक यूरोपीय विद्वानों ने जाति प्रथा को ब्राह्मणों द्वारा आयोजित एक चतुर और राजनैतिक योजना का रूप दिया है। इस सिद्धांत से श्री अबे डुबोयस का नाम विशेष रूप से जुड़ा हुआ है। इनके अनुसार जाति प्रथा ब्राह्मणों के लिए और ब्राह्मणों के द्वारा बनाई गई एक चतुर योजना है, जो कि ब्राह्मणों ने अपनी सत्ता को चिरस्थायी बनाए रखने के लिए रची 1" अन्य प्राचीन संस्कृतियों की भांति भारतवर्ष में भी प्राचीनकाल में धर्म का महत्व अत्यधिक थी।" था और धर्म से संबंधित व्यक्तियों अर्थात ब्राह्मणों की सामाजिक स्थिति सर्वमान्य रूप से सबसे ऊँची रही। अपनी इस ऊंची स्थिति से फायदा उठाने के लिए ब्राह्मणों ने चतुराई से काम लिया और सामजिक संस्तरण की एक ऐसी योजना बनाई जिनके अंतर्गत उनका अपना स्थान सबसे उंचा रहा है और उन समर्थकों को दूसरा स्थान मिला जो कि अपने बाहुबल से ब्राह्मणों के स्वार्थ की रक्षा कर सकें। अपनी स्थिति से ही लाभ उठाकर ब्राह्मणों ने यह प्रमाणित कर दिया कि उनका तथा उनके समर्थकों का पेशा अन्य लोगों से श्रेष्ठ है। जाति प्रथा की उत्पत्ति इसी के परिणामस्वरूप हुई।
5. व्यवसायिक सिद्धांत
इस सिद्धांत का प्रतिपादन नेसफील्ड द्वारा की गई। इनके सिद्धांत का केंद्रीय भाव यह है कि पेशा और केवल पेशा ही जाति प्रथा की उत्पत्ति के लिए उत्तरदायी है।" इसे और स्पष्ट करते हुए इन्होंने कहा है कि विभिन्न जातियों में भेद केवल पेशा या कार्य के आधार पर है और पेशे की ऊंच-नीच या अच्छाई बुराई के अनुसार ही जाति का संस्तरण हुआ है। यह संस्तरण स्वाभाविक है और सभी समाजों में विद्यमान हैं। इस संदर्भ में नेसफील्ड का कहना है कि जाति प्रथा के संबंध में धर्म का कोई भी महत्व नहीं है और न ही प्रजातीय सम्मिश्रण या शारीरिक लक्षणों के आधार पर जातियों को एक दूसरे से अलग किया था। जो कुछ भी भिन्नता या भेदभाव है, वह सभी पेशों की ऊंच नीच पर आधारित है।
6. आर्थिक या उद्विकासीय सिद्धांत
इस सिद्धांत का प्रतिपादन श्री डेनजिल इबेटसन द्वारा किया गया है। इनका मानना है कि जाति-प्रथा की उत्पति चार वर्गों के आधार पर नहीं, बल्कि आर्थिक संघों से हुई है। वर्ग से संघ और संघ से जाति का विकास हुआ है।
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