स्वास्थ्य सेवा प्रणाली का सिंहावलोकन - Overview of the Healthcare System

स्वास्थ्य सेवा प्रणाली का सिंहावलोकन - Overview of the Healthcare System

भारतीय इतिहास में हम देखते है कि मानवीय स्वास्थ्य को लेकर उस समय में लोग कितने सजग थे। चरक संहिता सुश्रुत संहिता आयुर्वेद के रूप में इसके साक्ष्य भी हमें मिलते हैं। दूसरी ओर एक तबका व्यक्ति के बुरे स्वास्थ्य को दैवी प्रकोप भूतबाधा, पापों का परिणाम साधु महात्माओं का प्रकोप या शाप का परिणाम मानता गया इसलिए इनके सामने अच्छे स्वास्थ्य प्राप्ति की भ्रामक संकल्पनाएँ पाई जाती हैं, जैसे- झाड़-फूंक बलि चढ़ाना, पूजा अर्चना आदि।


वर्तमान में विज्ञान के प्रचार-प्रसार के बाद चिकित्सा विज्ञान (medical science)का उभार अपनी विभिन्न उपशाखाओं के साथ हुआ। स्वास्थ्य सेवाओं के संस्थानीका के बाद अस्पताल जैसी संस्थाओं ने स्वास्थ्य की जिम्मेदारी को बखूबी वहन किया है। इसमें व्यक्ति के बुरे स्वास्थ्य को रोग (Disease) के रूप में परिभाषित किया गया। रोग के उत्पन्न होने के कारकों की खोज लगातार जारी है, क्योंकि प्रतिदिन नव-नवीन रोगों एवं महामारियों (epidemic) का प्रसार हो रहा है भूमंडलीकरण के दौर में विश्व एक गाँव की तरह बन गया है जैसे प्रत्येक चीज़ का लेन-देन बड़ी तीव्रता से हो रहा है।

ऐसे में रोगों का लेनदेन भी तीव्रता से हो रहा है इसलिए एइस टी. बी. जैसे संक्रामक रोगियों की संख्यालगातार बढ़ती जा रही है। रोग से तात्पर्य होता है शरीर में कुछ अवांछित लक्षणों की उपस्थिति किंतु यह यहाँ तक सीमित नहीं होता है, बल्कि उन प्रक्रियाओं का गतिशिल समूह हैजो लक्षणों द्वारा शारीरिक रोग को उत्पन्न करता है। व्यक्ति के शरीर में रोग उत्पत्ति करने में विभिन्न कारक सहायक होते हैं। इन कारकों की खोज लगातार जारी है। चिकित्सा विज्ञान DNA. RNA, एवं Stem Cell तक पहुंच गया है। व्यक्ति में रोग उत्पत्ति में सहायक कारकों में से कुछ इस प्रकार से हैं जैविकीय, पोषण, रासायनिक, भौतिकीय, यात्रिकिय पर्यावरणीय, सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक, मानव व्यवहार और जेनेटिक आदि। इन कारकों में कमी या ज्यादा होना रोग निर्माण में सहायक सिद्ध होता है। रोग के कारकों एवं कारणों संबंधी जानकारी के पश्चात ही उनका निदान उपचार और पुनर्वास किया जाता है। ऐसा नहीं है कि केवल रोग होने के पश्चात ही चिकित्सा शुरू की जाए इससे बचने एवं संतुलन बनाएं रखने से भी


रोग का विरोध हो जाता है। इसे निवारणात्मक सेवा के रूप में देखा जाता है। इधर हाल में विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व की 14 प्रतिशत आबादी आज दबाव एवं स्नए मनोचिकित्सकीय (Neuropsychiatric) बीमारीयों के प्रभाव में है इसमें से ज्यादातर लोग निराशा की प्रकृति से संबंधित है और अन्य सामान्यमानसिक बीमारीयों, मादक पदार्थों का उपयोग तथा मनोविकृति संबंधी अन्य बीमारियों से ग्रस्त हैं।


प्राचिन समय में मानसिक बिमारियों से ग्रस्त लोगों को भूत-बाधा, प्रेत-बाधा के रूप में देखा जाता था। इन्हें पागलपन (Insanity) के रूप में भी परिभाषित किया जाता था। प्राचीन से लेकर आधुनिक काल तक सभ्यता के प्रत्येक युग में पागलपन' की अवधारणाएँ अलग-अलग रही, इसमें उस युग के सामाजिक दर्शन और तर्क पद्धति का प्रभाव देखा जाता है। पागलपन को अमेरिकन सायकियाट्रिक एसोशिएशन द्वारा पहली बार मानसिक बीमारी घोषीत किया। यहाँ तक पहुँचने के लिए अनेक विद्वानों का सहयोग रहा है।

मानसिक बीमारीयों का दो तरह से वर्गीकरण मनोचिकित्सा में मिलता है। पहला मनोस्नायु विकृति इसमें दबाव कुठा, तनाव आदि रोगों को रखा गया है। इस प्रकार के रोग व्यक्ति के जीवन में दैनंदिन रूप से होने वाले क्रियाकलापों में अड़चन पैदा करते हैं। एक स्त्र से ऊपर जाने के बाद ही इसका रूपांतरण बीमारी के रूप में होता है। इसलिए माना जाता है कि इससे बचने के लिए व्यक्ति अपने डिफेन्स मेकॅनिज्म और कोपींग मेकॅनिज्म का उपयोग कर संतुलन बनाता है या जो इसकी समझ रखता हो, के द्वारा इसको हल किया जा सकता है। दूसरे प्रकार में मनोविकृति (psychosis) को रखा गया है। इस वर्ग में बायोपोलर पर्सनालिटी स्किजोफ्रेनीया जैसे मानसिक बीमारीयों को रखा गया है। इन बिमारियों से मुक्ति के लिए प्रशिक्षित मनोचिकित्सक द्वारा देख-रेख एवं विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है। इन दो वर्गीकरणों के अलावा मानसिक मंदता या हीन बुद्धि और समाज विरोधी व्यक्तित्व के रूप में भी इसे देखा जाता है।