तृतीय पंथी जन के लिए अधिकारों का आंदोलन - Rights Movement for Third Gender People

अधिकारों का आंदोलन

आधुनिक पितृसत्तात्मक समाज में थर्ड जेंडर व्यक्ति अदृश्य ही रहा है। पहले समलैंगिकता को अपराध घोषित किया गया बाद में औपनिवेशिक काल के आपराधिक जनजाति अधिनियम के अंतर्गत हिजड़ा समुदाय को अपराधी माना गया। तब से लेकर आज तक कानून व समाज की मार थर्ड जेंडर समूह पर देखी जा सकती है। इनकी संवैधानिक स्थिति का अनुमानइसी बात से लगाया जा सकता है कि 1994 में जाकर इन्हें मतदान का अधिकार मिल सका वो भी पहचान पत्र महिला के रूप में अपनी पहचान की लड़ाई लड़ रहे इस समूह को 2011 के जनगणना में सेक्स वाले कालम में अन्य का विकल्प प्राप्त हुआ। एल.जी.बी.टी. समूह की यौनिकता को लेकर एक लगी बहस चल रही है। वैश्विक स्तर की तुलना में भारत में बहुत बाद में समलैंगिकता के पक्ष में आवाज उठाई गई तथा धारा 377 को निरस्त करने के लिए संवैधानिक बदलाव के लिए लड़ाई लड़ी गई। 

धारा 377 के नकारात्मक प्रभावों को देखते हुए इसके खिलाफ़ संघर्ष की शुरुवात 1993 को माना जा सकता है। जब एड्स भेदभाव विरोधी आंदोलन(ए. बी. बी. ए.) ने पुलिस उत्पीड़न के खिलाफ एक विरोध आयोजित किया था। इसी विरोध ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर धारा 377 को रद्द करने की भी बात रखी गई। दूसरा नकारात्मक पहलू तब सामने आया जब 1994 में डाक्टरों के एक समूह ने दिल्ली की एक जेल में कडोम वितरित किए जाने का सुझाव दिया, क्योंकि वहाँ कैदियों में समलैंगिक सेक्स हो रहे थे लेकिन जेल अधिकारियों ने कंडोम बाटने से मना कर दिया, क्योंकि समलैंगिक संबंध कानूनी रूप से अपराध है और कंडोम बाटने का अर्थ इसे जानबूझकर नजरअंदाज करदेना है। इसके कारण पहली बार एबी. वी.ए. ने धारा 377 को कोर्ट में चुनौती दी सुनवाई 2011 में हुई तो इन्हें बिना पता चले ही खारिज कर दिया गया।


अपराधीकरण के खिलाफ दूसरी मुहिम 2001 से ही शुरू हुई। जब नाज फाउंडेशन इंडिया ट्रस्ट और एच.आई.वी. एड्स पीड़ित लोगों की कानूनी सहायता के लिए कार्य कर रहे वकीलों के एक समूह ने दिल्ली हाईकोर्ट में धारा 377 से सहमति से बनाए गए बयस्क समलैंगिक संबंध का गैरअपराधीकरण के लिए याचिका दायर की यह पहला बड़ा व्यापक प्रयास था, जिसने एल.जी. बी. टी. समुदाय को इकट्टा किया तथा लोगों में जागरूकता लाने का प्रयास भी किया।

बॉक्स सं धारा 377 क्या है?

भारतीय दंड संहिता धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध): “जो भी कोई स्वेच्छा से किसी पुरुष महिला या पशु के साथ प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध कामुक संभोग करता है उसे आजीवन कारावास या फिर 10 वर्षों तक बढ़ाई जा सकती है और जुर्माना भी हो सकता है। धारा 377 की मुख्य बातें धारा यह स्पष्ट नहीं करती कि 'अप्राकृतिक यौन में क्या-क्या शामिल है, न ही यह सहमतियुक्त तथा जवरन यीन आचरण में कोई फर्क करती है।

• धारा के तहत यह स्पष्ट कहा गया है कि लिंग प्रवेश यौनिक संभोग को स्थापित करने के लिए पर्याप्त है।" इस व्याख्या के कारण इसमें मुख व गुदा भी शामिल हो जाता है। 

● विषमलैंगिक के संदर्भ में मुख व गुदा मैथुनशादी के अंदर भी प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध है। पूरे भारतीय कानून में यौनिक भिन्नता को कहीं भी मान्यता नहीं मिली हुई है। 

● यह धारा भिन्नता पर एकरूपता थोपता है और इस तरह यह भिन्न यौनिकता का अपराधिकरण करती है। नाज़ फाउंडेशन इंडिया से संबंधित याचिका के प्रमुख घटनाक्रम इस प्रकार से रही।

2002 जाइंट एक्शन कन्नूर ने धारा 377 को बनाए रखने के समर्थन में कोर्ट में हस्तक्षेप जारी किया। इसमें कहा गया था कि एच.आई.वी. की वजह से एड्स नहीं होता, और एच. आई. वी. को फैलने से रोकने के लिए इस कानून की ज़रूरत है। 

2003- भारत सरकार गृह मंत्रालय ने धारा 377 को बनाए रखने के लिए तर्क दिया कि कानून को समाज से अलग करके नहीं देखा जा सकता और समलैंगिकता भारतीय समाज के मूल्य और नैतिकता से मेल नहीं खाती।

2004- दिल्ली उच्च न्यायालय ने नाज की याचिका की इस वजह से खारिज कर दिया, क्योंकि धारा 377 से प्रभावित पक्ष वह नहीं है।

2006- नाज फाउंडेशन तथा लायर्स कलेक्टिव ने उच्चतम न्यायालय के सामने मामले को पुनर्विचार के लिए रखा। उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया कि याचिका खारिज किए जाने के पर्याप्त कारण नहीं थे और दिल्ली उच्च न्यायालय को इस मामले को सुनना ही होगा। मामले को मजबूत करने के लिए धारा 377 से प्रभावित लोग भी इसमें शामिल हुए तथा मानवाधिकार तथा स्त्री अधिकारों से संबंधित बहुत सारे संगठन धारा 377 के विरुद्ध खड़े हुए।

2006- स्वास्थ्य मंत्रालय के एक उपविभाग नाकों (NACO) ने नाज की याचिका के विचारों को सही ठहराते हुए एक शपथपत्र दायर किया। इसमें कहा गया कि धारा 377 के कारण वास्तव में एच.आई.वी. एड्स की जानकारी व रोकथाम के प्रयासों पर विपरीत असर पड़ता है.

2006- बी. पी. सिंघल (भाजपा नेता) ने हस्तक्षेप दायर किया, जिसमें कहा गया कि समलैंगिकता भारतीय मुरलीधर के सामने संस्कृति के खिलाफ़ है।

2008- सी.जे. शाह और जे. मुरलीधर के सामने मामला अंतिम बहस के लिए आया। 2009-2 जुलाई 2009 को दिल्ली उच्च न्यायालय के धारा 377 में सहमति से बनाए संबंध को मान्यता प्रदान की।

धारा 377 और मानवीय गरिमा के आधारभूत संवैधानिक सिद्धांतों के विरोधाभास को दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले से समझा जा सकता है। सही मायने में इस फैसले से जिन मानवीय मूल्यों की बात की जा रही थी, उसे व्यापकता प्रदान की गई। आपराधी मान लिए जाने से न वे अपनी पहचान जान पाए और न ही अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा पाए। धारा 377 जिन मूल्यों को बढ़ावा देता है वे यौनिकता के इर्द-गिर्द शर्म, गोपनियता तथा अपराधबोध की भावना है। ये वे हथियार है जो पितृसत्ता के लिए बहुत फायदेमंद साबित हुए है क्योंकि इसी कारण से विभिन्न यौनिक झुकाव वाले लोग तथा महिला अपना चुनाव नहीं कर पाती है। अब जब लोग अपनी यौनिकता और पहचान को समाज के सामने रख रहे हैं, ऐसे में उनकी यौनिकता को संस्कृति के विरुद्ध अप्राकृतिक या पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव कहकर नकार नहीं सकते हैं। एक लंबी बहस समलैंगिकता के अपराधीकरण को मानव अधिकारों के हनन के रूप में हुई है। संवैधानिक बहसों में जिन अधिकारों को लेकर चर्चा हुई है उनमें समानता, सम्मान, गोपनियता तथा भेदभाव व स्वतंत्रता शामिल है। 

तृतीय पंथी जन से संबंधित यौनिकताऔर जेंडर आधारित पहचान को देखा, साथ ही उनके इतिहास में अस्तित्व एवं स्थिति पर भी नज़र डालने का प्रयास किया है। समाज कार्य के विकास क्षेत्र के रूप में तृतीय पंथी जन को देखा गया उनके आर्थिक एवं व्यवसायिक स्थिति के बारे में संक्षेप में विचार किया है।

वर्तमान में वैश्विक स्तर पर एवं भारत में एलजी बी.टी. के अधिकारों से संबंधित कार्यरत गैरसरकारी संगठनों की विस्तृत रूप में चर्चा की है। आगे वह भी देखा है कि भारत में तृतीय पंथी जन के अधिकारों से संबंधित मुद्दे ने एक नए आंदोलन का रूप धारण किया है। साथ ही न्यायालयों संवैधानिक बहसों में जिन अधिकारों को लेकर चर्चा हुई है उनमें समानता, सम्मान, गोपनियता तथा भेदभाव व स्वतन्त्रता से संबंधित घटना क्रम को जाना है।