वी. पी. मंडल आयोग - VP Mandal Commission
वी. पी. मंडल आयोग - VP Mandal Commission
जनता पार्टी ने 1977 के चुनाव घोषणा पत्र में यह वादा किया था कि वह जातिगत गैर-बराबरी को यथाशीघ्र समाप्त कर देगी। इस पार्टी ने यह भी घोषणा कि थी कि वह पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण कोटे में वृद्धि करेगी। पिछड़ों के आंदोलन के फलस्वरूप 1977 में केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी। इन्हीं वादों के अंतर्गत पार्टी ने सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ी जाति की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए 1978 में मंडल आयोग का गठन अनुच्छेद 340 के अंतर्गत किया। इस आयोग को निम्नलिखित बाते तय करनी थी।
1) सामाजिक व शैक्षिक तौर पर पिछड़े वर्गों को परिभाषित करने के उद्देश्य से आधार सुनिश्चित करना।
2) इस प्रकार से चिन्हित सामाजिक व शैक्षिक पिछड़े वर्गों के उन्नयन के लिए संस्तुतियों प्रस्तुत करना।
3) नागरिकों के ऐसे पिछड़े वर्गों के लिए नौकरियों में आरक्षण के प्रावधान पर गौर करना, जिनका सावर्जनिक सेवाओं में प्रतिनिधित्व संतोषजनक नहीं है।
4) राष्ट्रपति को अपने द्वारा खोजों से अवगत कराना और अपनी नज़र उपयुक्त संस्तुतियों को में प्रस्तुत करना। इस आयोग को 31 दिसंबर 1980 तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा गया। कार्य की विशालता और अनुपयुक्त समय के कारण आयोग ने तेजी के साथ कम किया। आयोग ने सामाजिक शैक्षिक
पिछड़ेपन को समझने के लिए तीन आधार सामाजिक, शैक्षिक तथा आर्थिक के अंतर्गत 11 मानक
निर्धारित किए गए, जो निम्नलिखित हैं:
सामाजिक
1. जातियाँ वर्ग, जो दूसरों के द्वारा सामाजिक रूप से पिछड़े माने जाते हैं।
2. जातियाँ/ वर्ग, जो अपनी जीविका के लिए मुख्यतः शारीरिक श्रम पर ही आश्रित हैं।
3. जातियाँ वर्ग, जो राज्य के औसत से ग्रामीण क्षेत्र में 10 प्रतिशत पुरुष व 25 प्रतिशत महिलाएं 17 वर्ष से पूर्व विवाह कर लेते हो तथा इसी क्रम में नगरीय क्षेत्रों में 5 प्रतिशत पुरुष व 10 प्रतिशत महिलाएं विवाह करते हो। 4. जातियाँ वर्ग जहां राज्य के औसत से 25 प्रतिशत अधिक महिलाएं काम करती हैं।
शैक्षिक
1. जहां 5 से 15 वर्ष के बीच जातियाँ वर्ग के कभी स्कूल न जाने वाले बच्चों का प्रतिशत राज्य के औसत से 25 प्रतिशत से अधिक हो।
2. जातियाँ/ वर्ग, जहां 5-15 वर्ष के बीच स्कूल छोड़ देने वाले बच्चों का प्रतिशत राज्य के औसत से 25 प्रतिशत से अधिक हो। शांति
3. जातियाँ वर्ग, जहां मैट्रिक पास लोगों का प्रतिशत राज्य के औसत से 25 प्रतिशत से कम है। आर्थिक
1. जातियाँ/ वर्ग, जिसमें परिवार की कुल संपत्ति की कीमत राज्य के औसत से 25 प्रतिशत से कम है।
2. जातियाँ वर्ग, जिसमें कच्चे मकान में रहने वालों का प्रतिशत राज्य के औसत से 25 प्रतिशत से अधिक है।
3. जातियाँ वर्ग जिनके 50 प्रतिशत से अधिक घरों के लोगों को आधा से एक किलोमीटर दूर पानी लेने जाना पड़ता है।
4. जातियाँ/ वर्ग, जिसमें राज्य औसत से 25 प्रतिशत से अधिक लोगों ने उपभोगता ऋण ले रखा हो। ओबीसी जातियों को इन मानकों के आधार पर सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग में रखा गया है। इस प्रकार से आयोग ने 3,743 जातियों को चिन्हित किया है। अन्य पिछड़ी जातियों का औसत देश की पूरी जनसंख्या का 52 प्रतिशत से थोड़ा अधिक है। 1980 में आयोग ने एक रिपोर्ट पेश की और मौजूदा कोटे में बदलाव करते हुए 22% से 49.5% वृद्धि करने की सिफारिश की 13 अगस्त 1990 को एक मेमोरेंडम के माध्यम से भारत सरकार द्वारा मंडल कमीशन की सिफ़ारिश मानली गई हैं। मंडल कमीशन के विरोध में अनेक स्थान पर उम्र हिंसक प्रदर्शन हुए।
विभिन्न न्यायालयों में इनके खिलाफ़ याचिका दायर की गई। सुप्रीम कोर्ट ने अन्य पिछड़ी जातियों के संदर्भ में क्रीमीलेयर को छोड़कर अन्य के लिए मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों को मान लिया। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार सरकार ने पटना हाईकोर्ट के न्यायाधीश जे. एन. प्रसाद की अध्यक्षता में गठित विशेषज्ञ समिति को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ों का निर्धारण करने का कार्य दिया। भारत सरकार ने 1993 में इस समिति का रिपोर्ट स्वीकार करते हुए लोक सेवाओं और पदों प 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था इस वर्ग के लिए स्वीकार कर ली। 1993 में ही भर्तियों में यही आरक्षण व्यवस्था लागू की गई।
1998 में केंद्र सरकार ने विभिन्न सामाजिक समुदायों की आर्थिक और शैक्षिक स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए पहली बार राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण किया। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण का आंकड़ा 32% है। जनगणना के आंकड़ों के साथ समझौतावादी पक्षपातपूर्ण राजनीति के कारण अन्य पिछड़े वर्ग की सटीक संख्या को लेकर भारत में काफ़ी बहस चलती रहती है। आमतौर पर इसे आकार में बड़े होने का अनुमान लगाया गया है, लेकिन यह या तो मंडल आयोग द्वारा या राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण द्वारा दिए गए आंकड़े से कम है। मंडल आयोग ने आंकड़े में जोड़-तोड़ करने की आलोचना की है। राष्ट्रीय सर्वेक्षण ने संकेत दिया कि बहुत सारे क्षेत्रों में ओबीसी (OBC) की स्थिति की तुलना अगड़ी जाति से की जा सकती है।
2005 में निजी शैक्षिक संस्थानों में पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लिए आरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए 93वां सांविधानिक संशोधन लाया गया। इसने अगस्त 2005 में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को प्रभावी रूप से उलट दिया। 2006 में सर्वोच्च न्यायालय के सांविधानिक पीठ में एम. नागराज और अन्य बनाम यूनियन बैंक और अन्य के मामले में सांविधानिक वैधता की धारा 16 (4) (ए). 16(4) (बी) और धारा 335 के प्रावधान को सही ठहराया गया। 2006 से केंद्रीय सरकार के शैक्षिक संस्थानों में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण शुरूहुआ। कुल आरक्षण 49.5% तक चला गया। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 10 अप्रैल 2008 को सरकारी धन से पोषित संस्थानों में 27% ओबीसी (OBC) कोटा शुरू करने के लिए सरकारी कदम को सही ठहराया। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से अपनी पूर्व स्थिति को दोहराते हुए कहा कि "क्रीमीलेयर" को आरक्षण नीति के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए। क्रीमीलेयर को पहचानने के लिए विभिन्न मानदंडों की सिफारिश की गई जो इस प्रकार हैं:
साल में 250,000 रुपये से ऊपर की आय वाले परिवार को क्रीमीलेयर परत में शामिल किया जाना चाहिए और उसे आरक्षण कोटे से बाहर रखा जाए। इसके अलावा, डॉक्टर, इंजीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट अभिनेता सलाहकारों, मीडिया पेशेवरों, लेखकों, नौकरशाहों, कर्नल और समकक्ष रैंक या उससे ऊंचे पदों पर आसीन रक्षा विभाग के अधिकारियों, उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों, सभी केंद्र और राज्य सरकारों के ए और बी वर्ग के अधिकारियों के बच्चों को भी इससे बाहर रखा जाए। अदालत ने सांसदों और विधायकों के बच्चों को भी कोटे से बाहर रखने का अनुरोध किया है।
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