अन्ना आंदोलन - Anna Movement

अन्ना आंदोलन - Anna Movement

जन लोकपाल विधेयक की निर्मिति हेतु यह आंदोलन अपने अखिल भारतीय स्वरूप में 5 अप्रैल 2011 को अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों द्वारा अंतर-मंतर पर अनशन के साथ शुरू हुआ इसे जन लोकपाल विधेयक आदोलन और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है। यह भारत का राष्ट्रव्यापी जन-आंदोलन है, जिसके द्वारा देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर कानून बनाने की अपील की गई। इस आंदोलन में अन्ना के सहयोगियों में अरविंद केजरीवाल, भारत की पहली महिला प्रशासनिक अधिकारी किरण बेदी, प्रसिद्ध लोकधर्मी वकील प्रशांत भूषण, पतंजलि योगपीठ के संस्थापक और योग गुरु बाबा रामदेव प्रमुख थे। 


अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार अंदोलन देश में भ्रष्टाचार पर बात करने वाला पहला अंदोलन नहीं है इसके पहले जय प्रकाश नारायण के अंदोलन में भी भ्रष्टाचार के मसले पर व्यापक तौर पर विमर्श छेड़ा जा चुका था, परंतु फिर भी वह अंदोलन देश में हुए अन्य अंदोलनों में अलग है।जय प्रकाश नारायण ने भी अपने अंदोलन में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बात की परंतु इनका अंदोलन मूलतः 'मुसहरीअंदोलन' था और इनके अदोलन में भ्रष्टाचार का मुद्दा आंशिक रूप में था। परंतु अन्ना के अदोलन में भ्रष्टाचार के मुद्दे को उस स्वरूप में पेश किया गया, जिस रूप में भ्रष्टाचार पर अभी तक किसी भी अंदोलन में बात नहीं की गई।एक लोकतांतिक राज्य के रूप में भ्रष्टाचार को भारत की शासकीय संस्थाओं और शासक वर्ग को सीधे तौर पर एक दुसरे से अंतर्संबंधित करके देखा गया। भ्रष्टाचार का इतने बृहत पैमाने पर प्रसिद्ध होना इसलिए संभव हो सका क्योंकि सूचना के अधिकार का प्रयोगऔर मीडिया द्वारा इस संदर्भ में सकारात्मक भूमिका का निर्वहन किया गया सामाजिक खर्च और बाजनाओं में घोटालों के उजागर होने के पीछे मनीष सीसोदिया और अरविंद केजरीवाल की संस्था परिवर्तन के कार्य है जिसने इन घोटालों का पर्दाफाश करने में योगदान दिया।


संचार साधनों के विकास होने के कारण यह अनशन आसानी से पूरे भारत में फैल गया और धीरे-धीरे एक बड़ा जनसमूह इसके समर्थन में सड़कों पर उतर गया। इन्होंने भारत सरकार से के मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल विधेयक बनाने की अपील की और अपनी अपील के अनुसार सरकार को लोकपाल का एक मसौदा भी दिया था। परंतु मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेसी सरकार ने इसके प्रति उदासीन रवैया अपना और इसकी उपेक्षा की। इसके फलस्वरूप हुये अनशन के प्रति भी तत्कालीन सरकार का स्वैया उदासीन ही रहा। हालांकि इस अंशना के आंदोलन के रूप में पर्णित होने पर सरकार ने शीघ्र ही एक समिति को निर्मित किया और 16 अगस्त तक लोक विधेयक को पास कराने की बात को संसद में स्वीकारोक्ति भी दें दी गई। अगस्त से आरंभ हुये मानसून सत्र में एक विधेयक को पारित किया गया परंतु वह अपेक्षाकृत कमजोर था और लोकपाल के विपरीत था। अन्ना हजारे ने इसके विरोध में पुनः अनशन पर बैठने की बात की और जब वे अनशन के लिए तैयार होकर जा रहे थे की तभी दिल्ली पलिश ने अन्ना हजारे को गिरफ्ता कर लिया। साथ ही साथ उनके कई सहयोगियों को भी गिरफ्तार कर लिया गया। सरकार की इस प्रवृत्ति से उद्वेलित जनता ने प्रदर्श करने आरंभ कर दिये। अन्ना द्वारा मजिस्ट्रेट की बात न मानने पर उन्हें तिहाड़ जेल में सात दिनों के लिए भेज दिया गया।

इस बात ने पूरे देश में आक्रोश पैदा कर दिया और फलतः अगले 12 दिनों तक देश में व्यापक स्तर पर धरना प्रदर्शन और अनशन हुये। इन बातों से सरकार ने सशर्त अन्ना को रिहा करने का आदेश दिया परंतु अन्ना ने उनकी शती का मानने से साफ तौर पर मना कर दिया। इसके फलस्वरूप अन्ना ने जेल में ही अनशन जारी रखा और जेल के सामने हजारों लोग उनके समर्थन में डेरा डाले रहे। इसके बाद अन्ना को 15 दिनों के लिए रामलीला मैदान में अनशन हेतु अनुमति मिला। अन्ना ने रामलीला मैदान में अनशन के दसवें दिन अपने अनशन को समाप्त करने के लिए सार्वजनिक रूप से तीन शर्तों को प्रस्तुत ये तीन शते थ


● सभी सरकारी कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाया जाय।


• सभी सरकारी कार्यालयों में एक नागरिक चार्टर लगाया जाय।


● सभी राज्यों में लोकायुक्त हो।


अंततः संसद द्वारा इन तीनों शर्तों पर सहमती का प्रस्ताव पास करने के बाद 28 अगस्त को अन्ना ने अपना अनशन स्थगित करने की घोषणा की।