अप्पिको आंदोलन - Appiko Movement

अप्पिको आंदोलन - Appiko Movement

चिपको आंदोलन के पश्चात कर्नाटक के उत्तर-पश्चिमी घाट की निवासियों द्वारा किया गया अप्पिको चलेवरी आंदोलन सन् 1983 में किया गया। अपिको कन्नड भाषा का शब्द है जिसका कन्नड में अर्थ चिपको होता है। इस क्षेत्र के प्रकृतिक बनों को ठेकेदार द्वारा काट दिया गया था जिसके परिणामस्वरूप मृदा अपरदन हुआ और जलस्रोत सूखने लगे। सिरसों ग्राम के निवासियों को आजीविका हेतु झाड़ियाँ, सूखे टहनियों को कड़ा करने व चारा, शहद आदि बनोत्पादों को प्राप्त करने के प्रभागत अधिकारों से वंचित कर दिया गया। कुछ समय के पश्चात ग्रामीणों ने पाया कि उनके गावों के चरो ओर से जंगल धीरे-धीरे गायब होता जा रहा है।

इसका परिणाम सितंबर 19983 में आंदोलन के रूप में निकाला और चिपको आंदोलन की ही भांति महिलाएं पेड़ों से लिपट गर्दा स्थानीय लोगों ने ठेकेदारों से पेड़ काटने और वृक्षों को गिराने पर प्रतिबंध की मांग की। उन्होंने अपनी आवाज बुलंद कर कहा कि हम व्यापारिक प्रायोजनों के लिए पेड़ों को बिल्कुल भी नहीं कटने देंगे और पेड़ों पर चिपक कर दृढ़ता से बोले कि यदि पेड़ काटने हैं तो उसके लिए पहले हमारे ऊपर कुल्हाड़ी चलाओ। वे वृक्षों के लिए अपने जीवन को भी कुर्बान करने को तैयार हो गये।


जंगल में लगातार 38 दिनों तक चले विरोध अदोलन ने सरकार की पेड़ों की कटाई पर प्रतिबंध लगाने का आदेश देने के लिए मजबूर किया। यह आंदोलन इतना लोकप्रिय हो गया कि पेड़ काटने आये मजदूर भी पेड़ों की कटाई छोड़कर चले गये। अप्पिको आंदोलन दक्षिणी भारत में पर्यावरण जागृति का पर्याय बना। इसने इस बात पर प्रकाश डाला कि किस प्रकार वन विभाग की नीतियों से वृक्षों के बजरीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है जो जनसाधारण को रोजमर्रा में उपयोग होने वाले कई आवश्यक संसाधनों से वंचित कर रहा है। इसने इस प्रक्रिया में सलग्न ठेकेदारों, वन विभाग के कर्मचारियों तथा राजनीतिज्ञों की साँठगाँठ का भी पर्दाफाश किया। वह आंदोलन अपने तीन उद्देश्यों की पूर्ति में सफल रहा


जंगल में विद्यमान वृक्षयोन की रक्षा करना।


न भूमि में पुनः वृक्षारोपण करने में।


वन सम्पदा का प्रयोग प्रकृतिक संसाधनों का ध्यान रखते हुये करना।


अपिको आंदोलन ने पश्चिमी घाट के सभी गांवों में व्यापारिक हितों से उनकी आजीविका के साधन, जंगल।



तथा पर्यावरण को होने वाले खतरे और उससे उत्पन्न चुनौतियों के प्रति सचेत किया। अप्फिको ने शांतिपूर्ण तरीके से गाधौवादी मार्ग पर चलते हुए एक ऐसे पोषणकारी समाज के लिए लोगों का मार्ग प्रशस्त किया जिसमें न कोई मनुष्य का और न ही प्रकृति का शोषण कर सके।