चिल्का बचाओ आंदोलन - Chilka bachao movement

चिल्का बचाओ आंदोलन - Chilka bachao movement

उड़ीसा में स्थित एशिया की सबसे बड़ी खारे पानी की झील का गौरव चिल्का को प्राप्त है जिसकी लम्बाई 72 कि.मी. व चौड़ाई 25 कि.मी. और क्षेत्रफल लगभग 1000 वर्ग कि.मी. है। इस झील पर 192 गांवों की आजीविका निर्भर करती है जो मत्स्य पालन खासकर झींगा मछली से जीवन निर्वाह करते हैं। दो लाख से अधिक जनसंख्या और 50,000 से अधिक मछुआरे अपनी आजीविका के लिए चिल्का पर आश्रित है। 1986 में तत्कालीन पटनायक सरकार ने चिल्का में 1400 हेक्टेयर झींगा प्रधान क्षेत्र को टाटा तथा उड़ीसा सरकार की संयुक्त कम्पनी को पट्टे पर देने निर्णय लिया। इसका विरोध मछुवारों के साथ-साथ विपक्षी राजनीतिक पार्टी जनता दल ने भी किया, जिसके कारण जनता दल को विधानसभा की सभी पांचों सीटें पर जीत मिली। 


लेकिन 1989 में जनता दल के सत्ता में आने पर परिस्थिति फिर परिवर्तित हो गई और परिणाम 1991 में जनता दल की सरकार द्वारा झांगा प्रधान क्षेत्र के विकास हेतु टाटा कंपनी को संयुक्त क्षेत्र कंपनी बनाने के लिए आमंत्रण के रूप में परिलक्षित हुआ। इस आमंत्रण ने एक संघर्ष की आधारशिला को निर्मित किया। चिल्का के 192 गांवों के मछुआरों ने मत्स्य महासंघ के अंतर्गत संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना आरंभ किया और उनके साथ इस संघर्ष में उड्डकल विश्वविद्यालय के छात्रों ने भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। 15 जनवरी, 1992 में गोपीनाथपुर गांव में यह संघर्ष जन आंदोलन के रूप में पर्णित हो गया। परंतु इस पर जब सरकार की ओर से कोई में सकारात्मक रवैया नहीं अपनाया गया तब चिल्का क्षेत्र के स्थानीय लोगों ने उङ्गकल विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा गठित संगठन 'क्रांतिदशी युवा संगम के सहयोग से बिल्का के अंदर बनाए गए बांध को तोडता आरंभ किया। अंतत: दिसम्बर 1992 में उड़ींचा सरकार को टाटा को दिये गये पढ़ के अधिकार को खारिज करना।