साम्प्रदायिक एकता एवं महात्मा गांधी की प्रासंगिकता - Communal Unity and Relevance of Mahatma Gandhi

साम्प्रदायिक एकता एवं महात्मा गांधी की प्रासंगिकता - Communal Unity and Relevance of Mahatma Gandhi

महात्मा गाँधी जी अपने रचनात्मक कार्यक्रम में कौमी एकता को भी बहुत महत्व देते हैं और कहते हैं कि धार्मिक सहिष्णुता की भावना ही मनुष्य को मनुष् है। एक सच्चा धार्मिक व्यक्ति अपने धर्म को महत्व देता है उतना ही दसरेके धर्म को भी महत्व प्रदान करता है। अपनी माँ को प्रेम करना और सम्मान देना तथा दूसरे की माँ को भी वैसा प्रेम एवं सम्मान की भावना रखना ही सच्ची धार्मिक भावना है। इस प्रकार आज धर्म के नाम पर आतंकवाद, अलगाव को खत्म करने में गांधी का साम्प्रदायिक विचार प्रमुख है।


शिक्षा और गांधी की प्रासांगिकता महात्मा गांधी व्यावहारिक जीवन को महत्व प्रदान करने वाले व्यक्ति थे वे जो कहते थे वहाँ करते भी थे। अधात गांधी जी के कथनी में करनामें अंतर नहीं था। उसी प्रकार वे शिक्षा के बात करते थे। उनके शिक्षा संबंधी विचार बुनियादी शिक्षा के नाम से जाना जाता है। वे शिक्षा का अर्थ व्यक्ति के शारीरिक मानसिक एवं आत्मिक को मानते थे। इसके इस विचार को 341 (Head Hand and Heart) कहा जाता था। गांधीजी का कहना था कि शिक्षा ऐसा हो कि जो जीवन के व्यावहारिक समस्याओं को दूर कर सके। इसी लिए वे प्रारंभिक शिक्षा को कटाई बनाई सिलाई श्रम से जोड़ कर देखते थे। उनका कहना था कि जितना ज्ञान अथवा सिद्धांत का व्यवहार का रूप दिया जा सके उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है। औस उच्च शिक्षा के बावजूद भी रोजगार प्राप्त करना संभव नहीं है ऐसे में गांधी जी के शिक्षा संबंधी विचार अधिक प्रासंगिक है।


आधुनिक जीवन पद्धति एवं गाधीकी प्रासांगिकता:- आज की मानव जीवन की पद्धति पूरी तरह अवैज्ञानिक प्रवृत्तिसे दूर उपभोक्तावादी बन गई है। जीवन के हर क्षेत्रमें संयम हीनता, भागमभाग एवं विघटन बढ़ती जा रही है जिसके कारण तनाव, अवशाद, रक्तचाप एवं माटापा जैसे बीमारियाँ बढ़ती जा रही है। गांधी जी सयम, त्याग एवं प्रकृति के साथ सामजस्य बैठाकर जीवन जीने की बरत करते थे। वे कहते थे कि किसी एक ही व्यक्ति के लोभ को पूरा करने में दुनिया की चीज कम है पर संपूर्ण मानवता के आवश्यकता को पूर्ण करने हेतु पर्याप्त चीजे पृथ्वी के पास है। इस तरह संयम एवं त्याग संबंधित विचार आज गांधी के प्रासागिक है।


महात्मा गांधी एक ऐसे व्यक्ति थे जिनकी जीवन पद्धति कर्य एवं सिद्धांत की एकरूपता का दर्शन प्रदान करती थी। वे भारत ही नहीं अपितु विश्व के कल्याण के लिए सत्य एवं अहिंसा का सिद्धांत जो दिया आज भी प्रासांगिक है और आनेवाले कल में भी प्रासांगिक रहेगा। आज दुनिया निरंतर यात्रिक होती जा रही है। व्यक्तिवादी सोच चढ़ रही है तथा समूह बादी सोच कमजोर होती जा रही है। मनुष्य में संयम एवं धैर्य कमजोर बढ़ता जा रहा है। राष्ट्रवाद के नाम पर देशों की सरकारों में टकराहट बढ़ रही है जो कभी भी युद्ध का रूक ले सकती है। ऐसे में गांधी जी के एकादश व्रत, सात पातक, रचनात्मक कार्यक्रम एवं प्राकृतिक चिकित्स के सिद्धांत ही इस दुनिया को आधुनिकता के पागलपन से बचा सकते है। और आवश्यकता है कि विश्व समाज गांधी जी के विचारों की आदर्श मात्र न मानकर इसकी व्यावहारिकता के महत्व को समझे एवं लोक जीवन का हिस्सा बनाये।