युवा विकास की अवधारणा - concept of youth development

युवा विकास की अवधारणा - concept of youth development

युवाओं केप्रति प्रत्येक समाज हर समय में चिंतित रहा है। समाज में आए बदलाओं के अनुसार युवाओं को देखने का नजरिया भी बादल गया है। कुछ साल पहले तक हम युवा कल्याण की बात किया करते थे, लेकिन आज हम युवा विकास जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं। इसकी जड़ों को हम समाज कार्य के • इतिहास में खोजते है तब पता चलता है कि समाज कार्य में जिस तरह से समाज को देखने का नज़रिया बदला है। उसी तरह अवधारणाओं में परिवर्तन दिखाई देता है। रोमानिशीन Romanyshyn) के अनुसार आज जिस जगह हम खड़े हैं, उसके लिए हम निम्न चरणों से गुजरकर जाना पड़ा है.


● अवशेषों से संस्थागत अवधारणा 


● परोपकार से नागरी अधिकार


विशिष्ट से वैश्विक


लघुत्तम से पर्याप्त


• वैयक्तिक से सामाजिक सुधार


स्वयंसेवी से सार्वजनिक


गरीबों के कल्याण से एक कल्याणकारी समाज


1944 में प्रकाशित बेबरीज़ रिपोर्ट में हमें कल्याणकारी राज्य द्वारा किए जाने वाले कार्यों की सूची मिलती है। गरीबों के कल्याण से लेकर एक कल्याणकारी समाज बनाने तक की भूमिका समाज कार्य ने अदा की है। किंतु उसके बाद वैश्विक स्तर पर आए बदलाओ ने सभी को प्रभावित किया और धीरधीर राज्य अपने कल्याणकारीता की भूमिका का विकेन्द्रीकरण करता दिखता है। ऐसे में विकास के विभिन्न मॉडल हमारे सामने आते हैं, जिसमें आर्थिक विकास हेतु संसाधनों का अधिकतम उपयोग आवश्यक बन जाता है। नई अवधारणा में मनुष्य को एक संसाधन के रूप में देखा जाने लगा उसकी प्रस्थिति को व्यक्तिगत आय के रूप में नापा जाने लगा। ऐसे में विकास जैसा शब्द कल्याण का विकल्प बनकर उभरता है। कल्याण जैसा शब्द पुनर्वास प्रक्रिया पर ज्यादा जोर देता है, किंतु विकास समग्रता का द्योतक है जिसमें व्यक्ति के सभी आयामों को शामिल किया जाने लगा है। भारतीय परिदृश्य में हम देखते हैं कि भारत में युवा कल्याण के नाम पर सरकारी और गैरसरकारी दोनों ही माध्यमों से कार्य किया जाता है। युवा कल्याण के अनेक कार्यक्रमों को चलाने वाले स्वैच्छिक संस्थाओं में युवक महिला ईसाई सभा भारत स्काउट्स एंड गाइड्स नवयुवक ईसाई सभा भारत सेवक समाज आदि का कार्य उल्लेखनीय हैं। 


बावजूद इसके युवाओं के लिए शिक्षा स्वास्थ्य, खेल, कौशल विकास के लिए सरकारी तौर पर मंत्रालय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग आय. सी. एस. एस. आर. एवं सी. एस. आय. आर. जैसे संगठन लगातार कार्यरत हैं। 1950 के दशक में कार्य शिविर आंदोलनों ने राष्ट्र निर्माण के कार्य में युवा शक्तियों को लाने एवं उनमें सहभागिता का बोध कराने का प्रयास किया। डॉ. सी. डी. देशमुख ने अनिवार्य राष्ट्रीय सेवा का प्रारंभ करने का सुझाव दिया था। इस सुझाव में निहित अनुशंसा में से एक यह भी था कि कक्षा में शिक्षा को शारीरिक क्रम के साथ समाकलित करने से छात्र श्रम के महत्व को भली प्रकार से समझ सकेंगे। यह भी आशा की गई थी कि यह विद्यार्थियों को आंदोलनात्मक गतिविधियों से अलग कर सकता है। 1952 में प्रारंभ किए गए सामुदायिक कार्यक्रम में ग्राम परिवर्तन अभिकर्ता के रूप में युवकों के जुटाव पर अधिक बल दिया गया था।


हरीशंकर श्रीवास्तव अपने आलेख युवा कल्याण में लिखते हैं कि यह वह काल था जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय समूहों द्वारा संबंधों पर आधारित युवा और विद्यार्थियों के अंतरराष्ट्री संगठनों को स्थापित किया जा रहा था। इसके लिए राजनैतिक, सामुदायिक समूहों और अन्य द्वारा प्रयत्न किए जा रहे थे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्रुवीकरण भारत में भी परिवर्तित हुआ फिर भी यह अधिक काल तक अपने अस्तित्व की रक्षा नहीं कर सका और न ही इसमें पर्याप्त शक्ति थी जिस पर भरोसा किया जा सके। प्रारंभिक गति पाने के बावजूद भी युवा आदोलनों के क्रियाकलापों हेतु युवकों को जुटाने में अधिक गतिशीलता नहीं प्राप्त हो सकी।


1960 के दशक के अंत में एक बार पुन युवकों के महत्व के प्रति जागृति प्रदर्शित हुई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युवा विद्रोह और असंतोष का असर भारत पर भी दिख रहा था जिसके कारण भारत के नगरीय युवक-युवतियों में अशांति का वातावरण बन गया। इसी के कारण समाज के सभी वर्गों में चिंता शुरू हुई थी। 1969 में युवाओं के लिए एक राष्ट्रीय सलाहाकार बोर्ड की स्थापना की गई। इसी समय देशमुख समिति के प्रतिवेदन को कार्यान्वित किया गया, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में राष्ट्रीय सेवा योजना का संगठन किया गया। प्रतिवेदन में एक वर्ष की अनिवार्य सेवा प्रस्तावित थी। इसका मूल उद्देश्य यह था कि शैक्षिक संस्थाओं में शिक्षा ग्रहण करते हुए समाज की सेवा करना।


1972 में नेहरू युवा केंद्र युवा कल्याण के लिए खोले जाने लगे। 1981-82 तक 255 केंद्र स्वीकृत किए गए तथा इनमें से 192 केंद्रों ने कार्य करना शुरू किया था। इसका मुख्य उद्देश्य विशेषत ग्रामीण क्षेत्रों में गैर विद्यार्थी युवकों हेतु क्रियाकलापों का विकास करने के लिए जिले में केंद्र बिंदु के रूप में कार्य करना था। इसके क्रिया-कलापों में, युवा नेतृत्व प्रशिक्षण शिविर, सामुदायिक सेवा हेतु शिविर सांस्कृतिक एवं मनोरंजनात्मक सेवाएँ तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण आदि शामिल थे। इसके बावजूद देखते हैं कि संपूर्ण भारत में अनेक सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं द्वारा युवा कार्यक्रमों को चलाया गया था। व संसाधन विकास कृषि श्रम एवं रोजगार स्वास्थ्य एवं प्रतिरक्षण मंत्रालय जैसे कुछ मंत्रालयों को हम देखते हैं कि इनके द्वारा युवाओं के कल्याण को लेकर कार्यक्रमों का आयोजन किया गया जिसका नियोजन एवं क्रियान्वयन केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा किया गया जाने ला था। इस समय के प्रमुख कार्यक्रमों में से एक ग्रामीण युवा रोजगार कार्यक्रम निमन्वत है।