लोकतंत्र एवं महात्मा गांधी की प्रासंगिकता - Democracy and the relevance of Mahatma Gandhi

लोकतंत्र एवं महात्मा गांधी की प्रासंगिकता - Democracy and the relevance of Mahatma Gandhi

आज कुछ विवादों को छोड़ते हुए देखा जाये तो आधुनिक दुनिया के लिए लोकतांत्रिक सीमिक शासन पद्धति बन चुका है। लोकतांत्रिक शासन पद्धति में देश की जनता अल-अलग क्षेत्रों में अपना अपना प्रतिनिधि चुनकर भेजती है। ये प्रतिनिधि अपना मुखिया चुनते है। इस प्रकार देखा जाये तो लोकतंत्र प्रक्रिया जनता को शासन करने का अधिकार देती है। जनता खुद की खुद पर शासन करते के लिए खुद की सरकार बनाती है। पर सच्चे अर्थ में होता यह है कि जनता द्वारा बनायी गई सरकार जनता के लिए काम न करके अपने लिए कार्य करने लगती है।

महात्मा गांधी कहते हैं कि लोकतंत्र में निर्वाचित प्रतिनिधियों को सत्ता के लिए शासन न करके जनता के सेवा हेतु राजनीति करनी चाहिए। जनता अपने प्रतिनिधियों पर विश्वास करके उनको शासन में पहुँचाती है इसिलए इन प्रतिनिधियों का नैतिक कर्तव्य बनता है कि समाज के कल्याण के लिए कार्य को महिलाओं को भी राजनीति में सम्मिलित होने की बात महात्मा गांधी जी करते हैं। वे कहते है कि लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में पुरुषों के समान जब महिलाएँ भी भागीदारी प्राप्त करेंगी तभी जाकर शासन व्यवस्था मजबूत होगी तथा सक्षम राष्ट्र का निर्माण हो सकेगा। भारत के संदर्भ में गांधी के विचार थे कि भारतीय लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब भारतीय समाज में गरीबी, अस्पृश्यता लिंगभेद एवं धर्मांधता जैसी बीमारी नहीं होगी।


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा गांधीकी प्रासंगिकता:- महात्मा गांधी सिद्धांत एवं व्यवहार में समरसता बरतते थे। उन्होंने जीवन को प्रवृत्तिवादी तरीके से जीने की वकालत किया। गांधी जी विज्ञान एवं तकनीकी के प्रति पागलपन को मानवता के लिए विनाशकारी माना। वे कहते थे कि विज्ञान एवं तकनीकी के पीछे दुनिया अंधी बनकर दौड़ रही है। मनुष्य यांत्रिक मशीन बनता जा रहा है जो मानव समाज के हित में नहीं है। समाज के लोग जन विज्ञान एवं तकनीकी पर बहुत जोर दे देते है तो सामाजिक संरचना खत्म होने लगती है। सामाजिक मूल्य मान्यताओं पर समाज का ध्यान खत्म हो जाता है तथा तकनीकी पर ज्यादा केन्द्रित हो जाता है तब उस समाज एवं सभ्यताका पतन हो जाता है। इस प्रकार देखा जाये तो मेयो, मेसोपोटामिया एवं सिन्धु घाटी की सभ्यता का पतन इस लिए हुआ कि ये सभ्यताएँ जरूरत से ज्यादा तकनीकी एवं विज्ञान पर ध्यान केन्द्रित कर ली भी इसी लिए इनका पतन हुआ।


आज का पुरा विश्व अस्त-शस्त्र, परमाणु बम, हाइड्रोजन बम, जैविकसम, दानवाकार मशीनों का निर्माण कर रहा है। भौतिकवादी जीवन पद्धति में तकनीकी एवं विज्ञान को अतिरेक प्राथमिकता प्रदान की जा रही है जिसके कारण पूरी मानवता प्रकृति से दूर विनाश के पास खुद के खात्मे से अजान पड़ी है। इस प्रकार देखा जाये तो मानवता का बचाये रखना है और विकास को संतुलित रखना है तो आज गांधी जी के विचारों का अनुशीलता करना होगा तभी समाज बच पायेगा।