इतिहास के विकासात्मक मूल्य - Developmental Values of History
इतिहास के विकासात्मक मूल्य - Developmental Values of History
इतिहास लेखन के सन्दर्भ में दो धाराएँ थी। एक तथ्यवादी और दूसरी तथ्य पर आधारित इतिहास लेखन का विरोधी कहा गया कि केवल तथ्य ही सत्य नहीं। इस स्थिति में इतिहास पटनाओं का संग्रह मात्र बनकर रह जाएगा जहाँ प्रत्यक्षवादियों ने 'तथ्य सम्प्रदाय' का समर्थन किया वहीं इसके विरोधी पक्ष ने तथ्य को गुण नहीं माना एक्टन का विचार है इतिहास के तथ्य, समुद्र में तैरती मछली की भाँति है, न जाने कब कौन मछली हाथ लग जाए। यही नहीं, तब्यों की निर्जीविता पर भी ध्यान दिया गया और कहा जाने लगा कि ऐतिहासिक तथ्य स्वयं नहीं बोलते, बल्कि उन्हें बोलने के लिए विवश किया जाता है। (इतिहास क्या है पू. 12) हाउसमैन के कथन को उद्धृत करते हुए ई. एच. कार ने कहा जिसके आधार पर तथ्य को अनुभव का आँकड़ा समझा जा सकता है। "अनुभव के वे आँकड़े जो निष्कर्ष से भिन्न होते हैं।" (वही, पू. 5) वे मानते हैं कि "तथ्य बोरे की तरह होते हैं, जब तक उसमें कुछ भरा न जाए वे खड़े नहीं होते।" (वही, पृ. 7)
आधुनिक इतिहास विषयक विवेचन का जो मूल मुद्दा रहा है, वह था इतिहास को इतिहासकार की पूर्ति और विश्लेषण से जोड़ना।' वर्तमान को अतीत की आँखों से देखना ही इतिहास है। इतिहास को इतिहासकार के साथ जोड़कर वर्तमान से अतीत का सम्बन्ध एक बड़ी ही परिपूर्ण विचारधारा रही है। वर्तमान की आँखों से देखा गया इतिहास अपने गतिशील प्रवाह में उपयोगितावादी दृष्टि से बन्धता गया। नीत्शे को कहना पड़ा, "किसी मतव्य के गलत होने से हमें कोई शिकायत नहीं है प्रश्न यह है कि यह मन्तव्य जीवन को कितना आगे बढ़ाता है, कितनी उसकी रक्षा करता है और जीव-रक्षण तथा जीव निर्माण में कितना होता है ( 24 )
इतिहासकार इतिहास का उत्पाथ भी होते हैं। अतः अपनी या कि अपने युग के प्रयोजनार्थही इतिहास का प्रयोग करना चाहिए क्योंकि इतिहास का यह धर्म है कि वह अतीत की मद्धिम किरणों में अपने वर्तमान को उत्कर्ष एवं व्यवस्था देते हुए भविष्य में अग्रगामी कर सके। उसे यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वर्तमान किसी रूप अतीत का विकास है। इतिहासकार एक सीमा तक ही स्वतन्त्र होता है। इसके साथ ही इतिहास का प्रयोजन यह देखना है कि व्यापक प्रयोजन एवं अर्थवत्ता की दृष्टि से मनुष्य का इतिहास में क्या और कहाँ स्थान है ?
वस्तुतः इतिहास एक प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया सांस्कृतिक प्रक्रिया है। र सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक एवं आर्थिक मूल्यों के सन्दर्भ में देखा जा में अवस्था से ज्यादा मूल्य की तलाश ही इतिहास को सांस्कृतिक प्रक्रिया बनाता है।
यदि इतिहास की अजसता की ओर ध्यान दे तो ज्ञान होगा कि उसमें एक प्रकार की अविच्छिन्नता है, और सापेक्षिकता भी। इसलिए इतिहास पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से पर्यवेक्षण करने वाले को अपने अनुसार मूल्य की प्राप्ति होती ही है। चूंकि आज जो मूल्यों के प्रति अवधारणा है इतिहास की ही देन है, अतः आज की मूल्यवादी विचारधारा से इतिहास को देखना अनुचित नहीं है इतिहास की दृष्टि विभिन्नता के सन्दर्भ में ई. एच. कार का विचार उल्लेखनीय है, समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री और इतिहासकार को मानव व्यवहार के उन स्वरूपों के भीतर प्रविष्ट होना पड़ता है, जिनमें मानव इच्छा शक्ति सक्रिय होती है, उन्हें उस क्रिया को करने की इच्छा क्यों हुई, जो उन्होंने की। (वहाँ, पृ. 73) वस्तुतः इतिहास में विभिन्न मूल्यों को प्राप्त करने की परम्परा रही है। मूल्य बदलते भी हैं और उनका आपसी संक्रमण भी होता रहता है, क्योंकि इतिहास में एक मूल्य दूसरे मूल्य को उत्पन्न करता है और उसके साथ-साथ उसकी अवस्थिति भी होती है। सभी मूल्य मानव जीवन के अपरिहार्य मूल्य हैं, जो मानव जीवन की ओर इतिहास को गतिशील प्रवाह देने में समर्थ होते हैं। इनसे और इन्हीं मूल्यों में पर्यवसित होकर, मानव की वैयक्तिक रचनात्मकता इतिहास को व्यवस्थित और परिष्कृत भी करती रही है। इसी के साथ, मानव जीवन और अनुभूति का गुणात्मक विकास परिलक्षित होता है। सांस्कृतिक उपलब्धि के रूप में ही संस्कृति (मूल्य विश्व) वर्धमान और ऐतिहासिक होते हैं, जिनका प्रयोजनसम्मत निदर्शन ही इतिहास की अर्थवत्ता है।
सामाजिक मूल्य
इतिहास की गति में समाज के मूल्य को स्वीकार किए बिना इतिहास का वास्तविक निरूपण नहीं हो सकता व्यक्ति जो कुछ करता है या उसकी पूरी सर्जनात्मकता समाज में ही परिणमित होकर मानवता के अतीत के अपरिमित विस्तार में मानव के कार्य-कलाप को सज्जित करती है। वस्तुतः व्यक्ति और समष्टि के बीच सामंजस्य की अन्तर्धारा ही सामाजिकता है, जो इतिहास पुरुष की विशिष्टता कही जा सकती है। मनुष्य रचनात्मक है, इसलिए वह सामाजिक भी है, क्योंकि वह अपनी बुद्धि का प्रयोग समाज में उतर कर ही करता है। समाज में ही
संस्कृतियों का विकास होता है। डान का मत है कि "कोई व्यक्ति अपने आप में अलग-अलग द्वीप जैसा नहीं होता हर व्यक्ति महाद्वीप का एक अंश पूर्ण का एक अंग होता है।" (वही, पृ. 31) वस्तुतः व्यक्ति समाज के साथ साथ ही विकास करता है, जिसमें पूरा दायित्व व्यक्ति चेतना का ही होता है। अतः समाज और व्यक्ति अपनी ऐतिहासिक गति में अन्योन्याश्रित हैं। कारण कि व्यक्ति अपनी मर्जनात्मकता का समर्पण समाज के प्रति करता है तो समाज उसे ग्रहण कर परम्परा के लिए छोड़ देता है। ई.एच. कार के अनुसार "जो संघर्ष होते हैं वे व्यक्ति तथा समाज के बीच नहीं होते, बल्कि समाज के अन्तर्गत रहने वाले व्यक्तियों के समूहों के बीच होते हैं।" (वही, पृ. 34) इस प्रकार समाज का मूल्य इतिहास में अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता रहा है और उसी के भीतर सारे मानव जीवन की घटनाएँ, गतिशील रही हैं। वस्तुतः यह कहा जा सकता है कि सांस्कृतिक प्रगति के दौरान, एक और
अतीत का विकास है। इतिहासकार एक सीमा तक ही स्वतन्त्र होता है। इसके साथ ही इतिहास का प्रयोजन यह देखना है कि व्यापक प्रयोजन एवं अर्थवत्ता की दृष्टि से मनुष्य का इतिहास में क्या और कहाँ स्थान है ?
वस्तुतः इतिहास एक प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया सांस्कृतिक प्रक्रिया है। र सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक एवं आर्थिक मूल्यों के सन्दर्भ में देखा जा में अवस्था से ज्यादा मूल्य की तलाश ही इतिहास को सांस्कृतिक प्रक्रिया बनाता है।
यदि इतिहास की अजसता की ओर ध्यान दे तो ज्ञान होगा कि उसमें एक प्रकार की अविच्छिन्नता है, और सापेक्षिकता भी। इसलिए इतिहास पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से पर्यवेक्षण करने वाले को अपने अनुसार मूल्य की प्राप्ति होती ही है। चूंकि आज जो मूल्यों के प्रति अवधारणा है इतिहास की ही देन है, अतः आज की मूल्यवादी विचारधारा से इतिहास को देखना अनुचित नहीं है इतिहास की दृष्टि विभिन्नता के सन्दर्भ में ई. एच. कार का विचार उल्लेखनीय है, समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री और इतिहासकार को मानव व्यवहार के उन स्वरूपों के भीतर प्रविष्ट होना पड़ता है, जिनमें मानव इच्छा शक्ति सक्रिय होती है, उन्हें उस क्रिया को करने की इच्छा क्यों हुई, जो उन्होंने की। (वहाँ, पृ. 73) वस्तुतः इतिहास में विभिन्न मूल्यों को प्राप्त करने की परम्परा रही है। मूल्य बदलते भी हैं और उनका आपसी संक्रमण भी होता रहता है, क्योंकि इतिहास में एक मूल्य दूसरे मूल्य को उत्पन्न करता है और उसके साथ-साथ उसकी अवस्थिति भी होती है। सभी मूल्य मानव जीवन के अपरिहार्य मूल्य हैं, जो मानव जीवन की ओर इतिहास को गतिशील प्रवाह देने में समर्थ होते हैं। इनसे और इन्हीं मूल्यों में पर्यवसित होकर, मानव की वैयक्तिक रचनात्मकता इतिहास को व्यवस्थित और परिष्कृत भी करती रही है। इसी के साथ, मानव जीवन और अनुभूति का गुणात्मक विकास परिलक्षित होता है। सांस्कृतिक उपलब्धि के रूप में ही संस्कृति (मूल्य विश्व) वर्धमान और ऐतिहासिक होते हैं, जिनका प्रयोजनसम्मत निदर्शन ही इतिहास की अर्थवत्ता है।
सांस्कृतिक मूल्य
यदि इतिहास सांस्कृतिक उपलब्धि का विकास है या कि समस्त अनुशासनगत चेतना का बौद्धिक विकास है तो ये विभिन्न अनुशासनगत विचार कहीं हमारे बौद्धिक चिन्तन साध्य और साधन दोनों हैं। इन्हीं अनुशासनों की चेतना से मनुष्य अपने वैयक्तिक चिन्तन को निवैयक्तिक स्तर पर परम्परा से जोड़ देता है, क्योंकि इस बीच उसे सामान्यीकरण की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। फलतः मनुष्य अपने आत्मिक चिन्तन को 'सार्वभौमिकता' प्रदान करता है। साथ ही, उपने बौद्धिक चिन्तन में इस चेतन सार्वभौमिकता का एक नए सिरे से प्रयोग करता है एवं परम्परा में भी चेतना के स्तर पर बौद्धिक सर्जनात्मकता के बढ़ावा देता चलता है। यहाँ मानवीय ज्ञान के विकास की ऐतिहासिकता में परम्परा के निर्वहन का प्रतिफल है जो व्यक्ति की बौद्धिकता के सोच में निर्मित होता चलता है। मनोदशाओं को किसी भी मनुष्य की इच्छा, सम्बेदना एवं विचारों से जोड़ता गया और चेतना के स्तर पर मानवीय इतिहास का अंग बनता गया। अतः इन मूल्यों तथा व्यक्तिगत सर्जनात्मकता को छोड़कर मानव इतिहास विषयक विभावन की कल्पना नहीं की जा सकती। मनुष्य का अनुकरणशील होना एक गुण है और यह अनुकरण समाज के भीतर से संस्कृति का अनुकरण होता है। अनुकरणपरक शिक्षा के आधार पर ही परम्परा का निर्माण होता है।
इतिहास न केवल संस्कृति की उपलब्धि की ओर विकास है, बल्कि वह एक सांस्कृतिक प्रक्रिया है मानव की सृर्जनात्मकता एवं मानव चेतना के परिष्कार का विकास है इतिहास मनुष्य के आदिम स्वरूप का ही विकास है उद्भव नहीं विकास की निरन्तरता का अर्थ है उसकी क्रमबद्धता या कि मानव चेतना के विकास की क्रमबद्धता यदि जीवन-मूल्यों के प्रति भावात्मक दृष्टिकोण की प्रबल आवश्यकता की जा सकती है तो संस्कृति का आन्तरिक पक्ष उस भावात्मकता का परिणाम है। इसी भावात्मकता के कारण मनुष्य बाह्य परिवेश को अपनी आवश्यकता के अनुकूल ढालता रहता है और इतिहासकार उससे भी ज्यादा अनुकूलन की क्रिया का शिकार होता है।
कलात्मक मूल्य
कला में व्यक्ति की रुचि सापेक्ष से उसके सौन्दर्यबोध का समावेश होता है। किसी भी युग विशेष में रुचि विशेष की प्रधानता रहती है और इस युगीन रुचि का स्थापत्य कला, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीत कला एवं साहित्य कला पर प्रभाव अवश्य पड़ता है। सौन्दर्य चेतना एक मिश्र वृत्ति है। उसमें प्रीति या आनन्द और विस्मय के तत्त्वों का समावेश होता है। अतः प्रीति या आनन्द के साथ सम्बद्ध होने के कारण उसका या कि ललित कलाओं का मनुष्य के आत्म विस्तार पर अवश्य ही प्रभाव पड़ता है। सांस्कृतिक युगों का नाम कलात्मक प्रवृत्तियों पर निर्भर करने लगता है। नलिन बिलोचन शर्मा के अनुसार, 'युग-विशेष में रुचि विशेष का प्राधान्य रहता है। ललित कलाओं के विषय में यह अपेक्षा अधिक सत्य है (नलिन बिलोचन शर्मा, साहित्य का इतिहास दर्शन, पृ. 284) मनुष्य रवि-भेद का संवाहक है और युग सापेक्ष उसकी सौन्दर्य दृष्टि भी बदलती रहती है। उसका यह रुविभेद वस्तु विन्यास के अन्तर का कारण बनता है। कलात्मक अभिव्यक्ति में आया हुआ वस्तु-जगत् व्यक्ति के दृष्टिभेद के साथ अपनी सत्यता से ज्यादा वस्तु विन्यास में दिखाई देता है। अतः कला के सन्दर्भ में वस्तु और रूप का संघर्ष हमेशा चलता रहा है। यह संघर्ष कला के क्षेत्र में प्रवृत्तियों का संघर्ष होता है। परिणामतः अतीत तथा वर्तमान की कलात्मक रुचि में स्पष्ट भेद मिलते हैं। मनुष्य सांस्कृतिक प्राणी है अतः यह बौद्धिक जिज्ञासा तथा सौन्दर्य की भूख का शिकार होता रहता है। मनुष्य की कलात्मक उपलब्धि उसके सौन्दर्य की भूख का ही परिणाम है। वह इस सौन्दर्य-दृष्टि से इस हद तक प्रभावित होता है कि मनुष्य अपनी सारी रचनाओं में उपयोगिता का प्रयोग करता है तो साथ ही उसमें सौन्दर्य का भी समावेश करता है। मनुष्य विषय वस्तु को सौन्दर्यबोधीय दृष्टि के साथ अपने संकेश एवं अनुभूति के रूप में ही रूप देता है। इस रूप देने की प्रक्रिया में वस्तु अलग हो जाती है। और विषय वस्तु विन्यास ही कला के स्थायी तत्व के रूप में प्रस्तुत होता है। इसका कारण यह है कि विषय-वस्तु इतिहास के साथ बदलती रहती हैं, किन्तु इस बात को कभी भी स्वीकार नहीं किया जा सकता कि विषयवस्तु एक निष्क्रिय तत्व है और विषय-विन्यास कलाकार का भावन होने के कारण सक्रिय तत्व है। यह सत्य है किइतिहास के साथ बदलती रहती है, किन्तु इस बात को कभी भी स्वीकार नहीं किया जा सकता कि विषय वस्तु एक निष्क्रिय तत्त्व है और विषय-विन्यास कलाकार का भावन होने के कारण सक्रिय तत्व है। यह सत्य है कि विषय-विन्यास के प्रस्तुत होने के कारण युग-बोध और बदलती सौन्दर्य-दृष्टि की विषय-वस्तु में काफी परिवर्तन आ जाता है, किन्तु विषय वस्तु और विषय विन्यास की उभय आश्रितता को इनकार नहीं किया जा सकता।
मनुष्य की कलात्मक अभिव्यक्ति ऐतिहासिक विकास में सूक्ष्म होती जाती है। परिणामतः कला की
अभिव्यक्ति का माध्यम स्थूल होता जाता है। इस सूक्ष्मता में जीवन की जटिलता का हाथ होता है। वास्तुकला से मूर्तिकला और मूर्तिकला से चित्रकला तथा चित्रकला से संगीतकला का विकास मानव चेतना की जटिलता और माध्यम की सूक्ष्मता का ही प्रतिफल है। मनुष्यत अपनी सौन्दर्य सम्वेदना को अनेक रूपों में अभिव्यक्ति दे सकता है। देवराज का विचार है कि वे विषय वा वस्तु पक्ष जो हम में सौन्दर्य सम्वेदना जगाते हैं, अनेक प्रकार के हो सकते हैं, जैसे ध्वनियों के समूह संगति में, रेखाकृतियाँ तथा अन्य आकार सरल चित्रांकन में जटिल कर्मों, मनोभावों अथवा विचारों के संगठन आदि।" दिवराज, संस्कृति का दार्शनिक विवेचन, पृ. 17) निश्चय ही कला द्वारा हमारी जीवन सम्बेदनाओं को समृद्धि और प्रसार मिलता है। हम अपनी जीवन चेतना को उन कृतियों द्वारा निर्धारित जीवन की नई सम्भावनाओं में विस्तृत कर लेते हैं। अतः कत्ता मानव जीवन के इतिहास में या कि मानव की अनुभूति एवं कल्पना के गुणात्मक विकास में उपादान बनकर आती है, जिससे मनुष्य अपनी सांस्कृतिक उपलब्धि में अग्रसर्पण कर सकता है। मनुष्य की विभिन्न सांस्कृतिक क्रियाएँ एक दूसरे से एकदम विच्छिन्न नहीं मानी जा सकती। अतः उनकी उपलब्धि की अविच्छिन्नता को ध्यान में रखते हुए कला की परीक्षा मूल्यानुप्राणित होनी चाहिए।
साहित्यिक मूल्य
साहित्य मानव जीवन का अनुभव जगत् है। रचनाकार अपनी समग्र जीवनानुभूति को प्रत्यक्ष और अवधारणा के साथ अनुभव के स्तर पर जिसे ग्रहण करता है, उसी को अभिव्यक्त करता है और अभिव्यजित भी करता है। रचनाकार एक प्रतिभाशील व्यक्ति होने के बावजूद वह स्वयं इतिहास का उत्पाद्य भी होता है। अतः साहित्य में समसामयिक परिप्रेक्ष्य का प्रश्न भी जुड़ा होता है। इस प्रकार साहित्य में जीवन अपने अनुभव की समग्रता में परिलक्षित होता है। यही कारण है कि साहित्य एक संश्लिष्ट रचना है। संश्लिष्ट इसलिए कि साहित्य जीवन की समग्र अनुभूतियों की रचना है। रामस्वरूप चतुर्वेदी मानते हैं, "अनुभव के संलिष्ट रूप को प्रेषित करना रचना की कृतकृत्यता और इस संप्रेषण की प्रक्रिया को प्रशस्त और समृद्ध बनाना समीक्षा का कार्य है, जो निश्चय ही एक अर्थ में बहुत बड़ी चुनौती है। अतः साहित्य की संभ्रष्टता उसके समग्र अनुभव-जगत् का सं और इस प्रक्रिया में वह अभिव्यक्ति नहीं रचना है, क्योंकि साहित्य के द्वारा रचनाकार जीवन को रचता है।" (रामस्वरूप चतुर्वेदी, कामायनी का पुनर्मूल्या कन, पृ. 9-10) साहित्य में मानव जीवन के समसामयिक सन्दर्भों की आत उठाते हुए रघुवंश ने कहा है- "हर युग के साहित्य में सामयिक परिवेश अर्थात् युग का जीवन अपनी पद्धतियों, संस्कारों, संस्थाओं, मूल्यों, चरित्रों, आचरणों और परिस्थितियों में परिलक्षित होता है।" (रघुवंश, समसामयिकता और आधुनिक हिन्दी कविता प्र. सं. 1970, पृ. 1) साहित्य की जीवनाभिव्यक्ति शायत और सार्वभौम न होकर युगीन एवं परिवेशगत सरलता एवं जटिलता के अनुरूप सरल से जटिल होती चलती है। के साहित्य एक स्तर पर मानव जीवन की रचना है। अतः साहित्य अपने आप में मूल्य है, मूल्यों की उपलब्धि में एक उपादान मात्र नहीं। साहित्य साहित्यकार की वह संश्लिष्ट जीवन अनुभव की रचना है, जो अपने विविध भावों को अभिव्यिक्त करने के लिए शब्द एवं भाषा को रूप के स्तर पर ग्रहण करता है। मनुष्य के जीवन में शब्द एक प्रतीक मात्र ही नहीं है अपितु भाषा के रूप में शब्द जीवन चेतना के रूप बन जाते हैं, क्योंकि मनुष्य का विकास सच्चे अर्थों में भाषा का विकास है। मनुष्य भाषा के द्वारा विचार विनिमय ही नहीं करता अपितु वह भाषा में जीता है। चूँकि भाषा के साथ ही इतिहास गतिमान है, अतः साहित्य की अभिव्यक्ति क्षणिक प्रभाव के दोष से हमेशा बची रही है। भाषा के स्तर पर पहुंचकर साहित्य चेतना विकासात्मक एवं प्रवाहमान हो जाती है जिसमें परम्परा का संवहन भी होता है और नवीनता का समावेश भी।
रचना के स्तर पर रचनाकार के अनुभव के उत्तर जाने पर साहित्य तीन आयामों में नियन्त्रित हो जाता है। उसका पहला आयाम रचनाकार का युगीन जीवन होता है जो यथार्थ के रूप में स्वीकारा जा सकता है। दूसरा आयाम वह है, जब रचनाकार ने अपने भाव जगत् में समस्त अनुभव को रखा और यथार्थ में अनुभूति और प्रत्यय का प्रयोग करके अभिव्यंजित किया। पुनः साहित्य का तीसरा आयाम वह है जो पाठक के मानस पटल पर जीवन अनुभव हो सकता है। इन तीन आयामों पर आधारित होने के कारण ही आसमें परम्परा और सम्भवनाएँ बराबर बनी रहती हैं। इसीलिए साहित्य और मानव जीवन के इतिहास का सम्यक सम्बन्ध है। यही कारण है कि साहित्य का अनुभव साहित्यकार का ही अनुभव नही रह जाता अपितु वह सबका अनुभव हो जाता है। बुद्धि के द्वारा ही मनुष्य यथार्थ से जुड़ता है और उसकी माप बुद्धि द्वारा करता है। मनुष्य साहित्यकार के रूप में यथार्थ की जीवन घटनाओं से प्रभावित एवं प्रतिक्रियान्वित होकर चिन्तन करता है और उसका अनुभूति के द्वारा भावन करके मूल्यों के रूप में अभिव्यंजित करता है जिन मूल्यों का और सर्जन प्रक्रिया का मापक मनुष्य की बुद्धि ही होती है। मानव अपने सांस्कृतिक विकास क्रम में सृजनशील मानव का ही अनुकरण करता है या कि उसकी रचना का अनुकरण करता हुआ सांस्कृतिक मूल्यों की उपलब्धि की ओर गतिशील होता है। साहित्य का उद्देश्य मानव की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियों को संश्लेषित करना या उसको चरम मूल्यों की ओर ले जाने का प्रयास करना या जिन मूल्यों तक मानव पहुंच चुका है उससे आगे तक उसे ले जाना है।
संप्रेषण की प्रक्रिया में जिस भाषा का प्रयोग किया जाता है, वह निश्चय ही आद्यात सामाजिक वस्तु होती । भाषा ही एक ऐसा समर्थ माध्यम है जो अतीत को अपने में समेटे भी रहता है साथ ही वह वर्तमान को आगे बढ़ाता है तथा भविष्य की तमाम सम्भावनाओं को उद्घाटित करता है। मूल्यों एवं रचनात्मक विशिष्टता के रूप में साहित्य को व्यक्ति के समकक्ष सिद्ध करते हुए सुमन राजे ने कहा है रचनात्मक क्रियात्मक एवं अभिनयात्मक शक्तियों से सम्पन्न होने के कारण साहित्य को एक सामाजिक संस्था होने का गुण प्राप्त है। जिस प्रकार संस्थाओं की कुछ निर्धारित संरचना होती है उसके कुछ मूल्य और आदर्श होते हैं और उसके सदस्य उसी के अनुसार भूमिका अदा करते हैं, भूमिकाओं के प्रतिमानों के अनुसार व्यवहार करने का प्रयास करते हैं उसी प्रकार साहित्य संस्था की भी निर्धारित संरचना रहती है सीमाएँ होती है।" (सुमन राजे, साहित्येतिहास संरचना और स्वरूप, पू. 56-57) वस्तुतः साहित्य समस्त सांस्कृतिक मूल्यों की परिणति है तो समस्त सांस्कृतिक मूल्यों की परिणति मानव-जीवन की संश्लिष्टता में साहित्य में ही हो सकी है। साहित्य तक पहुँचकर समस्त सांस्कृतिक मूल्य अपनी अवयपरकता से मुक्त होकर एकनिष्ठ विकास के लिए स्वतन्त्र हो जाते हैं।
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