अहिंसा का स्वरूप - Form of Nonviolence (Ahimsa)

अहिंसा का स्वरूप - Form of Nonviolence (Ahimsa)

इस प्रकार यदि हम अहिंसा के स्वरूप को समझना चाहे तो उसे निम्न विदओं में समझा जा सकता है। 


1. अहिंसा मानव जाति का नियम है और यह पशुबल से कहीं अधिक महान तथा श्रेष्ठ है।


2. यह अंततः उनके लिए उपयोगी नहीं है जिन्हें प्रेम ईश्वर में जीती-जागती आस्था नहीं है।


3. अहिंसा मनुष्य के स्वाभिमान और आत्मसम्मान की पूरी तरह रक्षा करती है, लेकिन जमीन-जायदाद या चल संपत्ति के स्वामित्व को सदा संरक्षण प्रदान नहीं करती, हालांकि अहिंसा का आभ्यासिक पालन-संपत्ति की रक्षा के लिए सशस्त्र आदमी रखने की अपेक्षा ज्यादा कारगर सुरक्षा प्रदान करता है। अहिंसा की प्रकृति ही ऐसी है कि वह गलत तरीके से कमाए गए लाभों और अनैतिक कृत्यों की रक्षा करने में कोई मदद नहीं करती।


4. अहिंसा के मार्ग पर चलने वाले व्यक्तियों और राष्ट्रों को अपनी प्रितष्ठा के अलावा सब कुछ बलिदान करने (राष्ट्रों को अपने अंतिम नागरिक की बलि तक) के लिए तैयार रहना चाहिए। अतः अहिंसा का अन्य देशों पर अधिकार कर बैठने अर्थात साम्राज्यवाद जो स्पष्टतया अपनी रक्षा के प्रयोग पर आधारित होता है, के साथ कोई मेल नहीं है।


5. अहिंसा ऐसी शक्ति है जिसे सब साथ सकते हैं बच्चे, बुवा स्त्री-पुरुष या प्रौढ व्यक्ति शर्त यही है कि उन्हें प्रेम के ईश्वर में जीवित आस्था हो वे समस्त मानव जाति को एक समान प्रेम करते हो। अहिंसा को जीवन का नियम मान लेने पर यह केवल व्यक्ति के इक्का-दुक्का कृत्योंपर ही लागू न हो बल्कि उसके समूचे व्यक्तित्व को अनुप्रणित करने वाली होनी चाहिए।


6. यह मानना बहुत गलत है कि अहिंसा का नियम व्यक्तियों के लिए तो ठिक है पर मानवसमूहों के लिए कारगल नहीं है। गांधीजी अलिसा के इस स्वरूप के आधार पर ही एक ऐसी तकनीक का विकास करते हैं जो संघर्ष को निपटाने में सहायक होती है। गांधी इसे सत्याग्रह का नाम देते है। गांधी द्वारा प्रस्तुत सत्याग्रह ऐसा सिद्धांत है।


जो अहिंसा को आधार बनाकर समाज में कही भी उपस्थित समस्या को अहिंसक तरीके से समाप्त करने का प्रवास करता है।


गांधीजी ने अपने अहिंसा सिद्धांत को एक व्यावहारिक सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया। उनके पहले यह सिद्धांत धर्म संबंधी सिद्धांत ही माना जाता था और व्यक्तिगत जिंदगी में ही प्रयुक्त होता था। गांधीजी ने इसे लोकचिंतन और व्यवहार का सिद्धांत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अहिंसा के सिद्धांत को उन्होंने भारतीय स्रोतों से उत्पन्न बता कर यह बताया कि यह परम्परा से हमें प्राप्त हुआ है और मानवीय जीवन इसी के कारण टिका हुआ है। अत: अहिंसा की मानवीय जीवन का आधार है। अहिंसा को जीवन के हर क्षेत्र में लागू करने का प्रयोग किया। उनका दृढ़ विश्वास था कि भारत की स्वतंत्रता अहिंसक साधनों से ही प्राप्त की जा सकती है।