गांधी और हिंसा का प्रतिरोध - Gandhi and the Resistance to Violence

गांधी और हिंसा का प्रतिरोध - Gandhi and the Resistance to Violence

महात्मा गांधी जुल्म अथवा आतंक को सहना कायरता मानते हैं। पर जुल्म एवं आतंक का सामना अस्त-शस्त्र के द्वारा करने को गलत मानते हैं। उनकी दृष्टि में हिंसा को हिंसा के द्वारा कभी भी खत्म नहीं किया जा सकता है। हिंसा एवं अत्याचार का प्रतिरोध त्याग, सविनय अवज्ञा एवं असहयोग के रास्ते पर चल कर किया जा सकता है। गांधी जी की दृष्टि में निहलो जन शस्तु के समक्ष देने में कोई संकोच नही किया जाना चाहिए क्योंकि शत्रु मात्र शरीर को क्षति पहुँचा सकता है आत्मा को नहीं। इस तरह से अहिंसात्मक प्रतिरोध में दोहरा फायदा है प्रथम कि शत्रु हमारे विचार एवं आत्माको गुलाम नहीं बना सकता है और हम अहिंसा धर्म का पालन भी कर सकते हैं।


1. निष्क्रिय प्रतिरोध:-

 गांधी जी प्रतिरोध के दो प्रकार निष्क्रिय एवं निष्क्रियको छ एवं अहिंसक प्रतिरोध को श्रेष्ठ मानते है। उनका कहना है कि शत्रु के सामने छूटने रोकना निष्क्रिय प्रतिरोध है। इससे अच्छा तो शत्रु के साथ अंतिम दम तक लड़ते हुए जान दे देना उचित होगा। कुछ न करके मरने से अच्छा है कि कुछ कर के मरे। इससे स्पष्ट होता है कि गांधी जी काबरता पूर्ण प्रतिरोध को कभी भी अच्छा नहीं माना बल्कि वे तो वीरतापूर्ण प्रतिरोधक के हिमायती थे।


II. अहिंसक प्रतिरोध :- 

अहिंसक प्रतिरोध से तात्पर्य गांधी जी मानते हैं कि हम शत्रु के शासन एवं नियम को अहिंसक दृष्टि से नहीं मानेंगे। शत्रु के समक्ष घुटने टेकने से अच्छा है कि उसके समक्ष अपनी गर्दन कर दे। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि अहिंसात्म प्रतिरोध शत्रु को मनोवैज्ञानिक स्तर पर कमजोर करने के साथ-साथ शत्रु में परिवर्तन की संभावना देखता है। अहिंसात्मक प्रतिरोध अस्थाई प्रभाव सरकारी हिंसा एवं लोक हिंसा के खिलाफ डालता है।