गांधी की हिंसा दृष्टि एवं समाज कार्य - Gandhi's Violence Vision and Social Work

गांधी की हिंसा दृष्टि एवं समाज कार्य - Gandhi's Violence Vision and Social Work

महात्मा गांधी राजनीतिज्ञ, विचारक, वकील एवं सत होने के अलावा एक समाजसेवी एवं समाज कार्यकर्ता भी थे। इसी लिए तो गांधी जी को व्यावहारिक आदर्शवादी भी कहा माध्यम से समाज कार्य में सक्रीय थे।


1. वैयक्तिक समाज कार्य एवं हिंसा दृष्टि :- 


महात्मा गांधी जी व्यक्ति को एक संपूर्ण इकाई के रूप में समझते थे। उनका मानना था कि व्यक्ति जन्म से ही शुद्ध शांतप्रिय एवं अहिंसक रहा है। यदि कोई व्यक्ति अहिंसक रास्ते पर चल पड़ा है तो यह परिस्थितियों का प्रतिफल है। वैचारिक प्रशिक्षण एवं निर्देशक द्वारा व्यक्ति की समस्या को हल किया जा सकता है। इस तरह से गांधी जी वैयक्तिक समाज कार्य में प्रेमवत मॉडल के समर्थक थे।


II समूह समाज कार्य एवं हिंसा दृष्टि :- 


समूह समाज कार्य समाज कार्य की एक प्रमुख प्रणाली है। इसमें व्यक्ति, समूह अथवा समुदाय की समस्या को समूह द्वारा खत्म किया जाता है। गांधीजी गो सेवा संघ, किसान संघ, खादी उद्योग संघ जैसे समूहों के द्वारा समाज को सशक्त करने एवं विकास करने की बात किया। अहिंसा की दृष्टि समूह समाज कार्य के लिए त्याग के साथ होना गांधी ने आवश्यक बताया।


सामुदायिक समाज कार्य एवं हिंसा दृष्टिः- 


व्यक्ति से समूह एवं समूह से ही समुदाय की निर्मिति चनती है। गांधी की दृष्टि में व्यक्ति जन्म से अहिंसक होता है अतः समाज को भी अहिंसक होना होगा। हिंसा को पशुतापूर्ण व्यवहारका प्रतिफल है। जो स्वार्थ एवं भोग भावना के बाद पलित होता है। अतः गांधीजी ग्रामस्वराज्य, कुटीर उद्योग, न्यास, सामूहिक भागीदारी के द्वारा समुदाय की समस्या हल करने की कोशिश करते है।


IV. सामाजिक क्रिया एवं हिंसा दृष्टि: 


सामाजिक क्रिया से तात्पर्य उद्देश्यपूर्ण तरिके से कार्य को करना होता है। गांधी जी हिंसा के जगह अहिंसक तरीके से सामाजिक परिवर्तन की वकालत करते थे। उनका मानना था कि अहिंसक आन्दोलन, हड़ताल, बहिष्कार, आमरन अनसन आदि के द्वारा सामाजिक बदलाव किये जा सकते है। इन सभी साधनों में अहिंसा एक उभयनिष्ट पक्ष होगी। गांधी जी परिवर्तन के लिए थोपी गई विचार धारा एवं प्रक्रिया के जगह लोकतांत्रिक बदलाव के समर्थक थे। उनका मानना था कि आत्मनिर्णय के द्वारा सहभागी सामाजिक क्रिया ही सकारात्मक सामाजिक व्यवस्था कायम कर सकती है।


समाज कल्याण प्रशासन एवं हिंसा दृष्टि समाज कल्याण प्रशासन के अंतर्गत नीति निर्माण एवं क्रियान्वय के साथ-साथ मूल्यांकन को सम्मिलित किया जाता है। समाज कल्याण प्रशासन के तहत राज्य स्तर पर सामाजिक सुरक्षा एवं सामाजिक हित के लिए किये जाने वाले सभी कार्य आते है। राज्य स्तर पर सामाजिक परिवर्तन के साथ बदलते समस्याओं के निदान हेतु जो नीतियाँ एवं कानून बनाये जाते है कि समाज के कल्याण के लिए जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा एवं लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए। जब राज्य सामाजिक सुरक्षा एवं कल्याण के क्षेत्र में नागरिकों के साथ भेदभाव करता है तो यह एक तरह की असंतोष एवं ईष्र्या का कारण बनता है जिसके कारण सामाजिक हिमा के उझेलन में गतिप्राप्त होती है।


गांधी अहिंसा के पुजारी थे। वे हिंसा के द्वारा किसी भी चीज को प्राप्त करने के पूर्ण खिलाफ थे। राज्य अथवा किसी अन्य प्रकार के अन्याय के प्रतिरोध के खिलाफ अहिंसा को ही एक साधन मानते थे। मगर गांधी निष्क्रिय प्रतिरोध के जगह अधिक प्रतिरोध को अपनी मान्यता देते थे। उनका मानता था कि राष्ट्र एवं समाज का उद्धार अहिंसक प्रतिरोध के द्वारा ही संभव है। इसका अभिप्राय गांधी कायरताका वरण करने की शिक्षा नहीं देते थे। कायरता एवं हिंसा में से हिंसा को चुनना ज्यादा श्रेयस्कर मानते थे। वे कहते थे कि अहिंसा कायरों के लिए संभव नहीं है यह तो चारों की भाषा है। दण्ड देने की सामर्थ बल के बावजूद क्षमा भावना रखना ही अहिंसा है। इस तरह समाज कार्य के दृष्टिसे गांधी जी बड़े प्रासंगिक जान पड़ते है। समाज कार्य में हाल्मोंस मॉडल 'प्रेमवत मॉडल' के नाम से जाना जाता है और गांधी जी भी अहिंसक रूप से अपने विचार व्यक्ति, समूह एवं समुदाय की समस्या के निदान एवं उपचार हेतु देकर 'प्रेमवत मॉडल' के सार्थकता की पुष्टि करते है।