इतिहास और मानव का विकास - History and Development of Human Literature

इतिहास और मानव का विकास - History and Development of Human Literature

सहित्येतिहास की भूमिका

अरवी शताब्दी में पश्चिम में इस बात की आवश्यकता महसूस की जाने लगी कि इतिहास क्या है; मनुष्य क्या है इतिहास के अभिन्न अंग के रूप में प्रत्येक मानव जीवन की भूमिका को पहचानने की चेष्टा आरम्भ हुई हेगेल, एम. ओकशाट, मू. बर्कहा, इ. एच. कार, आर. जी. कालिंगउट आदि ने अपनी भूमिका निभायी। इतिहास दर्शन को नए सन्दर्भ में जाने बिना साहित्य-इतिहास-दर्शन को सम्यक रूप से नहीं जाना जा सकता।


अब पाया गया कि इतिहास की सच्ची परख की असली समस्या उसके दृष्टि की समस्या है, और यह सभी सम्भव है, जब युगबोध में वैज्ञानिकता का प्रवेश हो इस दृष्टि के बावजूद यह भी स्पष्ट होता है कि इतिहास आदि से वर्तमान और भविष्य में प्रक्षेपित होता हुआ अनन्त प्रवाह है इतिहास घटित से ज्यादा मानव जीवन का अध्ययन है, यह मानव निष्क्रिय या घटना में समाप्त हो गया। निर्जीव मानव नहीं अपितु वर्तमान में परफलता फूलता, अपनी भविष्य की सम्भावनाओं के साथ जीता हुआ मानव है, जिसने सामाजिक विषमताओं में संघर्षरत होकर उन्नति की ओर बढ़ाने का प्रयास किया है इतिहास पुरुष ने जैविकी विकास को स्वीकारते हुए उन तमाम विकास प्रक्रिया को अपनाया, जिससे वह जीवन संघर्ष को झेलकर आज नए सिरे से वर्तमान के साथ विकासमान है। उसमें क्रमश: चेतना का जागरण हुआ और इतिहास पुरुष प्रकृति-निर्भरता को छोड़कर आत्मनिर्भर ही नहीं अपितु प्रकृति को भी अपने नियन्त्रण में रख सका। बर्कहाट के अनुसार, "चेतना के जागरण के कारण प्रकृति से टूटकर होना ही इतिहास है।" (रिलेक्शंस ऑन हिस्ट्री में बह 1951. पू. 31) यही नहीं, यह भी स्वीकार किया गया कि "यथातथ्य होना एक दायित्व है कोई गुण नहीं नहीं, इतिहास क्या है पू. 7) इतिहास से इतिहासकार का अविच्छिन्न सम्बन्ध है इतिहास अपने युग के सापेक्ष तमाम सम्भावनाओं को ढूंढ निकालता है, इतिहासकार पर इतिहास बुद्धि का जो उत्तरदायित्व सौंपा गया है, उसके बावजूद भी अन्तिम इतिहास लिखने की सम्भावना नहीं मानी जा सकती, क्योंकि युग चेतना के अनुक्रम में दृष्टि या सम्भावनाएँ बदलती रहती है। एक्टन के अनुसार "हम अपनी पीढ़ी में अन्तिम इतिहास नहीं लिख सकते, लेकिन हम परम्परागत इतिहास को रद्द कर सकते हैं, और इन दोनों के बीच प्रगति के उस बिन्दु को दिखा सकते है, जहाँ हम पहुंचे हैं।" (वही, पृ. 5)


मानवीय इतिहास लेखन की व्यवस्था में प्रयोजनमूलक को माना गया है, जिसमें इतिहास के तथ्य, वर्तमान के उपयोग के साथ प्रस्तुत किए जाने चाहिए यहाँ जीवन की उपयोगिता एवं अनुपयोगितावादी दृष्टिकोण का सिद्धान्त लागू होता है। ई. एच. कार कहते हैं, 'मनुष्य का अपने परिवेश के प्रति जो सम्बन्ध है यहाँ इतिहासकार का अपनी विषय वस्तु से है। इतिहासकार न तो अपने तथ्यों का बदाम गुलाम होता है न ही उसका निरंकुश शासक (वही, पृ. 26) पुनः ई. एच. कार कहते हैं, "इतिहास से शिक्षा ग्रहण करना ए है। वर्तमान को अतीत की रोशनी में देखने का अर्थ है अतीत को वर्तमान की रोशनी में देखना इतिहास का कार्य है वर्तमान और अतीत के पारस्परिक सम्बन्ध के माध्यम से दोनों की ओर गहरी समझ प्रस्तुत करना (वही, पृ. 71) इस प्रक्रिया में अतीत अतीत ही रहता है, किन्तु वर्तमान और भविष्य क्रमशः अतीत की स्थिति को ग्रहण करते हैं और योगपदीय रूप में इतिहास की विषय वस्तु बनते रहते हैं।


ऐतिहासिक प्रक्रिया के साथ ही इतिहास के विकास का सवाल भी जुड़ा हुआ है। ऐतिहासिक विकास मानव जीवन के समस्त प्रगति का विकास है या कि मानव का बौद्धिक विकास है या कि मानव का बौद्धिक विकास है। मानव मस्तिष्क विकास प्रक्रिया में है, जो अपनी विकास पद्धति में स्वतन्त्रता की अवधारणा की ओर गतिशील होता है। मानव मस्तिष्क अपनी चिन्तन प्रक्रिया में काफी स्वतन्त्र होता है। वस्तुतः स्वतन्त्र और तर्क दो अलग वस्तुएँ नहीं है और तर्क मानव मस्तिष्क के बाहर की वस्तु नहीं होंगेल के अनुसार 'इतिहास में विकास का अर्थ है स्वाधीनता की धारणा की दिशा में विकास पू.71)