मानव की सृजनशीलता - human creativity
मानव की सृजनशीलता - human creativity
मनुष्य अपने जीवन के प्रवाह में विषय और अर्थ का आनुषांगिक प्रयोग करता चलता है न कि क्रिया के क्षण में मात्र संवेदित होता है। अर्थवत्ता के साथ जुड़कर ही मानव व्यवहार एक सामाजिक व्यवस्था का अंग बनता है। यह अर्थवत्ता भी समाज सापेक्ष होने के कारण होती है। इसीलिए वह संरचनात्मक होता चलता है। इस है बीच वह कारण की श्रृंखला से अपने को मुक्त पाता है। लेकिन उसकी स्वतन्त्रता निश्चय ही समाज के अन्धन में ही हो सकती है, क्योंकि उस दौरान अपनी बौद्धिकता के कारण ऐसा करने के लिए बाध्य होता है। इस प्रक्रिया में वह भोक्ता न होकर कर्त्ता होता है, क्योंकि वह अपनी बौद्धिकता एवं अवधारणा तथा संवेगों का निर्वैयक्तीकरण करता है। उस समय मनुष्य संरचनात्मक वृत्ति में जीता है और वह व्यक्ति रूप से हटकर संस्कृति मानव होता है तथा वह व्यक्तित्व से आगे चलकर व्यक्तित्व के धरातल पर पहुंच जाता है अगर वह सांस्कृतिक अस्तित्व में अपनी चेतना का लय करता होता है। यशदेव शल्य का विचार उल्लेखनीय है यह स्वतन्त्रता मानव की केवल संस्कृति मानव के रूप में ही उपलब्ध होती है, व्यक्ति इसमें पूर्ण परतन्त्र है, सांस्कृतिक प्राणी के रूप में उसका स्वअधिष्ठित नहीं है, वह सांस्कृतिक स्व में अधिष्ठित है। (यशदेव शल्य, संस्कृति मानव कर्तृत्व की व्याख्या, पृ. 3)
समाज की रचना को परमाणुकीय रचना के रूप में देखा जा सकता है। यह समस्त व्यक्तियों का केन्द्रक । इन व्यक्तियों का आपस में आवेगात्मक सम्बन्ध होता है। देवराज ने मनुष्य की सृजनशीलता को निम्नलिखित रूपों में स्पष्ट किया है, (पू. 14-15)
(क) मनुष्य प्रकृति के वस्तु क्रम में अपने उपयोगात्मक तथा सौन्दर्यमूलक प्रयोजनों के अनुसार परिवर्तन और नए संगठन उत्पन्न करके अपनी सृजनशीलता को प्रमाणित करता है। (ख) मनुष्य अपने परिवेश को एक सार्थक क्रम या व्यवस्था (Meaningfull Order) के रूप में जानता या ग्रहण करता है।
(ग) मनुष्य लगातार अपनी प्रतिक्रियाओं की सीमा में विस्तार करता रहता है, जिस यथार्थ के प्रति ये
प्रतिक्रियाएँ की जाती है, वह भी निरन्तर विस्तृत होता रहता है। (घ) मनुष्य की सृजनशील प्रकृति का सबसे स्पष्ट प्रकाशन उसकी प्रतीकबद्ध कल्पनामूलक निर्मितियों में होता है।
(ङ) सृजनशील कल्पना का सबसे प्रमुख कार्य यह है कि वह ज्ञात के आधार पर उच्चतर का भावन और प्रस्तुति करें इस उच्चतर का सम्बन्ध हमारी नैतिक सौन्दर्यपरक अनुभूतियों से होता है। कल्पना द्वारा प्रस्तुत उच्चतर को यथार्थ बनाने का प्रयत्न ही मनुष्य जाति को प्रगतिशील बनाता है।
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