साहित्येतिहास की दृष्टि - Literary History

साहित्येतिहास की दृष्टि - Literary History

साहित्येतिहास की दार्शनिक व्याख्या तक पहुँचने के लिए मानविकी इतिहास को मूल्यों के क्रम में पृष्ठभूमि के रूप में स्वीकार करके ही चलने का आद्यन्त प्रयास किया गया। यद्यपि साहित्य को कला के रूप में मानने वाले साहित्य को पूर्णतः स्वायत्त तथा उसके कलात्मक सौन्दर्यबोधीय मूल्य को शांत और सार्वभौम मानते हैं। अतः शातता का इतिहास कैसा ? उनकी दृष्टि में साहित्य में मानव के विकास की जटिलता एवं परिवर्तनशीलता का अस्तित्व नहीं है। सच बात यह है कि साहित्य की रचना में विधेयवादी दृष्टि को उसकी रचनात्मकता में स्वीकार करना ही होगा। साथ ही उन खतरों के प्रति भी सचेष्ट रहने की आवश्यकता है जिसके कारण साहित्य का इतिहास विधेयवादी इतिहास या कि सामाजिक इतिहास ही न हो जाए।

साहित्य का इतिहास, इतिहास भी है और रचना भी मानव की सामाजिक प्रवृत्ति उसकी परम्परा निर्माण की क्षमता, सांस्कृतिक उपलब्धि के सन्दर्भ में प्रगमन और की ओर अपसरण के सन्दर्भ में ही साहित्य के इतिहास लेखन की आवश्यकता को महसूस किया जा सकता है। मनुष्य अपनी चेतना का सामान्यीकरण करने की अपूर्व शक्ति रखता है। वह अपनी वैयक्तिकता का निर्वैक्तिकरण प्रस्तुत करने की स्थिति में हमेशा हो सकता है। अतः मनुष्य अपनी सृजनात्मकता में सापेक्षवाद का शिकार होता चलता है। फलतः वह परम्परा को छोड़ता चलता है। इसी परम्परा के रूप में वह मूल्यों की स्थापना भी करता चलता है। अपनी सम्पूर्ण उपलब्धि में मनुष्य सृजनशील है और उसकी रचनाशीलता संस्कृति के साथ साहित्य में प्रतिफलित होती है। मनुष्य रचना के निर्माण में परिवेश एवं परम्परा के परिवर्तन का प्रभाव ग्रहण करता चलता है। अतः साहित्यिक रूप, चेतना और अभिव्यक्ति आदि में परिवर्तन के साथ-ही-साथ सांस्कृतिक मूल्यों के अन्तर्गत ही गुणात्मक विकास या कि परिवर्तन होता चलता है। अतः मानव की रचनाधर्मिता, परम्परा एवं सांस्कृतिक रचनाशीलता आदि के क्रम में ही साहित्येतिहास की आवश्यकता है और इसी क्रम में साहित्येतिहास-दर्शन का विवेचन अपेक्षित ही नहीं आवश्यक है।


मानव जीवन की धारावाहिकता या अजनता उसकी ऐतिहासिकता का ही बोधक है, क्योंकि मनुष्य ने जीवन और अनुभूति के स्तर पर जो गुणात्मक विकास किया, वह सामाजिक के रूप में ही किया। समस्त मानव कर्तृत्त्व प्रयोजन तथा सापेक्षवाद के स्तर पर इतिहास की चीज बन जाता है। इसी परम्परावादिता के स्तर पर ही मानव जीवन अजय प्रवाह में प्रगामी होती है। इस रूप में व्यक्ति समाज के साथ अटूट सम्बन्ध के कारण ही परम्परा का वहन करता है और परम्परा में बहुत कुछ जोड़ता भी चलता है उसकी सृजनशीलता का दौर चलता हैपरम्परा का वहन करता है और परम्परा में बहुत कुछ जोड़ता भी चलता है उसकी सृजनशीलता का दौर चलता है। और विशिष्ट होता हुआ भी सामान्यीकरण का शिकार होता चलता है। यशदेव शल्य ने इस बात की ओर संकेत किया है "मनुष्य को उसकी जो विशेषता पशु से पृथक् करती है वह यह है कि वह प्रदत्तों के विश्व में नहीं रहकर व्यवस्थात्मक या संरचनात्मक विश्व में रहता है।" (यशदेव शल्य, संस्कृति मानव कर्तृत्व की व्याख्या, पृ. 1)

दूर शिक्षा निदेशालय महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय