महात्मा गांधी का बुनियादी शिक्षा - Mahatma Gandhi's Basic Education
महात्मा गांधी का बुनियादी शिक्षा - Mahatma Gandhi's Basic Education
महात्मा गांधी को रूद अयों में शिक्षाशास्त्री कहना कठिन है परन्तु शिक्षा जगत को उनकी देन “बुनियादी तालीम” बहुत महत्वपूर्ण है। भारतीय आकांक्षाओं के मुताबिक एक नवीन शिक्षा पद्धति को प्रस्तुत करना उनकेसाहस का परिचय है। गांधीजी के लिए भारत का अर्थ अन्य समकालीन विचारको राजनीतिज्ञो प्रशासको का की तरह केवल शहरी भारत नहीं था अपितु भारत का अर्थ ग्रामीण भारत था। बुनियादी तालीम के रूप में एक ऐसी शिक्षा पद्धति प्रस्तुत हुई जिसमें इस ग्रामीण भारत की आकांक्षाएँ एवं भागीदारी सुनिश्चित हुई, ग्रामीण भारत की वह भागीदारी ब्रिटिश शिक्षा पद्धति के कारण अभी तक नदारद थी।
1937 में बुनियादी तालीम का उद्भव एक अकस्मात घटना नहीं है अपितु यह गाँधीजी के सतत चिंतन का परिणाम है। 1937 के बुनियादी तालीम संबंधी अधिवेशन से बहुत पहले ही उन्होंने शिक्षा के बुनियादी प्रयोजन पर विचार करना प्रारंभ कर दिया था। उनकी आत्मकथा सत्य के मेरे प्रयोग अथवा आत्मकथा' (2003) में शिक्षा संबंधी उनकी बैचेनी एवं प्रयोगों को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। विशेषत टॉलस्टॉय फॉर्म पर उनके शिक्षा संबंधी प्रयोग बुनियादी तालीम से जुड़े महत्वपूर्ण संदर्भ है।
गांधीजी के शिक्षा संबंधी विचारों का सावधानीपूर्वक अध्ययन करने पर हम यह कह सकते हैं कि औपनिवेशिक शिक्षा की उन्होंने तीन प्रकार से आलोचना की
1. औपनिवेशिक ढाँचा उन्होंने शिक्षा के औपनिवेशिक ढाँचे की कड़ी आलोचना की। ब्रिटिश शिक्षा व्यवस्था मूलतः बाबूगिरी के लिए जवानों की फौज तैयार करती थी। प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा का पूरा ढाँचा इसी विश्वविद्यालय की शिक्षा के आधार पर तैयार किया गया था। इसी कारण बहुसंख्यक भारतीय जनता इस शिक्षा से वंचित रही। अंग्रेजों ने अपने शासन से पूर्व के शिक्षा विकेन्द्रित एवं सशक्त ढाँचे को तोड़ा
2. औपनिवेशिक शिक्षा की अन्तर्वस्तु गाँधीजी ने लगातार इस शिक्षा के बुनियादी प्रयोजन की आलोचना की। यह स्पष्ट किया कि इस शिक्षा प्रणाली में भारतीयता को स्थान नहीं दिया गया था। सम्पूर्ण शिक्षा भारतीय संदर्भों एवं परिपटनाओं से दूर है। देश की समकालीन समस्याओं, अधिसंख्यक जनता के दैनिक जीवन की समस्याओं से इस शिक्षा का कोई लेना-देना नहीं है। इस शिक्षा की अन्तर्वस्तु वस्तुतः एक विशेष प्रकार की नौकरी के लिए विद्यार्थी को तैयार करती है। इस शिक्षा पद्धति से निकला विद्यार्थी अपने समाज से कटा और उसे हेय मानने वाला होता है। यह शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक अपने का सीमित करती है। पुस्तक केन्द्रिता के कारण यह केवल एकपक्षीय बौद्धिक कसरत रह जाती है। जबकि शिक्षा का वास्तविक अर्व निरंतर शंका, शुद्ध जिज्ञासा प्रज्ञा भाव एवं चरित्र निर्माण से है।
3. मानसिक गुलामी एवं हिंसा गाँधीजी ने ब्रिटिश शिक्षा पद्धति को इसके सम्पूर्ण रूप में मानसिक गुलामी के औजार बतौर देखा। अपनी शिक्षा पद्धति के जरिए ब्रिटिश इवान ईलिव के शब्दों में कहे तो शिक्षा के गुप्त एजेंडे में अपनी श्रेष्ठता तथा भारतीयों की हीनता को मानसिक तौर पर भारतीयों में भरना चाहते थे। गांधीजी ने इस मानसिक गुलामी के घातक परिणामों को देखा था। साथ ही यह शिक्षा पद्धति में अनिवार्यतः श्रेष्ठता और हीनता का भाव निहीत होने के कारण यह हिंसा भाव को जन्म देती है। मनुष्य मात्र में विभाजन कर मनुष्य को मनुष्य के खिलाफ खड़ा करती है। अपनी दार्शनिक आधारभूमि साम्राज्यवादी होने के कारण प्रकृति के प्रति भी हिंसक है।
इन बिंदुओं से यह स्पष्ट है कि गांधीजी के लिए यह शिक्षा पद्धति अस्वीकार्य थी। अतएव वह लगातार इसके विकल्प की खोज में थे। शिक्षा संबंधी उनके इस विकल्प पर विचार करने से पहले इसी विचार से जुड़ी अन्य बातों पर दृष्टिपात करना आवश्यक है। भारतीय संदर्भ में गाँधीजी की सशक्त उपस्थिति सर्वविदित है। अपने सत्य व अहिंसा के सिद्धांतों को आधार बना अपने व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत कर इन सिद्धांतों को सार्वजनिक एवं व्यक्तिगत जीवन में उपयोगी सिद्ध किया। उनके लिए अहिंसा केवल भावनात्मक धारणा ही नहीं अपितु एक वैज्ञानिक एवं तार्किक सिद्धांत भी है। उनके अनुसार यदि सृष्टि का नियम प्रेम का नियम है जैसा कि वह है- तो वैज्ञानिक दृष्टि से उचित यही है कि इस प्रेम के नियम के अनुसार ही जीवन संचालित किया जाए। इसी अहिंसा को सिद्धांत बना कर गांधीजी ने दक्षिणी अफ्रीका में सत्याग्रह का सफल प्रयोग किया। वैज्ञानिक आधार एवं विभिन्न तर्कों से पुष्ट इसी अहिंसा को उन्होंने सार्वजनिक एवं व्यक्तिगत जीवन में लागू करने का प्रयास किया। यह अहिंसा दृष्टि ही राजनैतिक क्षेत्र में सत्याग्रह, आर्थिक क्षेत्र में स्वदेशी, सांस्कृतिक क्षेत्र में सर्वधर्म समभाव, सामाजिक जीवन में एकत्व तथा शिक्षा क्षेत्र में बुनियादी तालीम के रूप में सामने आती है।
इस अहिंसा दृष्टि का सार मम तथा समेतर स्व और पर के बीच प्रेमपूर्ण एवं सृजनात्मक संबंधों में निहीत है। इस ममेतर पर में केवल मनुष्य ही नहीं अपितु सम्पूर्ण सृष्टि शामिल है। इस प्रकार अहिंसा दृष्टि का व्यावहारिक आधार व्यक्ति द्वारा न केवल अन्य व्यक्ति अपितु सम्पूर्ण सृष्टि के साथ प्रेमपूर्ण संबंध स्थापित करना है। इसी दृष्टि के आधार पर गांधीजी के सत्याग्रह के दर्शन को समझा जा सकता है। वस्तुतः गांधीजी के जीवन का सम्पूर्ण सार अहिंसा पर आधारित एक मानवीय सभ्यता का निर्माण करना है। 1931 में लंदन में भारतीय विद्यार्थियों की सभा में गांधीजी द्वारा कहा गया निम्नलिखित कथन उनके समस्त विचारों को समझने का प्रस्थान बिंदु है
मुझे अपने देशवासियों की पीड़ाओं के निवारण से भी ज्यादा चिन्ता मानव प्रकृति के बकरण को रोकने की है। (उद्धृत आचार्य: 1995) बुनियादी तालीम का यही वैचारिक आधार है या कहना चाहिए कि यहाँ अहिंसा दृष्टि शिक्षा क्षेत्र में बुनियादी तालीम के रूप में सामने आई है।
गांधीजी ने शिक्षा को सामाजिक पुनर्रचना के लक्ष्य को प्राप्त करने का साधन माना। भारतीय आकाक्षाओं के मुताबिक शिक्षा की नवीन पद्धति पर जोर दिया। उनका पूरा जोर शिक्षा को समाज की हकीकत के साथ जोड़ने का रहा। उन्होंने शिक्षा को गरीब व्यक्ति के नजरिए से देखा और इस बात पर गहराई से विचार किया कि भारत में ऐसी शिक्षा पद्धति लागू की जानी चाहिए जो समाजोन्मुखी उपयोगी तथा सभी की पहुँच में हो। बुनियादी तालीम इसी का प्रत्युत्तर थी। गाँधीजी ने शिक्षा का व्यापक अर्थ लिया था। ब्रिटिश शिक्षा की भाँति वह शिक्षा को न तो साक्षरता मात्र मानते थे और न ही उसका अंतिम लक्ष्य नौकरी जीवन को सम्पूर्णता में देखने के कारण ही उनके यहाँ शिक्षा भी इसी अहिंसामूलक शोषण एवं स्वतंत्र समाज की प्राप्ति का -साधन हो जाती है।
गाँधीजी ने शिक्षा का स्वराज के साथ जोड़कर देखा और 1905 में ही यह स्पष्ट कर दिया था कि शिक्षा के प्रति उनकी दृष्टि क्या है:
"देश में सच्ची जरूरत शिक्षा की है। शिक्षा का अर्थ कसा कर बैठ जाना नहीं है बल्कि यह जानना है कि हमारे अधिकार क्या है यह समझा कि अधिकारों के साथ हमारे उत्तरदायित्व और कर्तव्य क्या है।" (इंडियन ओपिनियन, 16.12.1905)
एक अन्य उदाहरण बुनियादी तालीम और स्वराज के बीच के गहरे संबंध को और स्पष्ट कर देता है. सच्चा स्वराज मुठ्ठी भर लोगों द्वारा सत्ता प्राप्ति से नहीं आएगा, बल्कि सत्ता के दुरुपयोग किए जाने की सूरत में, उसका प्रतिरोध करने की जनता की सामर्थ्य विकसित होने से आएगा। दूसरे शब्दों में, स्वराज जनता को सत्ता का नियमन तथा नियंत्रण करने की अपनी क्षमता का विकास करने की शिक्षा देने से आएगा।'' (यंग इंडिया 29.01.1925)
इन दो उद्धरणों से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि बुनियादी तालीम की पृष्ठभूमि का आयाम कितना व्यापक है।शिक्षा का नजरिया एक स्वतंत्र, विवेकी एवं जिम्मेदार नागरिक का निर्माण करना है। भारतीय संदर्भ में यह आधार अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है। इसीलिए गाँधीजी ने जब बुनियादी तालीम की कल्पना की तब स्वराज के प्रति उसके संबंध उनके मन में बिल्कुल स्पष्ट थे कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो सत्याग्रही हो। बुनियादी तालीम का संबंध जहाँ एक ओर स्वराज की प्राप्ति एवं उसे बनाए रखना है वहीं दूसरी ओर इसका लक्ष्य ग्रामीण भारत जो गांधीजी के अनुसार वास्तविक भारत है को शिक्षित करना भी है। बुनियादी तालीम का गहन अध्ययन करें तो हम उसकी निम्नलिखित कुछ आधारभूत विशेषताओं को समझ सकते हैं:
1. 07-14 वर्ष समूह के बच्चे बच्चियों हेतु मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा
2. मातृभाषा के जरिए शिक्षण।
3. उपयोगी हस्तशिल्प उद्योग के जरिए शिक्षा साथ ही साथ जहाँ तक संभव हो सके हस्तशिल्प उद्योग
2 स्थानीय वातावरण के अनुकूल हो।
4. अनिवार्य शारीरिक श्रम
6. शिक्षा का स्वावलम्बी होना।
7. व्यक्तित्व का सवागीण विकास
इन्हीं विशेषताओं के आधार पर बुनियादी तालीम का प्रारंभिक ढांचा खड़ा किया गया, बाद में इसमें पूर्व बुनियादी और उत्तर बुनियादी तालीम पक्ष को भी शामिल किया गया। गांधीजी द्वारा प्रस्तुत बुनियादी तालीम एक मानवीय संस्कृति की आधारभूत जरूरत को पूरा करने का प्रयास करती है। वह मनुष्य की रचनात्मकता और समाज के मूलभूत उद्योग-धंधों के बीच करीबी रिश्ते को समझते थे। उनके अनुसार शिक्षा किसी विशेष वर्ग (Class) के लिए नहीं बल्कि जनसमुदाय (Masses) के लिए सर्वसुलभ होनी चाहिए। इसॉलिए वह बुनियादी तालीम के अंतर्गत शिक्षा को मुफ्त एवं अनिवार्य बनाने के पक्षधर है।
मातृभाषा में शिक्षण पर गांधीजी का प्रारम्भ से जोर रहा। हर शिक्षाशास्त्री इस तर्क को स्वीकार करता है कि बच्चे/बच्चियों का प्रारम्भिक शिक्षण मातृभाषा में होने से व्यक्तित्व विकास ज्यादा बेहतर तरीके से होता है। मातृभाषा शिक्षण दो तरीके में महत्वपूर्ण है.
1. मातृभाषा में शिक्षण विद्यार्थी को उसकी संस्कृति, समाज से सीधा जोड़ता है। यह जुडाव एक सामाजिक एकत्व को उत्पन्न करता है। विद्यार्थी अपनी समृद्ध विरासत से जुड़ता है। यह अनुभव करता है कि मातृभाषा में भी ज्ञानार्जन सभव है। यह उसम आत्मसम्मान का भाव पैदा करता है।
2. मातृभाषा में शिक्षण कर विद्यार्थी मानसिक गुलामी के उस चंगुल से दूर होता है जिसमें विदेशी भाषा उसे
अपने शिक्षण के जरिए निम्न या दोयम दर्जे का बनाने पर जोर देती है। बुनियादी तालीम द्वारा शारीरिक श्रम की अनिवार्यता एवं उद्योग-धंधे द्वारा शिक्षा प्रदान करना गहरे स्तर पर भारतीय वातावरण की आवश्यकता था उद्योग हस्तशिल्प द्वारा शिक्षा ग्रामीण भारत की एक हकीकत थी। बुनियादी तालीम में उद्योग / हस्तशिल्प द्वारा शिक्षा केवल उन्हीं की शिक्षा नहीं है बल्कि वह उस उद्योग से जुड़े शिक्षा प्रदान कर तमाम ज्ञान को भी सीखता है। विद्यार्थी कताई चुनाई के साथ-साथ कपास की खेती खेती के लिए आवश्यक सामग्री मिट्टी, नमी, प्रकाश, पानी, वातावरण इत्यादि, उत्पादन, वितरण, इतिहास, अर्थव्यवस्था, सामाजिक भूमिका, गणित इत्यादि का भी ज्ञान अर्जित करता है। बुनियादी तालीम के विद्यार्थी समाज में विद्यमान आस पास के लोगों के पेशे के जरिए सीखते हैं। इस दौरान समाज की आवश्यकता सामाजिक हितों, समाज के अन्तसंम्बन्धों को जानता और सीखता है। प्रत्यक्ष अनुभव से अर्जित विद्यार्थी की यह सामाजिक भूमिका आ समाज में एक सामाजिक रूप से बेहतर जिम्मेदार नागरिक बनाती है और सहयोगमूलक दृष्टिकोण प्रदान करती है। गाँधीजी ने उद्योग-धंधों के जरिए शिक्षा का प्रस्ताव कर पुस्तक केन्द्रित प्रणालीको नकारा, वहीं समाज के यथार्थ अनुभव को ज्यादा प्रामाणिक मानकर ज्ञान का स्रोत बताया। वस्तुतः बुनियादी तालीम में सिद्धांत और व्यवहार अमूर्तता और वास्तविकता पर एक साथ जोर दिया गया है। गाँधीजी द्वारा जब उद्योग-धंधे द्वारा शिक्षण को पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से जोड़ा जाता है तब उन्हें मानवीय प्रगति विशेष तौर पर तकनीकी प्रगति से पीछे की ओर मुड़ने वाला कहा जाता है।
यह आलोचना इसलिए उचित नहीं की जा सकती क्योंकि गाँधीजी तकनीक के विरोधी नहीं थे। उन्होंने जीवन भर तकनीक संबंधी प्रयोग किए। यह अवश्य है कि उनके तकनीक संबंधी प्रयोग 'जनसमुदाय के हितों से जुड़े होते थे। ग्रामोद्योग, हस्तशिल्प खादी चरखा, खेती, स्वास्थ्य इत्यादि में उन्होंने अनवरत प्रयोगों को प्रोत्साहित किया। इसके पीछे लक्ष्य बहुसंख्यक ग्रामीण जनता के हित संवर्धन हेतु तकनीक को ढालना एवं विकसित करना था जो कि स्थानीय जरूरतों को पूरा कर सके। बुनियादी तालीम में उद्योग हस्तशिल्प के जरिए शिक्षण विद्यार्थियों को एक ओर वास्तविक सामाजिक जरूरतों को समझने योग्य बनाता है वहीं 'विकास', 'को प्रयोग" इत्यादि विचारों की समाज सापेक्ष व्याख्या करने में सहायता करता है।
बुनियादी तालीम के अंतर्गत शारीरिक श्रम की अनिवार्यता इसके सामाजिक पुनर्रचना पहलू की सर्वाधिक सशक्त अभिव्यक्ति है। शारीरिक श्रम की अनिवार्यता बौद्धिक एवं शारीरिक श्रम के बीच के भेद को समाप्त करने का सशक्त साधन है। अभिजात्य तथा जनसाधारण के बीच के भेद को समाप्त करने का यह क्रांतिकारी साधन है। एक समतामूलक समाज की स्थापना को इस अवधारणा से बहुत बल मिलता है कि उसके सभी नागरिक समान रूप से शारीरिक श्रमपूर्ण जीवन यापन कर बौद्धिक एवं शारीरिक श्रम के बीच का यह भेद समाप्त करना मानव समता के लिए बहुत बड़ा पहल थी। शारीरिक श्रम के प्रति सम्मान तर विद्यार्थी को भारत के मेहनतकश किसानों एवं मजदूरों के समय के प्रति संवेदनशील करता है।
यहाँ यह द्रष्टव्य है कि गांधीजी शारीरिक श्रम को अनिवार्य बनाकर अपने आप को वामपंथी कहलाए जान के करोड ले आते हैं। वह इस अर्थ में वामपंदी कहे जा सकते हैं कि विभिन्न वर्ग के सभी लोगों के लिए श्रम
अनिवार्य है। मालिक-मजदूर के बीच भेद अम की होनता से जुड़ा है, यह हीनता ही शोषण को जन्म देती है। तत्कालीन भारतीय समाज में यह दृष्टिकोण तो और भी ज्यादा क्रांतिकारी था। वर्ण व्यवस्था जैसी घृणित संस्था के मूल में श्रम के प्रति हेय दृष्टि भी अपना कार्य करती है। शारीरिक श्रम करने वाला जनसमूह स्वयमेव ही निम्नजाति का और हो जाता है। उनका अम चाहे सामाजिक दृष्टि से कितना भी महत्वपूर्ण क्यों न हो परन्तु शारीरिक श्रम के प्रति हेय दृष्टि उन्हें सामाजिक अनुक्रम में निम्न ही मानती है।गाधाजी ने इस घृणित व्यवस्था के मूल में निहीत इस तथ्य को काफी बारीकी से जाना
"शारीरिक श्रम को शिक्षा से दूर रखने के कारण हम ग्रामीण उद्योग-धंथों को हलका समझने के अभ्यस्त हो गए हैं। शारीरिक श्रम को कुछ नीचे दर्जे का काम समझा जाने लगा और वर्णाश्रम की भीषण विकृति के कारण हम लोग कतैयाँ, जुलाहो, बढ़ई और मोचियों को नाँची जाति का और सर्वहारा मानने लगे।"(हारजन, 18.09.1397)
अतएव गांधीजी ने शारीरिक श्रम को अनिवार्य बनाया। जिससे सभी के मन में श्रम के प्रति सम्मान एवं संवेदनशीलता उत्पन्न हो तथा श्रम की गरिमा के अनुसार सम्मान हो। हम देख सकते हैं कि बुनियादी तालीम अपनी विशिष्टता के कारण सामाजिक पुनरंचना का सशक्त औजार बनती है। एक और बात महत्वपूर्ण है कि गांधीजी द्वारा बुनियादी तालीम में शारीरिक श्रम को अनिवार्य किया गया, यहीं 20वीं शताब्दी के चीन के एक अन्य महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यक्तित्व माओ ने भी जब अपने देश के मुताबिक शिक्षा पद्धति को प्रस्तुत किया तथ शारीरिक श्रम को अनिवार्य बनाया।
उनके यहाँ शारीरिक श्रम एक और स्थानीय जरूरतों के लिहाज से जरूरी था तो दूसरी ओर यह विद्यार्थियों में सर्वहारा' के प्रति संवेदनशीलता जागृत करने के लिए भी आवश्यक माना गया। गाँधीजी और माओ के वैचारिक आधार चाहे जो भी हो परन्तु श्रम की गरिमा को इन दोनों ने अपने शिक्षा संबंधी विचारों में शामिल किया है।
जहाँ तक शिक्षा के स्वावलम्बी होने का प्रश्न है, इस पर गाँधीजी का विचार स्पष्ट था कि एक स्वावलम्बी शिक्षा ही स्वावलम्बी शिक्षार्थी का जन्म दे सकती है। यह तर्क उसी तरह है जैसे कि अहिंसक समाज की है रचना अहिंसक साधनों द्वारा ही की जा सकती है। शिक्षा व्यवस्था के स्वावलम्बन का अर्थ बहुत गहरा है।
स्वावलम्बन का अर्थ किसी भी सत्ता से स्वतंत्रता की रक्षा हो जाता है। यह स्वतंत्रता ही किसी भी शिक्षा व्यवस्था के लिए मूलभूत जरूरत होती है। ब्रिटिश शासन के दौरान शिक्षण संस्थानों के सत्ता अधीन तथा केन्द्राभिमुखी होने के प्रत्यक्ष उदाहरण गाँधीजी के समक्ष थे। शिक्षा व्यवस्था के परावलम्बी होने के कारण वह सत्ता की पिछलगू एवं अनुचर बनी रही। गाँधीजी के अनुसार शिक्षा का व्यापक लक्ष्य एक स्वतंत्रचेता, विवेकी व्यक्तित्व का निर्माण करना है अतएव स्वयं शिक्षा व्यवस्था का स्वावलम्बी होना जरूरी है।
अहिंसक समाज की स्थापना करने के अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए गाँधीजी ने जीवन की सम्पूर्णता को दृष्टिगत रखते हुए सत्य एवं अहिंसा संबंधी प्रयोग कर नवीन सिद्धांतों का प्रतिपादन किया। शिक्षा समाज में
मानवीय मूल्यों के प्रति सकारात्मक परिवर्तन ला कर ही सामाजिक पुनर्रचना को संभव बनाती है। इसीलिए बुनियादी तालीम में व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास शिक्षाओं के बौद्धिक, भावनात्मक एवं नैतिक विकास पर बल दिया गया। जैसा कि सर्वविदित है कि गांधीजी ने 3R (Reading. Writing and Arithmetic) के स्थान पर 3H (Heart, Head and Hand) को प्रस्तावित किया। साथ ही शिक्षा को दैनिक जीवन से जोड़ने का प्रयत्न किया गाँधीजी के अनुसार: "मनुष्य न केवल बुद्धि है न निष्ट पाशनिक शरीर और न केवल हृदय अथवा आत्मा समय मान के उचित और सामन्जस्यपूर्ण योग से ही बनता है और शिक्षा की सच्ची योजना में इसी का समावेश होना चाहिए।" (हरिजन, 08.05.1937)
बुनियादी तालीम इस मायने में क्रांतिकारी है कि यह समाज और विद्यालय के बीच की खाई को खत्म करती है तथा सामाजिक पुनर्रचना में भागीदारी करती है। यहाँ सारा समाज ही विद्यालय हो जाता है। बुनियादी तालीम में विद्यालय समाज के भीतर कोई अलग अलग स्पन्दहीन अंग नहीं है बल्कि वह समाज को स्पन्दशील बनाने वाला अंग हो जाता है और समाज की पुनर्रचना अहिंसा के जरिए करने का साधन बनता है।
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि बुनियादी तालीम महात्मा गांधी की एक महत्वपूर्ण देन है। बुनियादी तालीम की सफलता के लिए जरूरी है कि उसे उसके मूलभूत आधारों के साथ सम्पूर्णता में लागू किया जाए। एक अत्मिक समाज यदि लक्ष्य है तो उसे प्राप्त करने का एक रास्ता बुनियादी तालीम से होकर गुजरता है। हमें यह तय करना है कि हम एक अहिंसक समाज को प्राप्त करना अपना लक्ष्य बनाते हैं या नहीं अगर हाँ तो हमें बुनियादी तालाम के अनुकूल अर्थव्यवस्था, राज्य सत्ता और सामाजिक वातावरण के लिए खुद को तैयार करना होगा।
वार्तालाप में शामिल हों