महात्मा गांधी के रचनात्मक कार्यक्रम - Mahatma Gandhi's Constructive Programs
महात्मा गांधी के रचनात्मक कार्यक्रम - Mahatma Gandhi's Constructive Programs
महात्मा गांधी के अवदान पर चर्चा करते समय स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका, सत्याग्रह की अवधारणा इत्यादि पर अधिक जोर दिया जाता है परन्तु एक अन्य महत्वपूर्ण परन्तु उपेक्षित अवदान रचनात्मक कार्यक्रमों को प्रायः विस्मृत कर दिया जाता है। एक अहिंसक एवं आदर्श समाज रचना के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए रचनात्मक कार्यक्रमों की अवधारणा का जन्म हुआ। कांग्रेस की सक्रिय सदस्यता से स्वयं को अलग करने के बाद गांधीजी ने अधिकांश समय सामाजिक उत्थान में लगाया। सतही तौर पर राजनीतिक स्वतंत्रता के संघर्ष में सक्रिय योगदान न करते हुए भी गांधीबी इन कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के जरिए आजादी की लड़ाई लड़ थे। वस्तुतः रचनात्मक कार्यक्रम स्वराज्य' की अपनी आंतरिक लड़ाई थी।
इस लड़ाई में उनका सामना भारतीय समाज और उसके वर्चस्वशाली तबके से था। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य समाज के सभी तबकों को आजादी में उनका वाजिब हक दिलाना और उनके मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीति में स्थान दिलाना था। रचनात्मक कार्यक्रम सत्याग्रहियों के लिए एक प्रयोगशाला थे जहाँ वह कड़ा अनुशासन, त्याग और अतिसक संघर्ष के नियमों का पालन कर एक सच्चा सत्याग्रही बनने का प्रयास करते थे। साधारण से प्रतीत होने वाले रचनात्मक कार्यक्रम समाज की पुनर्रचना के आधार थे। रचनात्मक कार्यक्रम के जरिए गांधीजी भारतीयों को शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तौर पर नयी दिशा की ओर उन्मुख करना चाह रहे थे जिससे वे न केवल ब्रिटिश सत्ता से मुक्त हो सके अपितु हिंसक आधुनिक सभ्यता के पाश से भी छूट सके। रचनात्मक कार्यक्रम अहिंसात्मक सिळांतों पर समाज में बदलाव का एक सर्वागीण दृष्टिकोण है।
रचनात्मक कार्यक्रमों से तात्पर्य गांधीजी द्वारा एक अहिंसक समाज की रचना और वर्तमान समाज की पुनर्रचना के कार्यक्रमों से है, जिनके आधार पर अहिंसा, न्याय और समानता के मूल्यों को दृष्टिगत रखते हुए, समाज निर्माण किया जा सकता है।
रचनात्मक कार्यक्रम की शुरूआत गांधीजी के अपने प्रारंभिक जीवन काल से ही देखने को मिलती है, जब वह दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के मानवाधिकारों की लड़ाई लड़ रहे थे। भारत आने बाद भी उनके विभिन्न कार्यक्रमों में हमें रचनात्मक कार्यक्रमों की झलक मिल जाती है। 1941 में इन कार्यक्रमों को गांधी ने एक व्यवस्थित रूप प्रदान किया और एक पुस्तक की रचना की जिसका शीर्षक "रचनात्मक कार्यक्रम का मर्म और महत्व" सना। गांधीजी ने अपनी इस पुस्तिका में रचनात्मक कार्यक्रमों का विस्तार से वर्णन किया। विभिन्न रचनात्मक कार्यक्रमों को निम्नानुसार बताया जा सकता है
1. कौमी एकता
2. अस्पृश्यता निवारण
3. शराबबन्दी
4. खादी
5. दूसरे प्रामोद्योग
6. गांवों की सफाई
7. नयी या बुनियादी तालीम
8. बड़ों की तालीम
9. स्त्रियां ज्ञान
10. आरोग्य की नियमों की शिक्षा
11. प्रान्तीय भाषाएं
12. राष्ट्रभाष
13. आर्थिक समानता
14. किसान
15. मजदूर
16. आदिवासी
17. कोड़ी
18. विद्यार्थी
इनके अतिरिक्त बाद में पशु-सुधार एवं प्राकृतिक चिकित्सा भी शामिल किए गए) (गंगराडे, के.डी., गांधियन एप्रोच टू डवलपमेंट एंड सोशल वर्क, पु. 188) रचनात्मक कार्यक्रमों पर विचार करने के बाद गांधीजी ने रचनात्मक कार्यक्रमों और सविनय अवज्ञा के बीच संबंध को परिभाषित करते हुए सविनय अवज्ञा के महत्व की चर्चा की। उन्होंने स्पष्ट किया कि पूर्ण स्वराज्य की सिद्धि के लिए सविनय कानून भंग की लड़ाई, रचनात्मक कार्यक्रम में करोड़ों देशवासियों के सहयोग के अभाव में, निरी बकवास बन जाती है, और वह निकम्मी ही नहीं, नुकसानदेह भी है। गांधीजी राजनैतिक सत्ता प्राप्ति/ स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात समाज परिवर्तन के मार्ग पर नहीं चलते हैं,
वार्तालाप में शामिल हों