महात्मा गाँधी के एकादश व्रत - Mahatma Gandhi's Ekadas Vrat
महात्मा गाँधी के एकादश व्रत - Mahatma Gandhi's Ekadas Vrat
सत्य
ब्रह्मचर्य
अहिंसा
अस्तेय
अपरिग्रह
शरीर श्रम
अस्वाद
सर्वधर्म समानत्व
अभय
स्वदेशी स्पर्श भावना
ये व्रत व्यक्तिगत गुण ही नहीं बल्कि सामाजिक गुण भी है। इनका जीवन में प्रयोग न केवल व्यक्तिगत रूपान्तरण का अपितु सामाजिक रूपान्तरण का भी माध्यम बन सकता है। स्वयं गाँधीजी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि इनमें से किसी भी एक व्रत का स्वीकार स्वमेव अन्य व्रतों को समाहित करता है। अहिंसा का उनका आग्रह उन्हें न केवल एक अहिंसक व्यक्तित्व बनाता है अपितु अहिंसा को सामाजिक क्षेत्र में लागू करने को भी प्रेरित करता है।
एक स्वावलम्ब व्यक्तित्व और स्वतंत्रता एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से आबद्ध हैं। एक अहिंसक व्यक्तित्व का अर्थ ही स्वतंत्र होना है। गाँधीजी के लिए तो स्वतंत्रता जन्म के समान आधारभूत है, मनुष्य को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित कर किसी प्रकार की समाज रचना नहीं की जा सकती, अतः स्वतंत्रता की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। परंतु यह स्वतंत्रता अमर्यादित है या उसकी कोई सीमा है?
गांधीजी ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं सामाजिकता को संयोजित करते हुए लिखा कि "मैं व्यक्तिगत स्वतंत्रता को मूल्यवान समझता हूँ, पर आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि मनुष्य बुनियादी तौर पर एक सामाजिक प्राणी है। अपने व्यक्तिवाद को सामाजिक प्रगति की अपेक्षाओं के साथ समायोजित करके ही वह इतनी उन्नति कर सका है। अप्रतिबंधित व्यक्तिवाद तो जंगल के पशु का नियम है। हमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक संयम के बीच एक मध्यमार्ग की खोज करनी होगी। समूचे समाज की भलाई के लिए स्वेच्छापूर्वक सामाजिक सयम को स्वीकार करने से व्यक्ति और समाज, जिसका वह सदस्य है, दोनों की संवृद्धि होती है।
इस उद्धरण के अनुसार एक अहिंसक समाज हेतु व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिकता के बीच मध्यम मार्ग की खोज की जानी है। वह मध्यम मार्ग व्यक्ति के अह के विसर्जन और सामाजिकता के स्वीकार से प्राप्त किया जा सकता है। इस मध्यम मार्ग की प्राप्ति यानि व्यक्तिगत अहं विसर्जन एवं सामाजिकता के स्वीकार में श्रम की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण हो जाती है।
सत्य की गांधीजी की अवधारणा व्यावहारिक जीवन के लिए उपयोगी है। ईश्वर सत्य है' से सत्य ईश्वर है तक की उनकी यात्रा अपने में कई दार्शनिक बहसों और व्यावहारिक आदर्शों को संजोए हुए है। उन्होंने सत्य को व्यावहारिक सत्य के रूप में अभिव्यक्ति प्रदान करते हुए दैनंदिन जीवन में उसके प्रयोगों के बारे में बताया। उससे प्राप्त आत्मचल और अहिंसा शक्ति का प्रतिपादन किया। सत्य के साथ उन्होंने अहिंसा के संबंध को स्पष्ट करते हुए बताया कि दोनों एक-दूसरे के पूरक है। सत्य की इसी अवधारणा के कारण के उन्होंने भारतीय जनता को सत्यपूर्ण होने का संदेश दिया और बताया कि जब हम सत्य पूर्ण होते हैं तो अभय स्वयमेव प्राप्त हो जाता है। सत्य की उनकी अवधारणा यह स्पष्ट करती है कि सत्य के कई रूप होते हैं अतः हम सभी का कर्तव्य है कि हम अपने से इतर अन्य सत्यों के अस्तित्व को भी स्वीकार करें और उनके साथ सहअस्तित्व के सिद्धांत के साथ जीवन व्यतीत करें। उनके लिए सा अपने आप में निरपेक्ष भी है और व्याख्या में सापेक्ष भी।
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