महात्मा गांधी का अहिंसक औचित्य : Mahatma Gandhi's non-violent justification:

महात्मा गांधी का अहिंसक औचित्य : Mahatma Gandhi's non-violent justification:

सिक संघर्ष का व्यक्ति थे जिन्होने के बल पर अंग्रेजी को भारत से देश को स्वतंत्रता दिलायी। इस कार्य में अहिंसा ही एक मात्र साधन थी। इस लिए अहिंसा की प्रासंगिकता निकाला एवं आज भी है।


I. राज्य की स्थापना :-


 द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया में नये राष्ट्र-राज्यों की स्थापना में क्रांतिकारी बढ़ोत्तरी हुई। आज भी दुनिया के विविध क्षेत्र, अम्मू-कश्मीर, फिलिस्तीन, बलुचिस्तान जैसे क्षेत्र है। वहाँ नये राज्य की स्थापना की मांग हो रही है और इसके लिए खूनी संघर्ष को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह अच्छा नहीं है। हिंसा के बुनियाद पर हिंसा का भवनही तैयार होगा अतः आवश्यकता है कि अहिंसा के आधार पर राज्यों के स्थापना की मांग की जाओ


II. राजनीति :- 

आज पूरे दुनिया में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली है। जिसके केन्द्र में राजनीति एवं राजनेता आते है। राजनेताओं को देश की आवाम प्रतिनिधि चुनकर भेजती है। ये राजनेता लोग देश आवाम की खुशहाली के लिए निर्णय लेते है। पर स्थिति यह है कि जनता के हित के बदले अपने ही शीत में ही ये फंस जाते है। इसके लिए हिंसा का भी सहारा लिया जाता है। अत: आज की राजनैतिक परिदृश्य में अहिंसा एक अहम भूमिका निभा सकती है।


III. व्यक्ति के निर्माण:- 

व्यक्ति समाज की एक ईकाई होता है। व्यक्ति का प्रभाव समाज पर एवं समाज का प्रभाव व्यक्ति पर पड़ता है। आज भागमभाग, व्यक्तिवादी एवं उपभोक्तावादी समाज में संघर्ष की दर बढ़ रही है। जिसके कारण हिंसा की मात्रा भी बढ़ रही है। अहिंसा का अनुपालन व्यक्ति में संयम एवं सहिष्णुता लाता है। इस लिए आवश्यक है कि व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण हेतु अहिंसा पर बल दिया जाया। हमारे शास्त्रों में भी उद्घोष किया गया है कि अहिंसा परमो धर्म:


 IV. सुरक्षा

आज पूरी दुनिया तृतीय विश्व युद्ध के मुहाने पर आकर खड़ी है। नये-नये बुद्ध से संबंधित अस्त-शस्त तैयार किये जा रहे है। इसमें हर दृष्टि से मानवता का ही अहिंसा है। दुनिया के मुल्काका अहिंसा का पालन करने का संकल्प लेना होगा तभी दुनिया की मानवता बच पायेगी। ऐसा नहीं हुआ तो पूरी दुनिया आज के दानवाकार विध्यसकारी बम से खत्म हो जायेगी।


V. पर्यावरण 

पृथ्वी पर जीव जंतु एवं मानव जीवन इस लिए संभव हो पाया क्योंकि यहाँ पर - अनुकुल वातावरण पाया गया। मानव अपने अन्धानुकरणीय प्रयासों से प्रकृति का भरपूर दोहन किया जिसके कारण प्रकृति का असंतुलन बिगड़ गया। यह एक तरह का मानव द्वारा प्रकृति के प्रति माह है। अतः प्रकृति के साथ अहिसात्मक रूप से व्यवहार करने की जरूरत नहीं धार्मिक सहिष्णुता आज के दुनिया में अनेक आधारक पर संघर्ष एवं हिंसा जारी है। उसमें धर्म भी एक ऐसा आधार है जिस पर अलग-अलग सम्प्रदाय के लोग आपस में लड़ते झगत है। यूरोप में कैथोलिक एवं प्रोटेस्टेट मुस्लिम देशों में शिया एवं सुन्नी तथा भारत में मुसलमान एवं हिन्दू आवास में लड़ते हैं। जबकी सभी धर्मों का मूल सिद्धांत प्रेम एवं अहिंसा ही है। इस लिए दुनिया में एक-दूसरे के धर्मके प्रति सहिष्णुता बदलने के लिए अहिंसा का अनुपालन जरूरी है। 


VI. विश्व मानवता का कल्याण:- 


पूरी मानवता पृथ्वी पर अपनी सतता को बढ़ा रही है तथा आगे बढ़ रही है तो उसमें प्रेम, सहयोग, सहिष्णुता एवं अहिंसा का भाव दिया है। जब-जब मानवा ने हिंसा का प्रयोग किया तब-तब अपना ही नुकसान किया है। धर्म प्रजाती, क्षेत्र, भाषा नस्ल एवं वर्ग से भी बढ़कर मानवता है। अत: इस मानवता को सुरक्षित तथा अविरल रखने के लिए आवश्यक है कि पूरे विश्व के लोग अहिंसा धर्म का पालन करे साथ ही अपने-अपने देश में अहिंसा को परम आदर्श एवं लक्ष्य के रूप में स्थापित करें।


VII. अहिंसक संघर्ष एवं समाज कार्य : 


अहिंसा मानव जीवन के कल्याण हेतु एक साधन है तो समाज कार्य एवं इसकी प्रणालियाँ अहिंसा के अनुकरण के बगैर पसू है। इसलिए आज समाज कार्यकर्ताओं को विविध प्रकार चुनौतियों का सामना करना पड़ता है जिसके कारण कभी-कभी समाज कार्यकर्ता अपना धैर्य एवं साहस तोड़ देते है। ऐसे में गांधी जी के इस अहिंसा के सिद्धांत का प्रयोग करके समाज कार्य कर्ता अपने जीवन का संतुलित बना सकते हैं। गांधी जी खुद कहते हैं कि जो लोग समजा के लिए कुछ करना चाहते है उन्हें सर्वप्रथम खुद के लिए करना होगा। और वह करना यह है कि उन्हें अहिंसा धर्म का पालन करे तभी उनके अंदर तेज बल पैदा होगा और वह तेज बल उन्हें जीवन के सभी क्षेत्रों में आनेवालों चुनौतियों से सामना करने में सहयोग प्रदान कर सकता है। समाज अनेक विचारों पंथो एवं नियमों से बनता है जहाँ संघर्ष एवं सहयोग साथ-साथ चलता है ऐसे में एक समाज • कार्यकर्ता को अहिंसा का पालन करना होगा तभी जाकर अपने लक्ष्य को सिद्ध कर सकता है।

अहिंसा मानव जीवन का सनातन धर्म है जिसे गांधी जी ने प्रयोग करके व्यावहारिक रूप दिया। यह कमजोर लोगों के जगह वीर व्यक्तियों के लिए साधन है। इसका प्रयोग आत्मशुद्धि के लिए किया जाता है। मन, वचन एवं कर्मके द्वारा हिंसा का निशेध ही अहिंसा है तथा यह विरोध का प्रमुख साधन भी है। आज की दुनिया जो उथल-पुथल एवं अन्याय के पथ पर बढ़ रही है. ऐसे में अहिंसा का आचित्य का पालन करेगा तभी सच्चे अर्थों में समाज के लिए अपने उत्तरदायित्वों का पालन कर सकता है।