महात्मा गांधी के सामाजिक आंदोलन - Mahatma Gandhi's Social Movements
महात्मा गांधी के सामाजिक आंदोलन - Mahatma Gandhi's Social Movements
भारत में, समाज कल्याण का बहुत समृद्ध व विस्तृत इतिहास है। समाज कल्याण के क्षेत्र में बहुत सी विचारधाराएँ व उसे करने के तरीके है। इनमें से समाज कार्य के गधाबादी उपागम का विशाल तंत्र है जिसमें गांधीवादी संस्थाएँ व कार्यकर्ता सम्मिलित है। भारतीय परिपेक्ष्य में एक व्यावसायिक सामाजिक कार्यकर्ता इसे अनदेखा नहीं कर सकता क्योंकि यह देशज पति को निरूपित करता है और वह पूर्णत: भारतीय दर्शन, संस्कृति व परमपराओं पर आधारित है। गाँधीवादी समाज कार्य की समझ एक व्यावसायिक सामाजिक कार्यकर्ता की भारतीय समाज के मानस व प्रकृति को समझने की अन्तर्दृष्टि प्रदान करता है जिसके परिणामस्वरूप अच्छी सेवाएँ प्राप्त की जा सकती हैं।
सामाजिक आन्दोलन एक प्रकार का सामूहिक क्रिया है। सामाजिक आन्दोलन व्यक्तियों और/या संगठनों के विशाल अनौपचारिक समूह होते हैं जिनका ध्येय किसी विशिष्ट सामाजिक मुद्दे पर केंद्रित होता है। दूसरे शब्दों में वे ये कोई सामाजिक परिवर्तन करना चाहते हैं, उसका विरोध करते हैं या किसी सामाजिक परिवर्तन को समाप्त कर पूर्वस्थिति में लाना चाहते हैं। राजनीतिक भागीदारी के संस्थागत दायरों के बाहर परिवर्तनकामी राजनीति करने वाले आंदोलनों को सामाजिक आंदोलनों की संज्ञा दी जाती है। लम्बे समय तक सामूहिक राजनीतिक कार्रवाई करने वाली ये
आंदोलनकारी संरचनाएँ नागर समाज और राजनीतिक तंत्र के बीच अनौपचारिक सूत्र का काम भी करती हैं।
हालाँकि ज्यादातर सामाजिक आंदोलन सरकारी नीति या आचरण के खिलाफ कार्यरत रहते हैं, लेकिन स्वतःस्पूर्व या अगठित प्रतिरोध या कार्रवाई को सामाजिक आंदोलन नहीं माना जाता। इसके लिए किसी स्पष्ट नेतृत्व और एक निर्णयकारी ढाँचे का होना जरूरी है। आंदोलन में भाग लेने वालों के लिए किसी साझा मकसद और विचारधारा का होना भी आवश्यक है। क्या ये खूबियाँ राजनीति के औपचारिक दायरों में काम करने वाले किसी राजनीतिक दल या दबाव समूह में नहीं होतीं? दरअसल, सामाजिक आंदोलन अपने बुनियादी चरित्र में अनौपचारिक नेटवकों की अन्योन्यक्रिया से बनते हैं। ऐसे मुद्दे चुनते हैं जिन्हें औपचारिक राजनीति अपनाने से इनकार कर देती है। साथ ही वे प्रतिरोध और गोलबंदी के गैर-परम्परागत रूपों का इस्तेमाल करते हैं। सामाजिक आंदोलनों ने अल्पसंख्यकों हाशियाग्रस्त समूहों और अधिकार-वंचित तबको की राजनीति को बढ़ावा दिया है। इसी कारण से यह भी माना जाता है कि समकालीन लोकतंत्र अपने विस्तार और गहराई के लिए सामाजिक आंदोलनों का ऋणी है।
सामाजिक आंदोलन की गाँधीय प्रविधि विधियाँ एवं तकनीकें
गांधी ने जिस सामाजिक आंदोलन की नींव रखी, आकी जड़े सत्याग्रह के रूप में प्रस्फुटित हुई।
"सत्याग्रह' शब्द 'सत्य' और 'आग्रह' शब्दों से बना है जिसका अर्थ है सत्य के लिए दृढता पूर्वक आग्रह करना सत्याग्रह का शाब्दिक अर्थ है सत्य-आचरण है। सत्य को आत्मबल के रूप में भी समझा जाता है। यह हिंसा की उपेक्षा करता है। दक्षिण अफ्रीका में प्रवासी भारतीयों के अहिंसात्मक प्रतिरोध व अन्य लोगों के निष्क्रिय-विरोध में फर्क दिखलाने के लिए सत्याग्रह शब्द गढ़ा गया था। सत्याग्रह प्रेम पर आधारित है. पूणा पर नहीं। सत्याग्रह का आधार अपने विपक्षी को प्रेम करने और स्वयं कष्ट उठाकर उसका हृदय परिवर्तन करने में है। सत्याग्रह पाप का प्रतिरोध है, पापी का नहीं। सत्याग्रह अनुशासन की मांग करता है, इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को आत्मबलिदान करना पड़ सकता है। ॐ सत्याग्रही के लिए नियम गांधी जी ने सत्याग्रही के लिए कुछ नियम निर्धारित किये थे जिसका पालन सभी सत्याग्रही को करना चाहिए
सत्यरूपी ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास करना करना
अहिंसा में विश्वास ब्रह्मचर्य का पालन
• आस्तेय का व्यावहारिक प्रयोग
अपरिग्रह
● मादक द्रव्यों से दूर रहना.
●खादी पहनना
● अस्पृश्यता का पालन करना
• आत्मानुसरण व अनुशासन का पालन करना,
सत्याग्रह के चारित्रिक लक्षण
1) सत्याग्रही में सत्याग्रह करने से पहले उसके उद्देश्यों की सफलता का ज्ञान एवं निष्ठा होना आवश्यक है। इसे आत्मबल कहते हैं।
2) सत्याग्रही को प्रेम, सद्भावना एवं उत्साहवर्धक वातावरण का निर्माण करना चाहिए, ना कि भय या आतंक का। सत्याग्रह सामने वाले के हृदय एवं मस्तिष्क के परिवर्तन हेतु प्रयास करता है। इसे प्रेमबल कहते हैं।
3) सत्याग्रही को निडर होना चाहिए ताकि प्रतिद्वंदी पर भी भरोसा कर सके प्रतिद्वंदी यदि उसे बार-बार धोखा देता है फिर भी सत्याग्रही को उस पर विश्वास करना चाहिए।
4) सत्याग्रही को हमेशा अपना पक्ष या विचार खुले रखना चाहिए ताकि उनका मूल्यांकन और
पुनर्मूल्यांकन हो सके उनकी त्रुटियों का निराकरण किया जा सके।
(5) सत्याग्रही के लिए कोई संघर्ष समय सीमा निश्चित नहीं है। सत्याग्रती को कष्ट या पीड़ा उठाने के
लिए अपने आप को समर्थ बनाना चाहिए सत्याग्रह में हार के लिए कोई स्थान नहीं है।
(6) एक बड़े उद्देश्य से किया गया सत्याग्रह इस बात पर निर्भर नहीं होता कि उसमें कितनी संख्या है किन्तु उसकी सफलता की गुणवत्ता पर निर्भर होता है एक सच्चा सत्याग्रही किसी भी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए पर्याप्त है।
7) सत्याग्रह की अचार संहिता में कठोर ताकतों के सामने समर्पण करने का प्रावधान नहीं है। पीड़ा के
कारण भी समर्पण नहीं होना चाहिए नही बंदूक के डर से समर्पण होना चाहिए।
(8) सत्याग्रह सत्य को प्राप्त करने की एक अनर्थक प्रयास एवं निश्चय है।
9) सत्याग्रही को हमेशा ही संघर्ष के लिए तैयार रहना चाहिए और किंतु शांति हेतु भी उतना ही आतुर रहना चाहिए शांति के हर अवसर का स्वागत करने को तत्पर रहना चाहिए। इसे न्यायवल कहते हैं।
सत्याग्रह की सफलता के लिए निम्नलिखित शर्ते आवश्यक है। अ सत्याग्रह में विरोधियों के प्रति अपने में किसी प्रकार की पुणा या दुर्भावना नहीं होना चाहिए। प्रेम से ही विजय का लक्ष्य प्राप्त करना है।
आ) निश्चित रूप से सत्य एक समाज के कल्याण हेतु होना चाहिए, बहुजन हिताय बहुजन सुख सत्याग्रही को अपने उद्देश्य की सफलता के लिए हर समय तैयार रहना चाहिए। गांधीजी ने सत्याग्रही के लिए निम्न आचार संहिता का पालन आवश्यक बताया है।
सत्याग्रही के लिए आचार संहिता
1) सत्याग्रही को ईश्वर में अटल विश्वास होना चाहिए।
2) उसका विश्वास सत्य एवं अहिंसा पर दृढ होना चाहिए। अपनी पीड़ा के माध्यम से मानवीय संवेदना एवं ईश्वर के प्रति सच्ची निष्ठा होना चाहिए। ताकि सत्य एवं प्रेम को जागृत कर उन्हें प्रसारित किया जाए)
3) उसका जीवन आडम्बर रहित होना चाहिए। साथ ही अपने उद्देश्य की सफलता के लिए सभी तरह का त्याग करने के लिए तत्पर रहना चाहिए।
4) उसके जीवन का आवश्यक उद्देश्य खादी पहनना एवं सूत कातना होना चाहिए।
5) सत्याग्रही की मादक द्रव्यों का उपयोग निषेध होना आवश्यक है ताकि वह अपने उद्देश्य के प्रति मानसिक रूप से संतुलित रहे।
(6) सत्याग्रह को समय-समय पर बनाए गए नियमों का पालन एवं अनुशासित होना परम आवश्यक गुण
सत्याग्रह की विधि
गाँधी एवं उनके अनुयायी द्वारा सत्याग्रह की निम्नलिखित पद्धतियाँ बताई गई है
• आग्रह या दबाव
वह सत्याग्रह की सबसे नरम या कोमल विधि है। जोकि गलत नीतियों पर चोट करती है। सत्याग्रही का उद्देश्य गलत काम करने वालों को नीचा दिखाना न होकर उसका हृदय परिवर्तन करना होता है। सत्याग्रही का उद्देश्य सामने वाले का हृदय परिवर्तन करना है।
इसमें स्वयं ऋष्ट उठाकर विरोधी को जीतना होता है। बलपूर्वक विरोध के द्वारा किसी को अपने अधीन ना एवं पीड़ा पहुंचाना इसका उद्देश्य नहीं है। सत्याग्रही बल रहित एवं शांतिपूर्वक तरीके से अपनी बात मनवाने पर अपना ध्यान केंद्रित करता है।
● उपवास
है जिसका गांधीनी है उपवास सत्याग्रह की एक महत्वपूर्ण विधि है जिसका गाँधीजी निरंतर प्रयोग करते थे। उन्होंने अपने जीवन काल में इसका 17 बार उपयोग किया। ब्रिटिश साम्राज्य की अन्यायी प्रवृत्ति के विरुद्ध तीन चार हरिजन एवं अछूतों के हित के लिए तीन बार, साम्प्रदायिक दंगों के दमन, अहिंसा एवं उपद्रवों के रोकथाम हेतु चार बार, आत्मशुद्धि एवं प्रायश्चित के लिए तीन बार एवं मिल कर्मचारियों की समस्याओं के लिए भी प्रयोग किया गांधीजी ने अनुसार सत्याग्रह में उपवास एक सबल एवं सार्थक हथियार है जिसे हर कोई नहीं कर सकता है। गांधीजी के अनुसार सत्याग्रही में स्वार्थ, क्रोध एवं अधैर्य नहीं होना चाहिए। उसे दुव, सहनशील, ठोस इच्छा शक्ति, एवं शांत स्वभाव का होना अत्यंत आवश्यक है, तभी वह अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। सत्याग्रही उपवास को अंतिम अस्त्र के रूप में मानता है। जब सारे उपाय विफल हो जाते हैं तब उपवास की आवश्यकता होती है। उपचास में नकल एवं दिखावे के लिए कोई स्थान नहीं है।
● बहिष्कार
सत्याग्रह की एक महत्वपूर्ण विधि बहिष्कार भी है लेकिन गांधीजी इसे बहुत अच्छा उपाय नहीं मानते थे। किसी व्यक्ति या समूह का सामूहिक रूप से संबंध तोड़ना ही बहिष्कार कहलाता है। बहिष्कार निरस्त करने की शर्त है जिसके नियम बहुत कष्टदायी है। गाँधीजी ने बहिष्कार का प्रयोग मुख्यत: तीन प्रमुख संस्थाओं के प्रति किया था। जो ब्रिटिश साम्राज्य को संगठित एवं शक्तिशाली बनाते थे। वे तीन संस्था, विधानसभा न्यायालय और सरकार द्वारा संचालित शिक्षण संस्थाएँ थी। इसके विकल्प के रूप में उन्होंने ग्राम पंचायत, स्वदेशी एवं बुनियादी तालीम का नारा दिया था। ग्राम पंचायत के माध्यम से गांधी जी आत्म निर्भर गांवों का प्रस्ताव रखते हैं जो अपना मूलभुत जरूरतों के लिए किसी पर आश्रित नहीं होगा एवं जो सामुहिकता की भावना से प्रेरित होगा। स्वदेशी के माध्यम से उन्होंने विदेशी वस्तुओं के निषेध एवं घर में ही बनी वस्तुओं का प्रयोग सुझाया ताकि गृह उद्योग को संरक्षण मिल सके। बुनियादी तालीम के माध्यम से उन्होंने नैतिक एवं हस्त-कौशल को बढ़ावा देने वाली शिक्षा पर जोर दिया।
● सविनय अवज्ञा
गाँधीजी सविनय अवज्ञा को संवैधानिक आंदोलन का अचूक अस्त्र मानते थे। उनके अनुसार, सविनय अवज्ञा आंदोलन एक स्वस्थ प्रभावकारी संवैधानिक आंदोलन है। अवज्ञा एक ऐसा हथियार है जिसके लिए व्यक्ति में साहस एवं उत्साह होना अनिवार्य है। यह कार्य जन अवशा, राजतंत्र या आपराधिक प्रवृत्ति के द्वारा संभव नहीं है। राज्य का चरित्र होता है कि वह अपराधों का दमन बलपूर्वक करते हैं। सत्याग्रही समाज के नियमों के तहत • विवेकपूर्ण एवं शुद्ध आत्मा एवं दृढ़ इच्छा से इसे प्रयोग कर सकता है। सार्वजनिक आंदोलन के लिए सबसे अहम सिद्धांत है कि उसमें किसी हिंसा के लिए स्थान नहीं होना चाहिए। वह निश्चित व्यक्तियों या सामान्य जनमानस द्वारा किया जाना चाहिए, साथ ही राज्य या प्रतिपक्षी संस्था द्वारा उन्हें उकसाया नहीं जाना चाहिए। अतः यह स्पष्ट है कि सिविल अवज्ञा अहसात्मक होना चाहिए।
● धरना
धरना हिन्दी और उई का शब्द है जिसे हम किसी के घर के सामने या आफिस के सामने बैठकर अपनी बात मनवाने का प्रयास करते हैं। गांधी जी के अनुसार यह एक क्रूर कार्य होता है। इससे अपनी बात मनवाने के लिए प्रतिद्वंदी पर अनावश्यक दबाब दिया जाता है। गांधी जी के अनुसार यह एक कायराना एवं तिरस्कृत कार्य है। इसे वह हिसक कार्य कहते हैं। ज्ञान शांति मैत्री
गाँधीजी के अनुसार सत्याग्रह की अन्य विधियों में हड़ताल भी एक कारगर अस्त्रया तरीका है। वह सामान्य या औद्योगिक ही क्यों न हो उसका भी आधार सत्य एवं अहिंसा पर होना चाहिए। उनके अनुसार हड़ताल की प्रकृति एवं लक्ष्य न्यायिक प्रक्रिया द्वारा ही होना चाहिए। अन्य प्रकरण जो सामान्य जनमानस या राजनैतिक दलों द्वारा लगाए जाते हैं। उनका भी स्पष्ट उद्देश्य होना चाहिए।
गाँधीजी के सामाजिक आंदोलन के प्रविधि की विशेषताएँ
गांधीजी द्वारा किये गये सामाजिक आंदोलनों का विश्लेषण करने के उपरांत, उनमें निम्नलिखित विशेषताएँ बताई जा सकती हैं।
> देशज समाज कार्य का प्रारूप
गाँधीजी भारत के पहले सामाजिक विचारक थे जिन्होंने भारतीय समाज को एक नये आदर्श रूप में प्रस्तुत किया उन्होंने प्रत्येक किया उन्होंने विषय पर अपने विचार दिये जैसे कि राज्य व प्रशासन की प्रकृति, सुरक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, गृह शिक्षा, रोजगार, कमजोर वर्गों का विकास तथा समाज में व्याप्त बुराईयों जैसे अस्पृश्यता, नशा मुक्ति, गरीबी आदि।
> सामाजिक दायित्वों का नया चिंतन
यद्यपि, गाँधीजी ने स्वयं कहा है कि उनके मूल्य व सिद्धान्त उतने ही पुराने हैं जितना कि प्रकृति फिर भी उनकी संहिताबद्ध प्रस्तुतीकरण एक नवीनता लिए हुए है। यह उनकी सामाजिक व राजनीतिक गतिविधियों का अनुपम आधार है। गाँधीबादी चिंतकों द्वारा तैयार की गई आचार संहिता भी अनुकरणीय है।
> व्यावहारिक चितन
गाँधीजी केवल एक सैद्धांतिक चिंतक ही नहीं थे, उन्होंने जो कहा उसे व्यवहार में भी लाये। ये सब उनके विचारों एवं कार्यों से स्पष्ट परिलक्षित होता है। गांधीजी का अठारह सूत्री रचनात्मक कार्यक्रम कथनी को करनी में बदलने का एक अच्छा उदाहरण है।
> सामाजिक दायित्वों को पूरा करने की विधियों का अविष्कार
गांधीजी ने बड़े स्तर पर सामाजिक व राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु सत्याग्रह का प्रयोग किया तथा इनकी उपयोगिता को नया आयाम अर्थ प्रदान किया। असहयोग की अवधारणा गाँधीजी ने पाश्चात्य विचारक हेनरी डेविड़ थोरो से लिया, लेकिन सत्याग्रह उनकी अपनी खोज थी। उनके द्वारा सत्याग्रह का प्रयोग समाज शास्त्र के विद्यार्थियों के लिये विशेष अध्ययन का विषय राति मैत्री
> सामाजिक सुधार से सामाजिक विकास की ओर
निःसंदेह गाँधी की सामाजिक क्रियाशीलता का प्रारंभ एक समाज सुधारक के रूप में हुआ। देश में वह समय समाज सुधार का ही था। लेकिन गांधीजी ने दूसरों की तरह अपने आपको वहाँ तक सीमित नहीं रखा बल्कि सामाजिक समस्याओं से पीड़ितों की भलाई के लिये अपने कार्य करते रहे। असल में गांधीजी समाज में कुछ छुटपुट कार्यों में विश्वास नहीं करते थे वो बुरे तरीके, विकृत व टूटे समाज का पुनः निर्माण व नये समाज की रचना करना उनका उद्देश्य था।
> कार्यकार्ताओं व संस्थाओं का राष्ट्रीय संगठन
गाँधीजी ने अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर, काँग्रेस पार्टी को विघटित कर लोक सेवक संघ बनाने की सलाह दी जो राजनीतिक गतिविधियों से पूर्णतः मुक्त हो तथा जिसमें पूर्णकालिक सामाजिक कार्य हो। यद्यपि, यह विचार मूर्तरूप न ले सका तथापि गाँधीजी ने बड़ी संख्या में राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक कार्यकर्ताओं का जी संगठन खड़ा किया वह अपने आप में अद्भुत एवं अनुकरणीय है। ये सभी संस्थाएँ वर्तमान में गाँधीजी विचारधारा के अनुरूप कार्यकर रही है।
> समाज कार्य में धर्मनिरपेक्षता के पक्षघर
गांधीजी आगमन के पूर्व भारत में अधिकतर सामाजिक कार्य धर्म के आधार पर गठित संगठनों द्वारा किये जा रहे थे। गाँधीजी ने सभी सामाजिक गतिविधियों को एक धर्मनिरपेक्ष व आध्यात्मिक आधार प्रदान किया। आज की धर्मनिरपेक्षता से भिन्न गाँधीजी ने धर्म को दरकिनार नहीं किया परन्तु सभी धर्मों से प्रोत्साहन देने बाले तत्वों का समावेश अपने दायित्व निर्वाह के दौरान किया।
महात्मा गांधी बीसवीं सदी के एक ऐसे राजनीतिक एवं सामाजिक व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते हैं जिन्होंने सिद्धांत को व्यवहार को एकीकृत करने के लिए अपना जीवन लगाया। समाज कार्य का उद्गम भले ही एक अनुशासन केरूप में पश्चिमी की देन हो लेकिन उसे एक व्यावहारिक एवं जनापेक्षी चरित्र, जिसे देशज समाज कार्य कहा जा सके गांधी की देन मानी जा सकती है।
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