महात्मा गांधी के विचार साम्प्रदायिकता पर - Mahatma Gandhi's thoughts on communalism
महात्मा गांधी के विचार साम्प्रदायिकता पर - Mahatma Gandhi's Thoughts on Communalism
मानवीय दुनिया विविधता से भरी है। यह विविधता भौतिक, जैविक एवं सामाजिक तानों स्तर पर पायी जाती है। भाषा, खान-पान, वेश-भूषा, जीवन मूल्य के साथ-साथ धर्म एवं दर्शन में यह विविधता पायौ जाती है। सामाजिक विविधता को सामाजिक सम्पन्नता का आधार माना जाता है। स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था कि दुनिया में अनेक रंग होगे तभी दुनिया अच्छी लगेगी यादि दुनिया में सिर्फ एक रंग हो तो दुनिया अच्छी नहीं लगेगी जैसे तस्वीर में अनेक रंग होने के कारण हो तस्वीर अच्छी लगती है यदि तस्वीर में एक रंग हो तो तस्वीर अच्छी नहीं लगती। विवेकानंद की यह उक्ति धार्मिक विविधता के समर्थन में मैं कही गई थी। धार्मिक विविधता को विषमता का दर्जा अपने-अपने दृष्टि से तब अलग-अलग लोग देते हैं तो वह साम्प्रदायिकता का हिस्सा बन जाता है। हिन्दू अपने धर्म को श्रेष्ठ बनाने के लिए, मुस्लिम अपने इस्लाम धर्म को श्रेष्ठ बनाने के लिए तथा ईसाई अपने धर्म को श्रेष्ठ बनानेके लिए दूसरे की तौहीनी एवं अपेक्षा करते हैं तो साम्प्रदायिकता की स्थिति पैदा होती है।
साम्प्रदायिकता का सामान्य अर्थ धार्मिक रूप से एक सम्प्रदाय का दूसरे सम्प्रदाय से खुद को पृथक समझने के साथ-साथ खुद के हितों को भी विरोधी मानते हुए दूसरे सम्प्रदाय के हितों को नुकसान पहुंचाने की भावना रखना होता इस तरह से साम्प्रदायिकता एक ऐसी विचारधारा है। जो समाज में पृथकता की भावना को बढ़ावा देती है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री प. नेहरू ने साम्प्रदायिकता के सम्बन्ध में कहा था कि यह बात कभी नहीं भूलना चाहिए कि भारत में साम्प्रदायिकता एक परवर्ती घटना है, जिसका जन्म हमारी आँखों के सामने ही हुआ है। कहा जा सकता है कि भारत में साम्प्रदायिकता ब्रिटीश काल में पैदा हुई जो पारस्पादिक हितों के भिन्नता से पैदा की गई और जिसका अंजाम विभाजन के समय हिंसात्मक संघर्ष के रूप में हुआ।
साम्प्रदायिक विकास की अवस्था साम्प्रदायिकता कि प्रथम अवस्था में एक खास समाज अथवा समुदाय को संस्कृति एवं परम्परा के आधार पर एकता की भावना महसूस होती है। साम्प्रदायिकता की द्वितीय अवस्था में समुदाय को अपनी संस्कृति एवं परम्परा दूसरे समुदाय के संस्कृति, परम्परा एवं इतिहास से भिन्न होने का पता चलता है। साम्प्रदायिकता के तृतीय सोपानमें एक समुदाय को दूसरे समुदाय से अपना हित परस्पर विरोधी पता चलता है। साम्प्रदायिकता के अंतिम एवं चतुर्थ सोपान में दोनों समुदाय आमने-सामने आकर साम्प्रदायिक हिंसा में रत हो जाते है। भारत में साम्प्रदायिकता को दूसरे सोपान से चौथा सोपान तक पहुंचाने में ब्रिटिश हुकुमत के साथ-साथ कुछ भारतीय सत्ता लोलुप थे।
साम्प्रदायिकता के मूल तत्व
1. साम्प्रदायिकता के मूल में धर्म को सर्वापार कारक माना जाता है।
2. साम्प्रदायिकता सामाजिक विविधता को अस्थाकृति एवं विषमता को स्वीकृति देने पर पैदा होती है।
3. साम्प्रदायिकता का राजनीतिकरण रिसा को बढ़ावा देता है तथा सामाजिक विषमता को और मजबूत करना है।
4. साम्प्रदायिकता का मूल आधार धार्मिक मूल्य नहीं अपितु धार्मिक प्रतीक बनते हैं।
भारत में साम्प्रदायिकता का इतिहास :
भारत में मुगलों के आने के बाद भारत में इस्लाम धर्म का विस्तार हुआ। हिन्दु धर्म के साथ-साथ इस्लाम धर्म भी भारत में बढ़ा। अधिकांश रूप में इस्लाम धर्म का प्रचार धर्मातरण के नाम पर कराया गया। भारत में अंग्रेज आये उन्होंने अपना साम्राज्य एवं उपनिवेश स्थापित करने के लिए भारतीय सामाजिक संरचना को भी समझने का प्रयास किया। 1857 से 1885 के बीच भारत में राष्ट्रवादी भावना पैदा हो गई थी। 1857 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम तथा 1885 में कांग्रेस की स्थापना की गई। अंग्रेजों को समझ में आ गया कि भारत में शासन करना है तो फूट डालोऔर राज्य करो की नीति को आगे बढ़ाना होगा। सबसे पहले भारत के क्षेत्रीय राज्याओं को आपस में लड़ाया और उन्हें कमजोर करके अपना शासन कायम किया। अब भारत की राष्ट्रीय एकता की भावना को कमजोर करके देश पर शासन करनेकी बात थी।
उन लोगों ने मुस्लिम एवं हिन्दु समुदाय को अपना लक्ष्य बनाया और अधिप्रचार करना प्रारंभ किया कि मुस्लिम समुदाय अल्पसंख्यक है और उनका हित हिन्दु हितों से विपरीत है। इसको व्यावहारिक रूप प्रदान करने हेतु 1905 में बंगाल का हिन्दु-मुस्लिम आधार पर विभाजन किया गया। 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना की गई।
1909 में मार्ले-मिन्टो सुधार के नाम पर पृथक मतदाता मण्डल' बनाया गया। फिर धीरे-धीर भारत में मुस्लिम समुदाय राष्ट्रीय आंदोलन के धारा के विमुख होकर स्वयं के हितों को घोषित एवं संरक्षित करने में लग गई। मुस्लीम लीगने राष्ट्रीय कांग्रेस के विरोध में निरंतर आग उगलना प्रारंभ किया। मुस्लीम लीग राष्ट्रीय कांग्रेस को हिन्दुवादी संगठन बताती थी जो हिन्दु हितों को पोषित करती है। इसके बाद राष्ट्रीय कांग्रेस से मुस्लिम नेता धीरे-धीर मुस्लीम लीग में चले गये। अतः जब स्वतंत्रता की घड़ी आई तो राष्ट्रीय कांग्रेस एवं मुस्लीम लीग के नेतृत्व में साम्प्रदायिकता के आधार पर पाकिस्तान एवं भारत राज्य का गठन किया गया। भारत आज 70 वर्ष की आजादी की यात्रा पूराकर चुका है पर आज भी साम्प्रदायिकता के नाम पर देश का कोई न कोई कोना जब उठता है।
साम्प्रदायिकता बनाम साम्प्रदायिक सदभाव
साम्प्रदायिकता पारस्परिक हितों के भिन्नता से पैदा होती है तो इसका अवनयन साम्प्रदायिक सद्भावना के बढ़ोत्तरी से ही होता है। साम्प्रदायिक सदभाव से तात्पर्य धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक स्तर पर परस्पर विपरीत हितों के बावजूद भी एक-दूसरे के विचारों विश्वास एवं आस्था के प्रति सम्मान का भाव रखना ही साम्प्रदायिक सदभाव कहलाता है। यह साम्प्रदायिक सदभावना आत्मीयता के उत्स से ही निकला सकती है। विविधता संसार में स्वीकार्य है। इसकी बड़ी महत्ता है। विविधता को धार्मिक सामाजिक, सांस्कृतिक स्तर पर भी स्वीकार्य करना होगा। जब धार्मिक एवं सांस्कृतिक सामुदायिक विविधता को सम्मान के दृष्टि से परस्पर सम्प्रदाय देखेंगे तो यहाँ साम्प्रदायिक सदभाव कहलाता है। यहाँ साम्प्रदायिक सदभाव भारतीय समाज को मजबूत एवं समन्वयकारी बना सकता है।
गांधी जी एवं सांप्रदायिक सदभाव
महात्मा गांधी साम्प्रदायिक सदभाव के अग्रदूत माने जाते थे। उन्होंने साम्प्रदायिक सदभावनाके हितार्थ अपना प्राण भी यौछावर कर दिया। गांधीजी अपने हिन्द स्वराज नामक पुस्तक में हिन्दू एवं मुस्लिम दोनों समुदायों के हितों को समान रखा ही है साथ-साथ यह भी इस पुस्तक में बताया कि किस प्रकार हिन्दु मुस्लिम परस्पर विरोधी हितों के बावजूद भी आपस में समन्वय बनाकर रह सकते हैं वे हिन्दु एवं मुस्लिम समुदाय को अपनी दो आँखें कहते थे। उनका मानना था कि कंकड़ पड़े को फोड़ने में तब सफल होता है जब बड़ा कमजोर होता है। इसलिए भारत के सभी सम्प्रदाय के लोगों को आपस में एक साथ संगठित होने की आवश्यकता है ताकि कोई भारत को मात न दे सका
हिन्द स्वराज में साम्प्रदायिक सदभाव :-
महात्मा गांधी ने 1909 में अपनी पुस्तक हिंद स्वराज' लिखा थी। इस पुस्तक में उन्होंने अध्याय 9 एवं 10 में पाठक से कहलवाया है कि भारत में मुसलमान एवं हिन्दू में कहर बैर एवं विषमता है। मियां और महादेव की नहीं बनती है। मुसलमान हिन्दु को मूर्ति पृथक मानता है। हिन्दु मूर्ति को पूजता है तो मुसलमान मूर्ति को तोड़ता है। हिन्दु गाय को पूजता है तो मुसलमान गाय की हत्या करता । इस प्रकार पग-पग पर हिन्दु एवं मुस्लिमों में विरोध है। इसे कैसे खत्म किया जा सकता है? गांधी जी इस परस्पर विरोधको उसी रूप में अपनी पुस्तक हिन्द स्वराज में पाठक के मुख्य से कहलवाया कि जैसा उस समय अंग्रेजों ने अधिप्रचार कर के इसी मत का विस्तार रहे थे। पर गांधी जी ने आगे साम्प्रदायिक सद्भाव के दृष्टि से हिन्द स्वराज में ही हिन्दु-मुस्लिम एकता को स्पष्ट किया है और बताया कि सहिष्णुता के साथ दोनों समुदाय एक साथ रह सकते हैं।
राष्ट्रीय आंदोलन में साम्प्रदायिक सदभाव:-
महात्मा गांधी ने अपने पुस्तक हिन्द स्वराज में बड़ी अच्छी आत कही थी कि दुनिया के किसी भी हिस्से में एक राष्ट्र का अर्थ एक धर्म नहीं किया गया। अगर हिन्दु यह माने की हिन्दुस्तान में केवल हिन्दु रहेंगे और मुसलमान सोचे कि केवल मुस्लिम रहेंगे तो यह एकदम सपना है। भारत में हिन्दु, पारसी, सिख, ईसाई, मुसलमान सभी रहते हैं तथा सभी लोग भारत को अपनी मातृभूमि मान चुके है इसलिए आवश्यकता है कि ये सभी लोग आपस में मिल-जुल कर रहे गांधीजी ने तो में साम्प्रदायिक सदभाव के सदर्भ में कहा कि में यह नहीं कहता कि हिन्दू और मुसलमान कभी झगड़ेगें ही नही। दो भाई भी अगर साथ होते हैं तो उनमें तकरार होती है। 1917 में गांधी जी भारतीय राजनीति में प्रवेश किये। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार भारतवासियों से दो बादा पूरा करने की बात कही थी। प्रथम यह कि युद्धके उपरांत स्वरूप भारत को अधिकतम स्वायत्ता दी जायेगी। द्वितीय यह कि तुकों के खलीफा का पढ़ बरकरार रखा जायेगा जो दुनिया के मुसलमानों के लिए पूजनीय पद था।
युद्ध में भारतीय जनमानसके अपना समर्थन दिया। युद्धके समाप्ति के पश्चात ब्रिटिश शासन अपने किये गये बादे से मुकर गया। अधिकतम स्वायत्ता के जगह रोलेर एक्ट जैसा दमनकारी कानून लाया गया वहीं तुर्की के खलीफा को अपदस्त करके वहाँ लोकतंत्र की बहाली करने की बात की गई। भारत में इसके खिलाफ गांधीजी ने मुस्लिमों द्वारा चलाये जाने वाले खिलाफत आंदोलन एवं असहयोग आंदोलन का एक साथ नेतृत्व किया। इसी समय बाल गंगाधर टिलक की मौत हो गई उनके अर्थों का खिलाफत आंदोलन के प्रमुख मुस्लिम नेता मौलाना शौक अली के कथा दिया था। इस तरह से हिन्दू-मुस्लिम एकता एवं सदभाव का यह रूप भारत में स्वतंत्रता आंदोलन के समय देखने को मिला जब देश का विभाजन हुआ एवं स्वतंत्रता प्राप्ति हुई उस समय भारत के पूर नेता दिल्ली के इस प्रयास को देखकर माउंटबेटन ने कहा कि जिस कार्य को पचास हजार सेना नहीं कर सकती थी उस कार्य को यह पचहत्तर साल का एक बूढ़ा व्यक्ति ने कर दिखाया इस तरह गांधीजी स्वतंत्रता संग्राम के समय हमेशा साम्प्रदायिक सदभाव के लिए प्रयास करते रहे।
साम्प्रदायिक सदभाव के मार्ग में आनेवाली ऐतिहासिक एवं वर्तमान चुनौतियाँ
भारत अनेक पंथा, संस्कृतियों, दर्शन का मिला जुला देश है। जो भी जातियाँ आई भारती संस्कृति में लय हो गई। मुस्लिम समुदाय भारतीय संस्कृति में पूर्णतः लग नहीं हो पाया इसके पीछे मुस्लिम एवं हिंदु दोनों समुदाय जिम्मेदार थे। ब्रिटिश जब आये तो उन्होंने हिन्दु एवं मुस्लिमों के बीच के खाई को अपने हित के लिए और चौड़ा साम्प्रदायिक भावना भड़काकर किया। इस प्रकार अनेक कारक जिम्मेदार है। जिनके कारण भारत में साम्प्रदायिक सदभाव खराब हुए है।
• महाराष्ट्र में गणेश पूजन एवं बनारस में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की जब स्थापना हुई तो कट्टर पंथी मुसलमानों एवं अंग्रेजों द्वारा हिन्दुत्व को बढ़ावा के नाम पर अधिप्रचार किया गया जो राष्ट्रीय आंदोलन के समय हिन्दु-मुस्लिम के बीच खाई पैदा किया।
● गांधी के रामराज्य' को आदर्श समाज की संकल्पना के जगह हिन्दुत्व के बढ़ावा से जोड़कर देखा गया जिसके कारण गांधी जी को मुस्लिम समुदाय बिरोधी माना गया।
• अंग्रेजों ने हिन्दू-मुस्लिम की कमजोरियों को जान लिया इसके बाद अपने फायदे के लिए दोनों
समुदायों में फूट डालने का भरपूर प्रयास किया जिसके कारण मुस्लिम हिन्दू समुदाय एक-दूसरे से अलग हो गये और प्रतिफल स्वरूप भारत का विभाजन भारत, पाकिस्तान एवं वाग्लादेश जैसे तीन मुल्कों के रूप में हुआ।
● आज भी राजनीतिक शक्तियाँ राष्ट्रके अंदर की और बाहर की रूप ने फायदे के लिए भारत में निरंतर साम्प्रदायिक दुर्भावना फैलाने की कोशिश करती है।
सांप्रदायिक सदभाव में समाजकार्य की भूमिका
साम्प्रदायिक भावना मानवता के लिए अहितकारी है वही साम्प्रदायिक सदभाव मानवता के लिए हितकारी है। गांधीजी साम्प्रदायिक सदभाव को भारतीय समाज के लिए आवश्यक मानते थे। समाज कार्य के अंतर्गत व्यक्ति, समूह एवं समुदाय की समस्या का निदान एवं उपचार किया जाता है। धर्म व्यक्ति के जीवनमें अहम भूमिका निभाता है। व्यक्ति का दृष्टिकोण धर्म के प्रति व्यापक एवं सहिष्णुण होता है तो वह समाज में शांति स्थापित करने में सहयोग प्रदान करता है। समाज कार्यकर्ता को धर्म के मूल सिद्धांत का ज्ञान रखना चाहिए। उसको इस बात का ज्ञान रखना कि धर्म का मूल कोड सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, दया, परोपकार एवं वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना होती है। सभी धर्म इन्हीं मूल्यों को अपने में समाहित किये हुए होते है।
इसलिए व्यावसायिक समाज कार्यकर्ता को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि वह धर्म के किसी सम्प्रदाय जाति, वर्ग से जोड़कर न देखें बल्कि समाज के हितों को देखते हुए सम्पूर्ण कार्य को व्यावसायिक समाज कार्यकर्ता को अपने धार्मिक मूल्यों एवं रीति-रिवाजों को कभी भी किसी दूसरे सम्प्रदाय के व्यक्ति, समूह अथवा समुदाय पर नहीं थोपना चाहिए। समाजकार्यकर्ता को दूसरे समुदायक धार्मिक मूल्यों का भरपूर सम्मान करना चाहिए। धर्म के नाम पर होने वाले साम्प्रदायिक हिंसा के समय समाज कार्यकर्ता को मानवता को सबसे बड़ा धर्म मानकर हिंसा ग्रस्त लोगों की सेवा करनी चाहिए वही धर्म के नाम पर जहाँ भी मानवाधिकारों का हनन हो रहा है उसके सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक विरोध भी करना होगा।
सारांश रूप में कहा जा सकता है कि साम्प्रदायिकता के संकीर्ण मानसिकता के खिड़की से जन्म सम्प्रदायिकता मात्र के संकीर्ण मौरसिकता के लेनेवाला विचार एवं व्यवहार है। भारत में साम्प्रदायिकता की जड़े ब्रिटिश साम्राज्य के समय अंकुरित हुई जो अंग्रेजों ने अपने शासन एवं फायदे के लिए किया। यह भी सही है कि भारत में साम्प्रदायिकता की उर्वर भूमि तैयार थी जहाँ अंग्रेजों ने अपने फायदे के लिए साम्प्रदायिकता की फसल लगाई। मुसलमान भारत में आये और भारत में मुस्लिम धर्म को जो लोगों ने अपनाया उनको कभी हिन्दुओने नहीं अपनाया और इस्लाम को सदैव अबुझ ही समझा। इस स्थिति को अंग्रेजों ने देखा तथा 1905 में बंगाल विभाजन, 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना तथा 1947 में विभाजन के द्वारा भारतीय उपमहाद्वीप पर साम्प्रदायिकता की गहरी जड़ों वाली फसल बो दिया। जिसके कारण आज भारतीय हिन्दू पाकिस्तान को आतंकवादी मुल्क समझते है औरअपनी खुन्नस भारतीय मुसलमानों पर निकालते है। ऐसे में महात्मा गांधी की कौमी एकता सम्बन्धी विचार ही साम्प्रदायिक सदभाव को आगे बढ़ा सकते है तथा भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र कायम कर सकता है। समाज कार्यकर्ता को इस विचार को समझना एवं पूरे दिल से धारण करके मानवतावादी दृष्टि रखते हुए सर्वधर्म समभाव को कायम करने की आवश्यकता है।
विचार प्रस्तुत करते अपने श्रम-पूँजी संबंध के बारे में विचार करते हुए गांधीजी दोनों के बीच सहयोग एवं पारस्परिकता की बात कहते हैं। एक आदर्श स्थिति के रूप में श्रम पूँजी को एक-दूसरे का पर्याय बनाते हैं परंतु वास्तविक स्थिति में ऐसा नहीं होने पर उस आदर्श की ओर जाने हेतु उपाय भी प्रस्तावित करते हैं। ठीक उसी प्रकार स्वामित्व की समस्या पर विचार करते हुए ट्रस्टीशिप का सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं। यह सिद्धांत उनके जीवन दर्शन से प्रसूत हैं जिसमें पूर्वी एवं पश्चिमी सांस्कृतिक विरासत है जो आध्यात्मिक एवं धार्मिक तथा अपनी प्रकृति में नैतिक एवं सामाजिक है। अपने गहन एवं विस्तृत अध्ययन से गाँधीजी ने स्वामित्व की समस्या का हल भगवत गीता और उपनिषद के जरिए प्राप्त किया।
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