महात्मा गांधी का विचार स्वदेशी पर - Mahatma Gandhi's thoughts on Swadeshi
महात्मा गांधी का विचार स्वदेशी पर - Mahatma Gandhi's thoughts on Swadeshi
गांधीजी मानव जीवन के सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक जीवन को अलग-अलग नियमों से परिभाषित एवं संचालित नहीं करते है जैसा कि तात्कालीन समय में तथा आज भी किया जाता है। उनके लिए जीवन एक अखंड इकाई है और जीवन के समस्त क्रिया-कलापों का आधार प्रेम का नियम है जिसकी अभिव्यक्ति तत्प्रसूत अहिंसा के जरिए होती है। अत: गाँधीजी जब अपने आर्थिक विचारों को अभिव्यक्त करते हैं तब अहिंसा दृष्टि का विस्तार आर्थिक क्षेत्र में कर रहे होते हैं।
प्रो. रोमेश दीवान और सुशीला गिडवानी (1979) ने गांधीवादी अर्थशास्त्र के छह मूल तत्व बतलाए
स्वदेशी
शरीर-श्रम
2. समानता
3. अपरिग्रह
4. ट्रस्टीशिप
5. शोषणविहीनता
प्रो. गोपीनाथ धवन (1946) ने गाँधीजी के आर्थिक दर्शन के निम्नलिखित चार आधार बताएं हैं
1. अस्तेय
2. अपरिग्रह
3. शरीर-श्रम (ब्रेड लेबर)
4. स्वेदशी
गाँधीजी ने आधुनिक पूँजीवादी व्यवस्था में तालच, शोषण, सत्ता और हिंसा में सीधा संबंध देखा जो मानवीब समाज में अलगाव को बढ़ावा दे रहे थे। वह पाश्चात्य औद्योगिक, भौतिकवादी सभ्यता के कटु आलोचक थे। वह मशीनीकरण (Mechanization), व्यक्तित्वलोप (Depersotiafization) तथा नौकरशाही (Bureaucracy) के विरोध में थे जो कि आधुनिक वृहद आर्थिक संरचना के आयाम थे। उन्होंने औद्योगीकरण, प्रौद्योगिकी, केंद्रीकरण पर्यावरण, सामाजिक रिश्तों, मानव के नैतिक व सांस्कृतिक कल्याण के प्रश्नों पर अपना ध्यान केंद्रित किया। गांधीजी के आर्थिक विचारों में समानता का आधार समस्त श्रम के समान महत्व में है।
स्वदेशी का अर्थ एवं आयाम
किसी भी अर्थव्यवस्था में उसकी आर्थिक क्रियाओं का उद्देश्य उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं की पूर्ति करना होता है वही अर्थव्यवस्था उचित कही जा सकती है जो उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं को सही तरीके से पूरी करती हो। वह तरीका अहिंसक होना चाहिए। आधुनिक अर्थशास्त्र इससे विपरीत स्थिति मानता है। उसके लिए उपभोक्ता एक मनुष्य नहीं बल्कि वस्तु हो जाता है। उसकी महत्ता तभी तक होती है जब तक वह उपभोग करता रहता है। अर्थव्यवस्था का मकसद यह जानना कभी नहीं होता कि उस उपभोग का उस उपभोक्ता समाज और प्रकृति पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? आधुनिक अर्थव्यवस्था का विकास आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ कृत्रिम अरूरतो/आवश्यकताओं को पैदा करना भी है। अत: इस अर्थव्यवस्था में नई कृत्रिम माँगों को भी पैदा किया जाता है और उपभोक्ता को उपभोग हेतु मजबूर किया जाता है। हरबर्ट मारक्यूज ने हमारा ध्यान इस ओर आकर्षित किया है। यह अर्थव्यवस्था मनुष्य को मात्र उपभोक्ता मानने और लगातार उपभोग बढ़ाने के कारण सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में हिंसा को तो जन्म दे ही रही है बल्कि लगातार उपभोग बढ़ने के कारण प्राकृतिक संसाधनों और समस्त पारिस्थितिकी के प्रति भी हिंसक है। अतएव इस अर्थव्यवस्था में उपयोग भी हिंसक हो जाता है और इस हिंसक प्रक्रिया को समर्थन देने लगता है।
गांधीजी इससे आगे बढ़कर सम्पूर्ण उत्पादन प्रणाली के ढाँचे को ही अहिंसक आधार देने की प्रस्तावना करते हैं। वह व्यक्तिगत प्रयास (अपरिग्रह) एवं संस्थागत परिवर्तन की ऐसी अहिंसक प्रक्रिया को जन्म देते हैं जिससे एक नैतिक एवं अहिंसक अर्थव्यवस्था का मार्ग प्रशस्त हो सके।
इसी प्रस्थान बिंदु से गांधीजी उत्पादन पद्धति पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। इस संबंध में गांधीजी को मशीन विरोधी अप्रगतिशील आदि कहा जाता है। गाँधीजी कभी मशीन के विरोधी नहीं रहे उनका आशय मशीन के मूल में निहित लोभ एवं अनियंत्रित लाभ कमाने की आकांक्षा को समाप्त करने से था। उद्योग मंत्रियों के सम्मेलन में भाग लेते हुए उन्होंने मशीन की तीन विशेषताएँ बतायी
. मैं इस शब्द का व्यापक अर्थ में प्रयोग नहीं कर रहा हूं, बल्कि एक उपकरण के रूप में कर रहा हूँ जो मानव अथवा पशु के अम का पूरक होने या उसकी कार्यकुशलता को बढ़ाने के बजाए उसको विस्थापित करने का कार्य करता है। मशीन का यह पहला भेदमूलक लक्षण है।
इसका दूसरा लक्षण है कि इसकी वृद्धि या विकास की कोई सीमा नहीं है। यह बात मानव श्रम के बारे में नहीं कही जा सकती। उसके ऊपर अपनी ही इच्छा अथवा प्रतिभा सवार मालूम होती है। वह मानव श्रम की विरोधी है।
लाखों करोड़ों लोगों का दमन और शोषण करने के लिए मशीन एक ऐसा दैत्य है जिसका कोई जवाब नहीं है। यदि समाज में सभी लोगों को बराबरी का दर्जा दिया जाना है तो मानव अर्थव्यवस्था में मशीन का कोई स्थान नहीं हो सकता" (हरिजन, 25/08/1946, पृ. 281)
मशीनों के संबंध में उनकी दृष्टि बिल्कुल स्पष्ट थी कि मशीन का प्रयोग मनुष्य को विस्थापित करता है, अत: उसका विरोध होना चाहिए। वह मानव को सर्वोपरि मानते हैं और मशीन को उससे नीचे स्थान प्रदान करते हैं। वह चाहते हैं कि मशीन के जरिए मनुष्य को मशीन में परिवर्तित कर दिया है, वह मनुष्य को पुनः अपने मूल स्थान पर प्रतिष्ठित करना चाहते हैं।
अपनी स्थिति को और अधिक स्पष्ट करते हुए यह कहते हैं कि "मेरा विरोध यंत्रों के लिए नहीं है, बल्कि मंत्रों के पीछे जो पागलपन चल रहा है उसके लिए है। समय और की बचत तो मैं भी चाहता हूँ तु वह किसी खास वर्ग की नहीं, सारी मानव जाति की होनी चाहिए। मंत्रों के पीछे जो प्रेरक कारण है वह श्रम की बचत नहीं है, बल्कि धन का लोभ है। आज की इस चालू अर्थव्यवस्था के खिलाफ मैं अपनी तमाम ताकत लगाकर युद्ध चला रहा हूँ... मेरा उद्देश्य तमाम यंत्रों का नाश करने का नहीं बल्कि उनकी हद बाँधने का है।" (हिंद स्वराज:14)
गांधीजी इसीलिए यह स्पष्ट करना चाह रहे थे कि इस प्रौद्योगिकी के बारे में लगातार सतर्क रहना जरूरी है और यह आवश्यक हो जाता है कि इसे नियंत्रण में रखा जाए और मनुष्य को केंद्र में रखा जाए। जब वह पत्रों के पीछे पागलपन के आधार पर तथा पत्रों के मूल में लोभ की प्रेरणा को आधार बनाकर प्रौद्योगिकी का विरोध कर रहे होते हैं और मानवीय श्रम को उसका उचित स्थान प्रदान करने की बात कह रहे होते हैं तब इसी प्रौद्योगिकीय निर्धारणवाद को नकार रहे होते हैं। न केवल प्रौद्योगिकीय निर्धारणवाद को बल्कि मनुष्य को उपभोक्ता मात्र बना देने, हिंसक उत्पादन व्यवस्था और केंद्रीकरण को भी अस्वीकार कर रहे होते हैं।
यही दृष्टि उन्हें इस बात की ओर ले जाती है कि क्या वास्तव में ऐसी कोई प्रौद्योगिकी संभव हो सकती है जो अहिंसक समाज की ओर ले जा सके? प्रो. नंदकिशोर आचार्य (1995) के अनुसार इस संदर्भ में गांधीजी मार्क्स से अधिक नैतिक एवं वैज्ञानिक हो जाते हैं। मार्क्स अपनी मानवीय संवेदनाओं के बावजूद भी एक हिंसक एवं केंद्रीकृत उत्पादन प्रणाली (कहना चाहिए पूंजीवादा बेस) पर साम्यवादी समाज (सुपरस्ट्रक्चर) खड़ा करना चाहते थे जबकि गाँधीजी ने अपने साध्य-साधन एकत्व के आधार पर एक अहिंसक एवं न्यायपूर्ण तकनीक के बेस के आधार पर एक अहिंसक एवं न्यायपूर्ण समाज को खड़ा करने का प्रस्ताव किया। अतएव गाँधीजी ऐसी तकनीक को चुनते हैं जो स्वतंत्रता, मानवीय गरिमा, पर्यावरण एवं समाज को पुष्ट करने वाली इस प्रौद्योगिकी के विचार में गांधीजी वृहद उत्पादन की अवधारणा को प्रश्नांकित करते हैं:
"मैं पक्के तौर पर अपनी राय जाहिर करना चाहूंगा कि विशाल पैमाने के उत्पादन का उत्माद विश्व-सकट के लिए उत्तरदायी है। एक क्षण के लिए अगर मान भी ल कि मशीन मानव जाति की सभी आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है तो भी इनका कार्य उत्पादन के विशिष्ट क्षेत्रों पर ही केंद्रित होगा और आपको वितरण का नियमन करने के लिए एक जटिल व्यवस्था अलग से करनी होगी। इसके विपरीत, जिस क्षेत्र में जिस वस्तु की आवश्यकता है, अगर वहीं उसका उत्पादन एवं वितरण दोनों किए जाएं तो इनका नियमन स्वयमेव हो जाता है और उसमें धोखाधड़ी की गुंजाइश कम रहती है तथा सट्टेबाजी की तो बिल्कुल ही नहीं।" (हरिजन, 02/11/1934 पू. 301 302)
गाँधीजी इस उद्धरण के बरिए पुन: अपनी बात को दृढ़ता से रखते हैं कि बृहद उत्पादन, लगातार बढ़ती अनावश्यक जरूरते, वितरण हेतु बटिल व्यवस्था - एक शब्द में करें तो उद्योगबाद विश्वशांति के लिए ही खतरनाक है। औद्योगीकरण की घोर आलोचना की।
गाँधीजी अपनी प्रौद्योगिकी में मनुष्य मनुष्य तथा मनुष्य प्रकृति के बीच एक अहिंसक संबंध की स्थापना का प्रयास करते हैं। यह प्रौद्योगिकी का भी विरोध करते हैं जो श्रम को विस्थापित करती है. "मैं ऐसी मशीनों का कतई हिमायती नहीं हूँ जो या तो बहुत से लोगों को गरीब बनाकर र लोगों को अमीर बनाती है या अनेक लोगों के उपयोगी श्रम को अकारण विस्थापित कर देती है।" हरिजन, 22/06/1955, पृ. 146)
मानव की तथा मानव श्रम की प्रतिष्ठा ही वह मुख्य बिंदु है जो प्रौद्योगिकी विरोध का मुख्य आधार है। स्वयं गाँधीजी अपने समय में प्रौद्योगिकी के इस स्वरूप को देख चुके थे। जिसमें हजारों-लाखों लोग मशीन के कारण विस्थापित हो गये थे। प्रौद्योगिकी का नियम ही श्रम का विस्थापन है. इस मूल नियम को स्वीकार करके ही गांधीजी इसकी आलोचना करते हैं। प्रौद्योगिकी और विकास तथा श्रम में विस्थापन की इस अवधारणा का नवीन रूप प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो. विजय शंकर व्यास हमें बताते हैं। (आचार्य: 2008) उनके अनुसार वर्तमान विकास एक रोजगार विहीन विकास (जॉबलेसग्रोथ की स्थिति में आ रहे हैं जहाँ उत्पादन में वृद्धि के जरिए आर्थिक विकास तो है परंतु रोजगार के अवसरों की उपलब्धता पट रही है। इसे निम्नानुसार भी समझा जा सकता है।
तीव्र आर्थिक विकास हेतु उत्पादन वृद्धि की जस्त
प्रौद्योगिकी रूपान्तरण की जरूरत
मानवीय श्रम का विस्थापन और स्वचालित प्रौद्योगिकी
उत्पादन वृद्धि से आर्थिक विकास परन्तु रोजगार नहीं
यह ऐसा दुष्चक्र है जिसमें वर्तमान विकास तेजी से फँसता जा रहा है। यह एक ओर प्रौद्योगिकीय नियतिवाद का परिणाम है, वहीं दूसरी ओर वर्तमान विकास के दर्शन की एकायामी सोच का भी क्या वह अर्थव्यवस्था उचित कही जा सकती है जिसमें उसकी श्रमशील जनसंख्या लगातार अपने श्रम से वंचित हो तथा आगे चलकर उत्पादन व वितरण में अपनी भागीदारी खो दें? जब गाँधीजी प्रौद्योगिकी संबंधी अपना चिंतन स्पष्ट करते हैं तो वर्तमान अर्थशास्त्र एवं उसके विकास के दश्चक का पूर्वाभास हमें उनके चिंतन में दिखाई देता है। इसलिए गाँधीजी स्वदेशी एवं शरीर की करते हैं.
रोटी के लिए श्रम का अर्थशास्त्र जाती-जागती जीवन पद्धति है। इसका मतलब यह है कि हर आदमी को अपनी रोटी कपड़े के लिए शारीरिक श्रम करना होगा। अगर में लोगों को रोटी के लिए श्रम का महत्व और उसकी आवश्यकता समझा सकूँ तो रोटी-कपड़े की कमी कभी नहीं पड़ेगी।" (हरिजन, 07/09/1947316)
अपने प्रौद्योगिकी विमर्श में गाँधी जिस प्रौद्योगिकी को प्रस्तुत करते हैं वह स्वदेशी की अवधारणा है । स्वदेशी की अवधारण को स्पष्ट करते हुए कहते हैं,
स्वदेशी वह भावना है जो हमें दूर-दराज के इलाकों को छोड़कर अपने समीपस्थ क्षेत्रों का उपयोग करने और उनकी सेवा करने तक सीमित करती है... जहाँ तक आर्थिक क्षेत्र का संबंध है मुझे उन चीजों का इस्तेमाल करना चाहिए जिनका उत्पादन मेरे समीपस्थ पडौसी करते हैं और यदि मुझे वहाँ के उद्योगों में कोई कमी दिखाई देती है तो मुझे उन्हें अधिक कार्य-कुशल और पूर्ण बनाने के लिए उनकी सेवा करनी चाहिए।" स्पोचेज एंड राइटिंग्स ऑफ महात्मा गांधी जी.ए. नटेसन एंड कंपनी मद्रास, 1933, पृ. 336-44)
यह उन्दरण स्वदेशी के अंतर्गत सर्वप्रथम स्थानीयता को महत्व प्रदान करता है। आर्थिक क्षेत्र में इसका आशय है कि स्थानीय स्तर पर उत्पादन एवं उपभोग हो। एक प्रश्न यहाँ उपस्थित होता है कि क्या ऐसा करना या मानना सकीर्णता नहीं कहा जा सकता? यह प्रश्न गाँधीजी के सम्मुख भी था अतएव उन्होंने कहा के कि मेरा इस सत्य में अडिग विश्वास है कि व्यक्ति एक ही साथ अपने पड़ौसियों और मानवता की सेवा कर सकता।" (हरिजन, 23/07/1947, पु. 79)
वस्तुतः वह यह मानते हैं कि मानवता की सेवा कहीं भी रह कर की जा सकती है। एक भौतिक शरीर होने के कारण हर व्यक्ति की मर्यादा होती है परंतु वह अपने पड़ौसी की सेवा कर इस कार्य की शुरुआत कर सकता है। सुदूर किसी व्यक्ति की सेवा कर मानवता की सेवा करने के अमूर्त दर्शन की तुलना में स्वदेशी सिद्धांत ज्यादा प्रासंगिक है।
इसके साथ गाँधीजी स्वदेशी की भावना को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि स्वदेशी का यह अर्थ लगाना उसकी व्याख्या की संकुचित करना होगा कि हमें का त्याग कर देना चाहिए।" (यंग इंडिया, 17/06/1926 पू. 218)
यह स्वदेशी की व्याख्या सेवा के सिद्धांत के रूप में करते हुए बताते हैं कि प्रत्येक विदेशी वस्तु 'स्वदेशी का अभियान पुणा फैलाने का अभियान नहीं है। यह निस्वार्थ सेवा का सिद्धांत है जिसकी जड़ में विशुद्ध अहिंसा अर्थात् प्रेम है। (फ्राम बर्वदा मंदिर, पू. 66
इस प्रकार एक प्रौद्योगिकी के रूप में हम स्वदेशी को इस प्रकार बता सकते हैं. स्वदेशी वह प्रौद्योगिकी है जो स्थानीय स्तर पर स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति स्थानीय भ्रम के द्वारा स्थानीय प्रौद्योगिकी एवं संसाधनों की सहायता द्वारा करती है।
स्थानीय संसाधन
स्वदेशी
स्थानीय श्रम
स्थानीय प्रौद्योगिकी
स्वदेशी का अर्थ यहाँ भारतीय न होकर एक ऐसी विकेंद्रीकृत एवं स्थानीय अर्थव्यवस्था से हो जाता है जो स्थानीय आवश्यकता, श्रम संसाधन एवं प्रौद्योगिकी द्वारा विकसित होती है। यहाँ विकेंद्रीकरण उत्पादन उपभोग दोनों का ही है जो आगे चलकर वितरण एवं स्वामित्व में भी लक्षित होता है। जब गांधीजी चरखे एवं खादी को स्वदेशी अर्थव्यवस्था के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत कर रहे होते हैं तो
उसके पीछे उनका उद्देश्य शरीर-श्रम की स्थापना एवं विकेंद्रीकरण ही हो जाता है.. "चरखे का संदेश है, मानव जाति की सेवा इस प्रकार जीना कि दूसरों को कष्ट न पहुंच इंडिया 17/09/1925, पृ. 321 ) इस सादगी में शरीर श्रम, अपरिग्रह अनिवार्य रूप से शामिल हो जाते हैं। चरखा सत्ता के केंद्रीकरण एवं शोषण का विरोधी है.
"मुट्टीभर हाथों में धन और सत्ता के केंद्रीकरण तथा लाखों लोगों के शोषण के लिए मशीन तंत्र के संचालन को मैं पूरी तरह गलत मानता हूँ... चरखे का अभियान मशीन को अनन्यता एवं शोषण की स्थिति से हटाकर अपने मुक्तियुक्त स्थान पर बैठाने का ही एक संगठित प्रयास है।"(मग इंडिया, 17/09/1925, 321
खादी की मानसिकता का अर्थ है जीवन की आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन और वितरण का विकेंद्रीकरण (गांधी, मो. क.. 1948)
इस प्रकार गांधीजी की स्वदेशी अवधारणा में चरखा व खादी भी विकेंद्रीकरण के माध्यम होते हैं साथ ही बृहद जनता के रोजगार के साधन भी हो जाते हैं। स्वदेशी में चरखे के केंद्रीकरण के लिए भी स्थान नहीं है। यदि चरखे में भी कोई खराबी हो तो उसे स्थानीय स्तर पर ही ठीक किया जाना चाहिए। इस स्वदेशी योजना में बड़े उद्योगों की स्वीकृति है परंतु वह ग्राम आधारित उद्योगों के पूरक होंगे और उनकी सहायत करेंगे और इन पर राज्य का स्वामित्व होगा तथा जन हित में इनका संचालन किया जाएगा।
परमेश्वरी दयाल (2006) ने स्वदेशी के सिद्धांत के तीन आधारभूत तत्व बताएं है।
1. हर वैयक्तिक उपभोक्ता द्वारा इच्छाओं में कमी करना।
2. उत्पादित होने वाली वस्तुओं के प्राथमिकता के क्रम में बदलाव ताकि वह पड़ीस में उत्पन्न हो सके।
3. उत्पादक एवं उपभोक्ता के बीच सहयोग एवं पारस्परिकता।
इनमें से हम दो बिंदुओं की चर्चा ऊपर कर चुके हैं। स्वदेशी सिद्धांत के अंतर्गत अर्थव्यवस्था का विकेंद्रीकरण कर भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के महत्व को स्वीकारना एवं उसे इस तरीके से पुनर्रचित करना है जिससे कि अहिंसक व्यवस्था बनायी जा सके। वह उत्पादन और उपभोग को आपस में संबंधित में करते हुए कहते हैं
उत्पादन और उपभोग दोनों स्थानीकृत होते हैं तो उत्पादन में अंधाधुंध और किसी भी कीमत पर वृद्धि करने का लालच समाप्त हो जाता है। तब हमारे वर्तमान अर्थतंत्र की सभी अनंत कठिनाईयाँ और समस्याएँ समाप्त हो जाएंगी।" (हरिजन, 02/11/1934, पृ. 302)
गांधीजी ऐसे औद्योगीकरण की संकल्पना करते हैं जो सीमित चयनित और सामाजिक रूप से नियंत्रित था। उसमें एक ओर बृहद पूंजी आधारित उद्योग थे जो राज्य के जरिए जनता द्वारा नियंत्रित थे दूसरी और छोटे स्तर के उद्योग थे जो पारिवारिक स्तर पर गाँवों में फैले हुए थे। यह मिश्रित औद्योगीकरण एक अहिंसक समाज की जरूरत है और लोगों की भौतिक एवं नैतिक प्रगति के लिए भी आवश्यक है। सामाजिक एवं आर्थिक विकेंद्रीकरण लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करता है। यह प्रक्रिया अलगाव को कम करती है। यह विकेंद्रीकरण वैयक्तिक स्वतंत्रता एवं सामाजिक उत्तरदायित्व का बेहतरीन सम्मिश्रण है। गांधीजी के समक्ष भारत के सात लाख गाँवों के विकास की चिंता थी अतः वह उस प्रौद्योगिकी को स्वीकार करना चाहते हैं जो स्थानीय एवं श्रम को बचाने वाली हो.
'मैं ऐसे सीधे-सादे औजारों, उपकरणों और यंत्रों का स्वागत करता हूं जो व्यक्ति के श्रम को बचाते हैं और लाखों झोपड़ियों के काम के बोझ को हल्का करते हैं। इंडिया, 17/06/1926, 9.218 )
मैं ऐसे सीधे-सादे औजारों, उपकरणों और मंत्रों का स्वागत करता हूँ जो व्यक्ति के क्षम को बनाते हैं और लाखों झोपड़ियों के काम के बोझ को हल्का करते हैं। यंग इंडिया, 17/06/1926, 9.218)
अत: गांधी आधुनिक प्रौद्योगिकी द्वारा वृहद उत्पादन (मॉस प्रोडक्शन) को लोगों द्वारा बृहद उत्पादन (प्रोडक्शन बाय मासेज में तब्दील करते हैं और इस प्रौद्योगिकी द्वारा स्वयमेव उत्पन्न केंद्रीकरण को स्थानीय प्रौद्योगिकी के जारण विकद्राकरण से प्रतिस्थापित करते हैं। उनकी दृष्टि में आधुनिक प्रौद्योगिकी द्वारा उत्पन्न उद्योगवाद मानव जाति के लिए अभिशाप है साथ ही आशा करते हैं कि इस उद्योगवाद को जन्म देने वाला एवं उससे प्रभावित होने वाला यूरोप इससे बचने का रास्ता निकाल लगा और यह रास्ता सादगी एवं ग्राम जीवन को मजबूत करने की ओर ले जाएगा यहाँ स्पष्ट करना जरूरी है कि जब गाँधी ग्राम जीवन को मजबूत करने; उसे मान्यता प्रदान करने की बात कह रहे होते हैं जो उनका आशय शरीर-श्रम आधारित व्यवस्था से होता है।
स्वदेशी से जुड़ी एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इस प्रौद्योगिकी में अलगाव (एलिएनेशन) की भावना समाप्त होती है। कार्ल मार्क्स ने अलगाव की भावना को पूंजीवादी समाज व अर्थव्यवस्था के अनिवार्य परिणाम के रूप में देखा था। स्वयं गाँधीजी ने पूंजीवाद को एक बुराई के रूप में देखा था। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में श्रमिक उत्पादन प्रक्रिया में उत्पादित वस्तु के किसी एक अंश को बनाता है, यह प्रक्रिया चार बार दोहराई जाती है. यंत्रीकरण की तरह इस वस्तु के उपयोगकर्त्ता से उसका संबंध नहीं होता; इस वस्तु के उत्पादन, वितरण, कीमत इत्यादि को तय करने में उसकी कोई भूमिका नहीं होती।
इन्हीं सभी प्रक्रियाओं का परिणाम अलगाव के रूप में सामने आता है। स्वदेशी प्रौद्योगिकी में व्यक्ति पूरी वस्तु का उत्पादन करता है; यह प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती है परंतु वह उसे सृजनात्मक संतुष्टि देती है. इस उत्पादित वस्तु के उपभोगकर्ता से उसका सीधा संबंध होता है क्योंकि उपभोग स्थानीय होता है; वस्तु के उत्पादन, वितरण, कीमत निर्धारण में उसकी मुख्य भूमिका होती है। इस प्रकार हम देख सकते हैं कि स्वदेशी अलगाव की समस्या का समाधान भी उसी उत्पादन व्यवस्था में स्थानीय प्रौद्योगिकी के प्रयोग से करती है।
स्वदेशी का एक अन्य पक्ष यह भी है कि स्थानीय संसाधन, श्रम एवं तकनीक के जरिए ही उत्पादन के साधनों पर आम जनता का वास्तविक नियंत्रण कायम रह सकता है। उत्पादन के साधनों को आम जनता के नियंत्रण में लाकर गाँधीजी वास्तव में एक विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था राजनीतिक एवं सामाजिक व्यवस्था की स्थापना कर रहे होते हैं। आगे चलकर ई.एफ. शूमाकर, इबान इलिच, एरिक फ्रॉम जैसे विद्वानों ने गांधीजी को प्रेरणा स्रोत मानकर 'मध्यवर्ती', 'समुचित प्रौद्योगिकी की बात कही। शुभाकर के अनुसार स्थायित्व के अर्थशास्त्र कहना चाहिए अहिंसक अर्थशास्त्र के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी का पुनरभिविन्यास किया जाना चाहिए तथा ऐसी पद्धतियाँ और उपस्कर चाहिए जो
1. इतने सस्ते हाँ कि लगभग प्रत्येक व्यक्ति की पहुँच के भीतर हो:
2. छोटे पैमाने पर काम करने के लिए उपयुक्त हो और
3. मनुष्य की सृजनात्मक वृत्ति के अनुकूल हो।
इन्हीं तीन बातों से अहिंसा की और मनुष्य तथा प्रकृति के बीच ऐसे संबंधों की स्थापना संभव है जिसमें स्थायित्व सुनिश्चित हो सकेगा।
प्रसिद्ध विज्ञान प्रो. डी. पी. मुखर्जी (1954) ने अपने लेख महात्मा गांधी व्यूज ऑन मशीन्स एण्ड टेक्नालॉजी में उनके विचारों को विश्लेषित करते हुए लिखा कि वह मशीन एवं मशीनी सभ्यता का विरोध करते हैं परंतु मशीन के ‘उचित' उपयोग पर भी बल देते हैं। 'उचित' उपयोग का सकारात्मक अर्थ मानवता के लिए प्रेम था और नकारात्मक अर्थ में सत्ता केंद्राकरण, शहराकरण, बेरोजगारी, राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक शोषण की आलोचना से था। वह कहते हैं कि गांधीजी कातिकारा थे क्योंकि एक समाज विज्ञानी की तरह उन्होंने भारतीय वास्तविकता और इसकी स्वभावगत परिवर्तनशीलता को जान कर नये मूल्यों के निर्माण की बात कही। गांधी अतीत में नहीं जाते वह प्राच्यविद नहीं है वह केवल स्रोतों एवं उनकी जड़ा तक पहुंचना चाहते है क्योंकि जितनी गहराई में आप जाएंगे, उतने ही क्रांतिकारी आप होगे।
स्वदेशी के जरिए गाँधी जी अर्थव्यवस्था में सम्पूर्ण उत्पादन ढांचे को बदल डालने का प्रस्ताव करते हुए एक आत्मनिर्भर एवं स्वावलंबी आर्थिक क्षेत्र को अपना उद्देश्य बनाते हैं जो अपने पड़ोसियों के साथ परस्परावलंबन का जीवन व्यतीत कर सके। स्वावलंबी गाँव आर्थिक विकेंद्रीकरण का ही रूप है जिसका आधार स्थानीयता एवं उस पर आधारित प्रौद्योगिकी संसाधन है। इसका उद्देश्य लोगों की सेवा करना है। इस व्यवस्था में उत्पादन, उपभोग स्थानीय होने के कारण मालिक, ग्रमिक और उपभोक्ता तीनों एक ही हो जाते हैं: यही इसकी विशिष्टता है। गांधीजी के लिए सत्य व अहिंसा जीवन का मूलभूत नियम होने के कारण आर्थिक विचार भी इसी उद्देश्य की प्राप्ति के साधन हो जाते हैं। एक नैतिक प्राणी के रूप में मनुष्य की कल्पना करने के कारण आर्थिक प्रक्रियाएँ भी नैतिक उत्कर्ष का साधन हो जाती है और श्रम को आधार बनाकर एक समतामूलक समाज की स्थापना में योगदान देती हैं।
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