महात्मा गांधी के विचार ट्रस्टीशीप पर - Mahatma Gandhi's Thoughts on Trusteeship
महात्मा गांधी के विचार ट्रस्टीशीप पर - Mahatma Gandhi's Thoughts on Trusteeship
अपने श्रम-पूँजी संबंध के बारे में विचार करते हुए गांधीजी दोनों के बीच सहयोग एवं पारस्परिकता की बात कहते हैं। एक आदर्श स्थिति के रूप में श्रम पूँजी को एक-दूसरे का पर्याय बनाते हैं परंतु वास्तविक स्थिति में ऐसा नहीं होने पर उस आदर्श की ओर जाने हेतु उपाय भी प्रस्तावित करते हैं। ठीक उसी प्रकार स्वामित्व की समस्या पर विचार करते हुए ट्रस्टीशिप का सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं। यह सिद्धांत उनके जीवन दर्शन से प्रसूत हैं जिसमें पूर्वी एवं पश्चिमी सांस्कृतिक विरासत है जो आध्यात्मिक एवं धार्मिक तथा अपनी प्रकृति में नैतिक एवं सामाजिक है। अपने गहन एवं विस्तृत अध्ययन से गाँधीजी ने स्वामित्व की समस्या का हल भगवत गीता और उपनिषद के जरिए प्राप्त किया।
गाँधीजी का तात्कालिक समय सामाजिक अन्याय, आर्थिक असमानता और आर्थिक संकेन्द्रण का था। यह समस्याएँ काफी हद तक ही पूँजीवादी आर्थिक व्यवस्था का परिणाम थी। इस व्यवस्था के परिवर्तन हेतु दो दृष्टिकोण प्रचलित थे एक क्रांति के जरिए समूची व्यवस्था को बदलने का विचार करता था. इसके लिए हिंसा का रास्ता भी वरेण्य था।
दूसरा इसमें अभिजात्य वर्ग यथास्थिति बनाए रखना चाहता था जो उनकी आर्थिक व राजनीतिक स्थिति को मजबूत करती थी । यह दोनों दृष्टियाँ अतिरेकपूर्ण थी। गांधीजी ने इस संदर्भ में एक नवीन दृष्टि ट्रस्टीशिप प्रदान की। गाँधीजी ने व्यक्ति और समाज के निरंतर विकसनशील सिद्धांत को स्वीकार किया। ट्रस्टीशिप का सिद्धांत सत्य-अहिंसा को आधार बनाकर स्वामित्व की पुनर्रचना कर समाज में महत्वपूर्ण परिवर्तन को जन्म देता है गाँधीजी ने स्वामित्व के विचार को भ्रामक एवं हिंसापूर्ण बताते हुए उसमें सुधार स्वामित्व विचार व्यक्ति को व्यक्ति और प्रकृति पर विशेषाधिकार प्रदान करते हुए किया। तात्कालिक मानवीय कानून और सामाजिक कायदों को अतिक्रमित करता है। यह अवधारणा समाज में शोषण, स्वार्थ परिग्रह को आश्रय देते [ संघर्ष को बढ़ाती है। अतएव उन्होंने इसे अहिंसक संघर्ष में तब्दील किया। उनका न्यासिता का हुए सिद्धांत एक विकसनशील सिद्धांत रहा है।
तार्किकता
गाँधीजी द्वारा प्रस्तुत न्यासिता सिद्धांत की तार्किकता को हम निम्नानुसार बिन्दुओं के माध्यम से अभिव्यक्त कर सकते हैं.
I.. गाँधीजी न्यासिता को यज्ञ की अवधारणा के साथ जोड़ते हैं। उनके लिए यज्ञ का अर्थ है: "कोई ऐसा कृत्य जो फल की कामना के बगैर दूसरों के कल्याण के लिए किया गया हो. यह कृत्य लौकिक या आध्यात्मिक किसी भी प्रकार का हो सकता है. इसके अलावा मौलिक त्याग कोई ऐसा कृत्य होना चाहिए जो अधिकतम व्यापक क्षेत्र के अधिकतम जीवों का अधिकतम कल्याण करने वाला हो और जिसे अधिकतम स्त्री-पुरुष कम से कम कष्ट उठाकर कर सकते हो। तदनुसार किसी तमाकथित ऊंचे उद्देश्य के लिए किया गया कृत्य यदि एक जीव को भी हानि पहुँचाने के उद्देश्य से किया गया हो तो वह यज्ञ नहीं कहला सकता, महायज्ञ तो और भी नहीं।" एफ्राम आश्रम ऑब्जर्वसेज हद मंदिर है कि व्यक्ति स्वार्फ से ऊपर उठकर अन्य लोगों के दिल में जब कार्य करता है तभी उसका कार्य त्यागपूर्ण होता है। स्मरण रखना होगा कि सर्वोदय के सिद्धांत के अनुसार सबकी भलाई में ही स्वयं की भलाई निहित है। परंतु सबकी भलाई स्वयमेव नहीं हो सकती। इसका आधार हर व्यक्ति द्वारा अपने त्यागपूर्ण कर्म में है। न्यासिता का आधार भी यही त्याग है।
2. गाँधीजी न्यासिता के आधार के रूप में ईशोपनिषद के मंत्र "ईशावास्यमिदम सर्वम् की व्याख्या को प्रस्तुत करते हैं। वह कहते हैं. "तेन त्यक्तेन भुंजीधा अपनी संपत्ति का त्याग करके तू ओ भोग इसको जरा विस्तार से समझा कर कहूँ तो यह कहूँगा: तू करोड़ों खुशी से कमा। लेकिन समझ ले कि तेरा। सिर्फ तेरा नहीं, सारी दुनिया का है, इसलिए जितनी तेरी सच्ची जरूरतें हो, उतनी पूरी करने के बाद जो बचे उसका उपयोग तू समाज के लिए कर।" (हरिजन, 01/02/1942, पू. 20) गाँधीजी इस मंत्र द्वारा एक तरह के “अनासक्त स्वामित्व की अवधारणा लाते हैं। प्रो. नंदकिशोर आचार्य के अनुसार यज्ञ की अवधारणा और ईशावास्यमिदम सर्वम्" के माध्यम से गांधीजी स्वामित्व के सवाल का एक ऐसा समाधान प्रस्तुत करते हैं जो केवल व्यक्तिगत सदाशयता पर निर्भर नहीं रहता बल्कि एक संस्थागत परिवर्तन बन जाता है। (आचार्य: 58) यह अनासक्त "स्वामित्व अपनी बुनियादी जरूरतो को पूरा करने के पश्चात समाज के कल्याण हेतु तत्परता है।
3. गाँधीजी न्यासिता के आधार के रूप में अपरिग्रह एवं अस्तेय के धार्मिक सिद्धांत को अर्थशास्त्रीय आयाम प्रदान करते हैं और उसे एक अहिंसक अर्थव्यवस्था की बुनियाद बनाते है। वह अपनी आवश्यकता से अधिक संग्रह करने को अपरिग्रह एवं अस्तेय में शामिल करते हुए इसे चोरी की संज्ञा देते हैं। वह इसे प्रकृति का बुनियादी नियम भी कहते हैं
"अगर मैं कोई ऐसी चीज लेकर अपने पास रख लेता हूँ जिसकी मुझे तत्काल आवश्यकता नहीं है तो मैं किसी अन्य व्यक्ति से वह चीज चुरा रहा हूँ। प्रकृति का यह मौलिक नियम है कोई अपवाद नहीं है कि वह हमारी दैनंदिनी आवश्यकताओं को पूर्ति के लिए जितना जरूरी है, ठीक उतना ही उत्पादन करती है और यदि प्रत्येक व्यक्ति उसमें से सिर्फ उतना ही हिस्सा ही लेने की उसे जरूरत है और फालतू बिलकुल न ले तो दुनिया में से कंगाली उठ जाएगी और कोई आदमी भूख से नहीं मरेगा।" (स्पीचेज एंड राईटिंग्स ऑफ महात्मा गांधी पू. 377)
यहाँ यह स्पष्ट है कि यदि प्रकृति का यह नियम है कि वह हमारी आवश्यकता अनुसार उत्पादन करती है जिससे जरूरतें पूरी हो सके तो एक वैज्ञानिक दृष्टि यह हो सकती है कि इसी नियम का पालन करते हुए हम सामाजिक कायदों का संचालन करें।
4. गाँधीजी सामाजिक न्याय को न्यासिता विचार की स्थापना में महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करते हैं। एक राष्ट्र में उपलब्ध समस्त संसाधनों पर राष्ट्र के समस्त नागरिकों का समान अधिकार होना चाहिए। किसी एक व्यक्ति या समूह को यह अधिकार नहीं है कि वह इन संसाधनों का उपयोग या कहना चाहिए शोषण- अपने हित एवं लाभ वृद्धि हेतु करें फिर चाहे इससे व्यापक समाज हित का नुकसान हो। यह स्थिति किसी भी तरह से उचित नहीं कहीं जा सकती है। वस्तुतः ऐसी दृष्टि नागरिकों के बीच असमानता का स्वीकार है और मूलत: सामाजिक न्याय की विरोधी है। सामाजिक न्याय व्यक्तियों के बीच हर तरह की समानता का स्वीकार है। इसमें हर व्यक्ति को अवसर की समानता, मानवीय गरिमा, अपने सर्वागीण विकास हेतु उचित वातावरण निर्माण, लाभ में समान भागीदारी इत्यादि बातें शामिल है। हर व्यक्ति को अपनी आजीविका कमाने और काम के अवसर का समान अधिकार सामाजिक न्याय की पूर्व शर्त कही जा सकती है। वह कहते हैं.
'प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन निर्वाह के लिए पर्याप्त काम उपलब्ध होना चाहिए। यह आदर्श सर्वत्र तभी प्राप्त किया जा सकता है जब जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं के उत्पादन के साधन आम जनता के नियंत्रण में हो। ये उसी प्रकार सबको मुफ्त रूप से उपलब्ध होने चाहिए जिस प्रकार ईश्वर की दी हुई वायु और जल है अथवा होने चाहिए इन्हें दूसरों के शोषण का अवैध नहीं बनाया जाना चाहिए। किसी भी देश राष्ट्र या व्यक्ति समूह द्वारा इन पर एकाधिकार करना अनुचित है।" (यंग इंडिया, 15/11/1928,381)
5. हम सभी इस तथ्य से अवगत हैं कि कोई व्यक्ति समाज उपलब्ध संसाधनों के आधार पर ही सबकुछ अर्जित करता है यानि समाज के द्वारा ही समस्त उपार्जित आय सम्पत्ति प्राप्त करता है। बिना समाज की संपत्ति का उपयोग किए किसी भी प्रकार का संपत्ति निर्माण/आय सृजन संभव नहीं है। अतः जब आय/सम्पत्ति सृजन की प्रक्रिया ही सामाजिक है तो उसके लाभ भी सामाजिक होने चाहिए। वह व्यक्तिगत नहीं हो सकते । जिन सामाजिक आयामों की सहायता से व्यक्ति संपत्ति आय सृजन करता है उन्हें भी लाभ समान रूप से प्राप्त होने चाहिए। प्रो. नंदकिशोर आचार्य (2008: 76-78) ने न्यासिता को न्यायोचित ठहराते हुए यह तर्क देते हुए लिखा कि उत्पादन के प्राकृतिक वित्तीय ज्ञानात्मक एवं मानवीय संसाधनों पर किसी का वैयक्तिक स्वामित्व न्यायोचित नहीं ठहरता। साथ ही इस उत्पादन से होने वाले मुनाफे पर भी वैयक्तिक स्वामित्व स्वीकार करना न्याय की बुनियादी अवधारणा को भूलना है। इसमें आगे बढ़कर प्रो. आचार्य कहते हैं कि वर्तमान विकास की एक अवधारणा अन्तसंवति न्याय (इन्टरजेनरेशनल जस्टिस) नजरिए से भी वैयक्तिक स्वामित्व की अवधारणा न्यायोचित नहीं रहती है।
गाँधीजी कहते हैं कि जब सामूहिक उत्पादन है तो उसके लाभ वितरण भी समान होने चाहिए। यहाँ समान वितरण का तात्पर्य हर एक की बुनियादी जरूरत पूरी होना है। हर व्यक्ति की बुनियादी जरूरत पूरी होना ही समाज की प्राथमिकता है। इस समान वितरण का तात्पर्य हर एक के पास समान धनराशि का वितरण होना नहीं है बल्कि उसकी जरूरत के मुताबिक आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराना है। यह भी सामाजिक न्याय का ही एक अंग है जो न्यासिता पूरा करता है।
उपर्युक्त आधारों पर यह स्पष्ट है कि गाँधीजी समाज में विद्यमान असमानता को समाप्त करने हेतु एक अहिंसक आधार उपलब्ध कराते हैं। अपनी अहिंसा दृष्टि के जरिए वह स्वामित्व की अवधारणा में सार्थक बदलाव का रचनात्मक प्रयास करते हैं।
चतुर्यामी प्रक्रिया
गांधीजी द्वारा प्रस्तुत न्यासिता सिद्धांत एक चतुर्यामी कार्यक्रम है
अधिक
पत
"न्यासिता
उपभोक्ता
गाँधीजी पूंजीपतियों, मिलमालिकों से यह उम्मीद करते हैं कि उन्हें एक न्यासी की तरह कार्य करना चाहिए। अपनी पूँजी को न्यास में तब्दील कर उसका प्रयोग समाज के हित में करना चाहिए। वह पूंजीपतियों से आह्वान करते हैं.
*मैं उन व्यक्तियों को जो आज अपने आप को मालिक समझ रहे हैं न्यासी रूप में काम करने के लिए आमंत्रित कर रहा हूँ अर्थात यह आग्रह कर रहा हूँ कि वे स्वयं को अपने अधिकार की बदौलत मालिक न समझे, बल्कि उनके अधिकार की बदौलत मालिक समझें जिनका उन्होंने शोषण किया है 1" यंग इंडिया, 26/11/ 1931 पू. 369)
ऐसा कहते हुए वह पूँजीपतियों की नैतिक रूप से प्रश्नांकित कर रहे होते हैं कि उनकी संपत्ति मूलत: शोषण का पर्याय है। साथ ही वे पूँजीपतियों को अपरिग्रह स्वैच्छिक गरीबी अपनाने को कहते हैं। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि स्वैच्छिक गरीबी का स्वीकार बुनियादी जरूरतों के पूरे होने के पश्चात की अवस्था है जहाँ व्यक्ति बुनियादी जरूरतों के बाद ऐसी जीवन-शैली अपनाए जो समाज के अधिकांश लोगों के साथ साम्य बिठा सके। साथ ही वह पूँजीपतियों को भी शरीर-श्रम पर आधारित जीवन शैली का प्रस्ताव करते हैं। जैसाकि पूर्व में उल्लेख किया जा चुका है कि गांधीजी पूँजीवाद का नाश चाहते हैं. पूंजीपति का नहीं।
यह महत्वपूर्ण है कि गाँधीजी पूंजीपत्तियों के हृदय परिवर्तन के जरिए उनके नैतिक उत्कर्ष की आकांक्षा रखते हैं। इसके पीछे यह तर्क है कि हिंसा केवल शोषित को ही क्षति नहीं पहुंचाती चल्कि शोषक के प्रति पहले हिंसक होती है यानि शोषण स्वयं पहले अपनी मनुष्यता त्यागकर अपने प्रति हिंसक होता है तब अन्य के प्रति हिसक होता है अतएव किसी भी प्रकार की हिंसा सर्वप्रथम अपने प्रति हिंसा है। गांधीजी इस तर्क के आधार पर पूंजीपतियों को यह अवसर देते प्रतीत होते हैं कि वे स्वयं तथा दूसरों न्यासिता सिद्धांत के पूंजीपति के बने रहने के पीछे यह भी तर्क है कि उनके अनुभवों का लाभ उठाया जाए। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि साम्यवादी रूस में भी 1917 की क्रांति के बाद राज्य उत्पादन व्यवस्था में मैनेजर पद का उदभव हुआ जो उत्पादन व्यवस्था को देखता था। गांधीजी चाहते थे कि पूजीपति अपने कौशल एवं अनुभव का प्रयोग जनता के हित में करे सबसे महत्वपूर्ण बात की और इंगित 1 करते हुए वह अपनी चिर-परिचित शैली से अलग चेतावनी देते हुए अंदाज में कहते हैं.
"आज के धनवानों को वर्ग संघर्ष और स्वेच्छा से धन के ट्रस्टी बन जाने के दो रास्तों में से एक रास्ता चुना लेना होगा।" (हरिजन, 31/03/1946, पृ. 63-64)
पूजापतियों का हृदय-परिवर्तन का विचार गांधी विचार की विशिष्टता है इसका मूल इस अहिंसा दृष्टि में है कि प्रत्येक व्यक्ति सदगुण सम्पन्न है। कोई व्यक्ति ऐसा नहीं है जो सुधार से परे हो। गांधीजी की दृष्टि में मानव का स्वभाव परिवर्तित किया जा सकता है। मगर यह परिवर्तन हिंसक नहीं बल्कि अहिंसक प्रक्रिया द्वारा लाया जाना चाहिए।
इस बिंदु पर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि श्रमिक उस दिन की प्रतीक्षा करें कि कब पूंजीपतियों का हृदय परिवर्तन होगा और कब वे न्यासिता को स्वीकार करते हुए न्यासी बनेगे? गाँधीजी श्रमिकों से यह अपील करते हैं कि उन्हें पूंजीपतियों के हृदय परिवर्तन की अनंतकाल तक इंतजार करने की आवश्यकता नहीं है। यदि उन्हें ऐसा प्रतीत हो कि पूँजीपति उनके जायज हकों को स्वीकार नहीं कर रहा है तो वे बिना किसी परिवर्तन की प्रतीक्षा किए असहयोग, सविनय अवज्ञा का प्रयोग करते हुए सत्याग्रह की शुरूआत कर सकते हैं। सत्याग्रह किसी भी अन्याय के विरुद्ध अहिंसक संघर्ष का कारगर उपाय है। स्वयं गाँधीजी ने इसका प्रयोग कर अन्याय के विरुद्ध संघर्ष किया। श्रम संगठनों के संबंध में जब गाँधीजी शिक्षा की बात करते थे, वहाँ उनका अर्थ असहयोग व सविनय अवज्ञा की शिक्षा से भी था।
असहयोग की व्याख्या करते हुए गाँधीजी उसे एक व्यापक अर्थ प्रदान करते हैं. 'मैं नॉन को-आपरेटर (असहयोगी हूँ.. लेकिन मैं असहयोग इसलिए करता हूँ कि सहयोग कर सकू... यह किसी पर उपकार नहीं करता, यह असहयोग बुराई करने वालों के साथ नहीं, बल्कि बुराई के साथ एक बुरी प्रणाली के साथ है।" (यंग इंडिया, 20/08/1925, पृ. 285) श्रम-पूंजी संबंधों में श्रमिकों की शक्ति उनके असहयोग में निहित है। इस असहयोग का मतलब है पूँजीपतियों द्वारा किए जाने वाले शोषण में भागीदारी से मना करना या दूसरे शब्दों में असहयोग का अर्थ है एक समतापूर्ण सहयोग की शुरूआत ऐसा सहयोग जिसमें श्रम पूंजी एक समान हो। गाँधी इसे और स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि..
"एक बड़ा जानदार शब्द है, यह अंग्रेजी में भी है, फ्रेंच में भी है और विश्व की सभी भाषाओं में है यह शब्द है नहीं। जो रहस्य हमें हाथ लगा है वह यह है कि जब पूंजीपति यह चाहें कि श्रमिक हाँ करें तो श्रमिक को, यदि उसका मन्तव्य है तो पूरे जोर के साथ नहीं कह देना चाहिए। इसके साथ अमि यह बात समझ में आ जाएगी कि उनके सामने दो विकल्प जब हाँ कहना चाहतो तो करने का और जब ना कहना चाहे तो ना कहने का । जब ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाएगी तो श्रम पूंजी से स्वतंत्र हो जाएगा और पूंजी को म मनुहार करनी पड़ेगी। इंडिया, 14/01/1932 पू. 17-18)
श्रमिक द्वारा किया जाने वाला यह अहिंसक असहयोग पूंजी को श्रम की महता का भान करा सकेगा और शोषण मुक्ति को संभव बना कर समानतापूर्ण सहयोग की नई शुरूआत संभव हो पाएगी। गांधीजी यह भी दर्शाते हैं कि पूजी के साथ न्यासी होना अनिवार्य है तो श्रम को इससे कैसे मुक्त किया जा सकता है? इसका कारण है कि श्रम भी तो स्वयं में एक पूंजी का ही रूप है अतः अमिक को भी न्यासी होना होगा क्योंकि वह श्रम रूपी संपत्ति का मालिक है। श्रमिक का न्यासीपन अपने अधिकार एवं कर्तव्यों की पूर्ति में संभव है जहां वह पूंजी के साथ सहयोग कर एक समाजोपयोगी उत्पादन में हिस्सा लेता है और जीवन की बुनियादी जरूरतें पूरी कर सकता है वहीं दूसरी ओर श्रम संगठन के जरिए अपने अधिकारों की पूर्ति कर समाज में एक बेहतर वातावरण निर्माण का मार्ग प्रशस्त करता है।
गांधीजी ने देखा कि श्रम व पूंजी दोनों ही सत्ता के प्रकार हैं। यह सत्ता सृजनात्मक और विध्वंसात्मक दोनों ही दिशाओं में जा सकती है। उनका प्रयास था कि इन दोनों ही सत्ताओं का प्रयोग एक दूसरे के सहयोग से पारस्परिक उन्नयन के लिए किया जाए जो व्यापक समाज के कल्याण को भी प्राप्त कर सके। गांधीजी उपभोक्ता को भी अपने न्यासिता सिद्धांत का हिस्सा बनाते हैं। उनके अनुसार श्रम पूँजी आपस में एक-दूसरे का सहयोग करते हुए न्यासी बन जाए और समाज के कल्याण हेतु अपनी भूमिका अदा करे। दोनों मिलकर उपभोक्ता के न्यासी बने ताकि समाज में सबके हितों का कल्याण हो सके। गांधीजी की दृष्टि में यदि औद्योगिक संबंध (श्रम-पूजी संबंध) सामाजिक जीवन का ही एक भाग है तो वह व्यापक समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी से नहीं भाग सकता है। वह कहते हैं कि सच तो यह है कि तब पूँजीपति और श्रमिक एक दूसरे के न्यासी बन जाएंगे और दोनों मिलकर उपभोक्ताओं के संयुक्त न्यासी बन जाएंगे। मेरा न्यासीपन का सिद्धांत; जैसाकि मैंने समझाया है. एक पारस्परिक और उभयपक्षी चीज है इसमें प्रत्येक संबंधित पक्ष यही मानता है कि
दूसरे पक्ष के हितों की रक्षा में ही उसका अपना सबसे अधिक हित है।" (सम्पूर्ण गाँधी वाडमय खंड-67.पू.153) इसके साथ ही वह यह भी अपेक्षा करते हैं कि इसी न्यासी भाव में लाभांश, मजदूरी और कीमतों के बीच सामजस्य स्थापित हो जाए। यह तभी संभव है जब श्रम-पूँजी एक-दूसरे का सहयोग समाज की भलाई के लिए अपना लक्ष्य स्थापित करें.
"एक ऐसा वक्त जरूर आयेगा और वह जल्द आए उतना ही अच्छा होगा जब भागीदारों के लाभाश, मजदूरों की मजदूरी और उपभोक्ताओं द्वारा अदा की जाने वाली कीमतों के बीच समुचित सामजस्य स्थापित हो जाएगा।" (सम्पूर्ण गांधी वाडमय, खंड-20, पृ. 508)
यह उद्धरण श्रम व पूंजी के उपभोक्ताओं के प्रति न्यासी बनने की प्रक्रिया का एक हिस्सा है। गांधीजी के लिए उचित कीमत निर्धारण दोनों पक्षों का समाज के प्रति दायित्व है। साथ ही वह यह भी प्रस्ताव करते हैं कि उपभोक्ता भी इसी व्यवस्था का हिस्सा है तब वह अपने उत्तरदायित्वों से कैसे विमुख हो सकता है? उनके अनुसार यदि पूंजीपति का हृदय परिवर्तन हो रहा हो, श्रमिक असहयोग, सविनय अवज्ञा आदि सत्याग्रह का प्रयोग कर रहा हो या न कर रहा हो, ऐसा स्थिति में उपभोक्ता का दायित्व है कि वह उन वस्तुओं का बहिष्कार कर जो शोषण से उत्पन्न की जा रही हो। अगर कोई वस्तु शोषण से उत्पन्न है तो उपभोक्ता का उस सम्पूर्ण व्यवस्था के प्रति सत्याग्रह करना कर्तव्य हो जाता में उपभोक्ता एक सत्याग्रही उपभोक्ता हो जाता । समाज की भी यह जिम्मेदारी है कि वह स्वस्थ औद्योगिक संबंधों को स्थापित करे समाज अपनी भूमिका से पलायन नहीं कर सकता है। अतः यदि कोई भी पक्ष स्वस्थ औद्योगिक संबंधों की स्थापना में बाधा उत्पन्न करता है तो उसके प्रति सत्याग्रह उपभोक्ता सहित सम्पूर्ण समाज का भी दायित्व स्वयमेव हो जाता है। इस उत्तरदायित्व को प्रकट करते हुए वह कहते हैं.
श्रम द्वारा तैयार की गई वस्तुओं को खरीदने और इनका इस्तेमाल करना पापयुक्त है।" (यग इंडिया, 13/10/1921 पु. 325)
न्यासिता केवल व्यक्तिगत परितर्बन पर ही निर्भर नहीं है। यह उत्पादन की प्रक्रिया में परिवर्तन करता है, उसे स्वदेशी और लोगों के द्वारा वृहद उत्पादन में तब्दील करता है। बुनियादी जरूरतों को • प्राथमिकता देते हुए उत्पादन करता है। उत्पादन में धनिक और श्रमिक एक समान आजीविका पाते हैं। यह न्यायोचित वितरण की बात करता है। स्वामित्व एक सामूहिक स्वामित्व को स्थापित करता है। आवश्यकता होने पर राज्य का हस्तक्षेप भी स्वीकार करता है।
गाँधीजी का प्रारंभ से ही विचार था कि पूँजीपति स्वेच्छापूर्वक न्यासिता को स्वीकार कर लें परंतु ऐसा न किए जाने पर वह राज्य के हस्तक्षेप को स्वीकार करते हैं। वह राज्य द्वारा कानून बनाकर न्यासिता कार्यक्रम को लागू करना प्रस्तावित करते हैं। वह कहते हैं
'मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी अगर लोग न्यासी के रूप में आचरण करें, लेकिन यदि वह ऐसा नहीं कर पाते तो हमें राज्य के जरिए न्यूनतम हिंसा का प्रयोग करते हुए उन्हें उन की सम्पत्ति से वंचित करना होगा। इसीलिए मैंने गोलमेज सम्मेलन में कहा था कि प्रत्येक व्यस्त हित की जांच पड़ताल की जानी चाहिए और जहाँ आवश्यक हो, राज्य सात्करण के आदेश दिये जाएं। जिनकी सम्पत्ति का राज्यकरण करना हो, उन्हें मुआवजा दिया जाये या नहीं, इसका निर्णय हर मामले की तफसील पर गौर करके किया जाये। मैं व्यक्तिगत रूप से इस बात को तरजीह दूंगा कि राज्य के हाथों में शक्ति के केन्द्रीकरण के बजाय न्यासिता की भावना का विस्तार किया जाए क्योंकि मेरी सम्मति में, निजी स्वामित्व की हिंसा राज्य की हिंसा से कम हानिकारक है। लेकिन अपरिहार्य हो तो मैं न्यूनतम राज्य. स्वामित्व का समर्थन करूंगा।" (द माडर्न रिव्यू, अक्टूबर 1935. पू. 412)
प्रो. नंदकिशोर आचार्य ने इस उद्धरण को व्याख्यायित करते हुए लिखा कि यह द्रष्टव्य है कि राज्य की मदद के बिना उद्योगबाद एवं पूंजीवाद का विकास संभव नहीं है। राज्य द्वारा प्रदान की गयी तमाम सुविधाओं के बलबूते पर ही इनका विकास संभव हो पाता है। अत: राज्य अगर हिंसा न भी करे और केवल इनके साथ असहयोग करे तब भी पूंजीपतियों को न्यासिता सिद्धांत को मानना होगा। यह हिंसा नहीं होगी क्योंकि पूँजीपति हिंसा में राज्य का सहयोग लेने के नैतिक अधिकारी नहीं है। इस प्रकार प्रो. आचार्य के अनुसार गाँधीजी राज्य को एक सत्याग्रही राज्य होने को कहते हैं(1995:60)।
ट्रस्टीशिप सूत्र
न्यासिता सिद्धांत अपने मूल में जिन विचारों को समाहित करता है उसे न्यासिता सूत्र के जरिए समझा जा सकता है जिसे गांधीजी ने कुछ संशोधनों के साथ स्वीकृत कर दिया था.
1. न्यासिता समाज की वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था को समतावादी व्यवस्था में रूपान्तरित करने का एक साधन है। न्यासिता पुँजीवादको बख्ती नहीं है, पर वह वर्तमान मालिक वर्ग को
सुधार का एक अवसर प्रदान करती है। यह इस विश्वास पर आधारित है कि मानव प्रकृति कभी सुधार से परे नहीं होती।
2. यह निजी स्वामित्व के किसी अधिकार को नहीं मानती, सिवा उसके जिसकी अनुमति में उपयोग के कानून समाज अपने कल्याण के लिए दे।
3. यह धन सम्पत्ति के स्वामित्व और उपयोग के कानूनी विनियमन की वर्जना नहीं करती।
4. तदनुसार राज्य द्वारा विनियमित न्यासिता के तहत कोई व्यक्ति अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए
अथवा समाज के हितों की अनदेखी करते हुए अपनी सम्पत्ति को धारण करने अथवा उसका इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र नहीं होगा।
5. जिस प्रकार एक समुचित न्यूनतम निर्वाह मजदूरी तय करने का प्रस्ताव है उसी तरह समाज में व्यक्ति की अधिकतम आय भी नियत कर देनी चाहिए। न्यूनतम और अधिकतम आयों के बीच जो अंतर हो वह युक्तिसंगत और न्यायोचित हो और उसमें समय-समय पर इस दृष्टि से परिवर्तन किया जाए कि अंततः वह अंत मिट जाए।
6. गादी अर्थव्यवस्था में उत्पादन का स्वरूप व्यक्तिगत सनक या लोभ द्वारा नहीं, बल्कि
सामाजिक आवश्यकता द्वारा निर्धारित होगा। (हरिजन, 25/10/1952, पृ. 301 यह न्यासिता सूत्र पूंजीवाद को सिरे से खारिज करता है। गांधीजी व्यवहार में कुछ बृहद उद्योगों की संभावना भी देखते हैं। लेकिन इन बृहद उद्योगों का स्वामित्व राज्य के जरिए जनता का होगा तथा लोभ के स्थान पर प्रेम को कायम करना उनका उद्देश्य होगा। इसी के साथ गाँधीजी न्यासिता से जुड़े एक अन्य पहलू को भी स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि न्यासी का कोई वारिस नहीं होता जनता ही उसकी वारिस होती है। (हरिजन, 1204/1942, पु. 116) साथ ही यह भी कि न्यासी को अपनी सेवा और समाज के लिए उसके मूल्य को देखते हुए कमीशन मिलेगा जिसकी दर का नियमन राज्य द्वारा किया जाएगा। उनके बच्ची को उनके स्थान पर न्यासी बनने की आज्ञा तभी मिलेगी जबकि वे स्वयं को इसके योग्य सिद्ध कर सकेंगे(हरिजन 31/03/1946, पु. 63-64)। साथ ही गाँधीजी का विचार था कि स्वतंत्र भारत में न्यामिता नीचे से यानि ग्राम पंचायत के स्तर से प्रारंभ होनी चाहिए। इसके लिए जनता के बीच इसका अर्थ ले जाना इसके अनुकूल वातावरण निर्माण करना होगा ताकि यह एक सामूहिक पहल के जरिए स्वेच्छा से कानून रूप में तब्दील हो सके। ऊपर से आरोपित होने पर यह बोझ जैसा महसूस होगा।
आलोचना
गाँधीजी द्वारा प्रस्तुत न्यामिता सिद्धांत आलोचना से परे नहीं है। गाँधीजी के समकालीन एवं परवर्ती विचारकों ने इस सिद्धांत की काफी आलोचना की। इसे एक धोखा और शोषण को बनाए रखने वाले सिद्धांत के रूप में बताया। विभिन्न आलोचनाओं को निम्नानुसार बताया जा सकता है.
1. गाँधीजी ने पूजीपतियों के हृदय परिवर्तन की बात कहकर एक नैतिक क्रांति का आह्वान किया परंतु हकीकत में ऐसी क्रांति नहीं हो सकती और न्यासिता एक ऐसे समाज की कल्पना है जिसमें घनी दानशील हो ताकि गरीब कमजोर रह सके। न्यामिता सिद्धांत बात में क्रांतिकारी है परंतु व्यवहार में रूढ़िवादी है। न्यासिता इतना लचीता सिद्धांत है कि इससे घोर विषमता का भी औचित्य सिद्ध किया जा सकता है।
इस आलोचना के प्रत्युत्तर में कहा जा सकता है कि न्यासिता सूत्र स्पष्ट बताता है कि न्यासिता निजी माल्कियत को सिरे से खारिज करती है अतः जहाँ स्वामित्व की अवधारणा ही अस्वीकृत है वहाँ निजी मिल्कियत के वर्ग का उदय सभव ही नहीं है। यह सिद्धांत रूढ़िवादी इस अर्थ में नहीं है कि प्रत्येक के लिए शरीर-श्रम और बुनियादी जरूरतों की पूर्ति की बात कहकर एक धमाधारित समाज की नींव रखता है। हर वर्ग के व्यक्तियों के कौशल को सामाजिक हित में प्रयुक्त करता है। साथ ही आय की न्यूनतम एवं में अधिकतम सीमा तय करने और उस अंतर को समाप्त करने की वकालत कर विषमता को समाप्त करता है
2. इस सिद्धांत में पूंजीवाद की चारित्रिक विशेषताएँ मौजूद रहती है। उत्पादन संबंधी परिस्थितियाँ कमोबेश पुरानी ही रहती है। इसमें पूंजी का केंद्रीकरण और शोषण बना रहेगा। अर्थव्यवस्था में संपत्तिशालियों के दुर्गुण हृदय या सोच परिवर्तन से दूर नहीं हो सकते हैं।
उपर्युक्त आलोचना में कमी यह है कि वह न्यासिता के इस तर्क को समझ ही नहीं पायी कि न्यासिता का सीधा प्रहार पूंजीवाद पर ही है। यह पूँजीवाद को नकार कर ही अपना कार्य करती है। न्यासिता आधारित व्यवस्था में प्रोडक्शन बाय मासेज (लोगों द्वारा बृहद उत्पादन) है; वितरण में समतामूलक वितरण है; स्वामित्व में सामुदायिक स्वामित्व है निजी स्वामित्व का नकार है. इन विशेषताओं में से सभी पूजाबाद की अस्वीकृति की परिचायक हैं।
3. न्यामिता सिद्धांत बुर्जुआ वर्ग की सहायता करने वाला है। संघर्ष के स्थान पर संवाद पर जोर देकर यह बुर्जुआ वर्ग की सहायता करता है।
इस आलोचना में दो शब्द महत्वपूर्ण हैं- बुर्जुआ वर्ग और संघर्ष गांधीजी के यहाँ संघर्ष नहीं है यह गलत दृष्टि है। वहाँ सक्रिय अहिंसक संघर्ष है जो सत्याग्रह के जरिए अभिव्यक्त होता है और संबाद उसका एक हिस्सा भर है। बुर्जुआ वर्ग के स्थान पर गांधीजी सर्वहारा के पक्ष में ज्यादा खड़े प्रतीत होते हैं। वह भी उत्पादन के साधनों पर (मार्क्सवादी शब्दावली में मिन्स एंड टूल्स ऑफ प्रोडक्शन पर आम जनता का अधिकार चाहते हैं। वह उत्पादन के साधनों, विकेंद्रीकरण एवं समतामूलक वितरण, सामुदायिक स्वामित्व द्वारा (अगर मार्क्सवादी शब्दों में कहें तो) सर्वहारा के साथ खड़े प्रतीत होते हैं। बुर्जुआ वर्ग के साथ वह संवाद करते हैं तो उसे बदलने एवं नैतिक आधार पर प्रश्नांकित करने के लिए। अगर बुर्बुआ वर्ग ऐसा नहीं करता है तो उसे सर्वहारा के सत्याग्रह का सामना करना ही है।
4. गाँधी धनिक वर्ग को क्षति नहीं पहुंचाना चाहते हैं। वह उनके खिलाफ होने वाले आंदोलन के विरुद्ध हैं।
उनमें आर्थिक समानता के प्रति कोई जुनून नहीं है। गांधीजी संपत्ति के उत्पादन व स्वामित्व को प्रश्नांकित करते हुए पूँजीवाद को खत्म करना चाहते हैं। वह धनिक वर्ग को इसलिए समाप्त नहीं करना चाहते हैं कि वह पूँजीवाद की मूल समस्या का एक प्रकटीकरण मात्र है, ऐसा नहीं है और जैसाकि ऐतिहासिक साक्ष्य भी बताते हैं कि पूंजीपतियों के विनाश मात्र से समानता या वाहित लक्ष्य पूरा हो ऐसा आवश्यक नहीं है। गांधीजी पूंजीवाद के प्रति न केवल सैद्धांतिक विरोध दर्ज कराते हैं अपितु अपने विभिन्न रचनात्मक कार्यक्रमों द्वारा उसके विरुद्ध कार्य भी करते हैं। अपने पूरे आर्थिक विचार में वह न्यायपूर्ण आर्थिक समानता के लिए संघर्षरत दिखाई पड़ते हैं।
5. न्यासिता सिद्धांत एक परम्परागत समाज में सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का रोककर उसे आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था में आने में बाधक है। न्यासिता सिद्धांत भी सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन में विश्वास करता है और औद्योगिक व्यवस्था बनाता है परंतु उसकी प्रक्रिया व लक्ष्य भिन्न है। वह मनुष्य एवं उसकी मनुष्यता को बचाए रखते हुए सामाजिक आर्थिक परिवर्तन लाता है। लोगों को समतामूलक वितरण श्रम आधारित समाज, आय की समानता, विकेंद्रीकरण आदि उपलब्ध कराकर क्रांतिकारी परिवर्तन लाता है। न्यासिता में भी औद्योगिक व्यवस्था है परंतु वह शोषण करने वाली नहीं अपितु सहयोगीमूलक है और राज्य नियंत्रण में जिसका उद्देश्य अनियंत्रित मुनाफा कमाना नहीं बल्कि जन कल्याण है।
6. गाँधीजी के मित्र कभी ट्रस्टी नहीं बने पूँजीपति उनके पास अपने उद्देश्यों से आते थे। मगर गाँधीजी किसी भी पूँजीपति का हृदय परिवर्तन नहीं कर सके। हालांकि इस आलोचना का जवाब स्वयं गांधीजी अपने समय में दे चुके थे अगर कोई पूंजीपति न्यासिता को अपनाकर न्यासी नहीं बनता तो यह न्यासिता सिद्धांत की कमी नहीं है बल्कि वह पूँजीपति की सीमा एवं कमजोरी है। इससे न्यासिता सिद्धांत गलत सिद्ध नहीं होता। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है कि एक व्यक्ति अपने जीवन में कभी अहिंसा को एक सिद्धांत जीवन दृष्टि के रूप में स्वीकारता है परंतु उनके द्वारा कोई हिंसा हो जाती है तो यह सिद्ध नहीं होता कि अहिंसा गलत थी बल्कि यह उस व्यक्ति की सीमा थी। न्यासिता के अनुसार पूँजीपतियों का न्यासी न बनना उनकी अपनी कमजोरी है, सिद्धांत की नहीं।
7. पूँजीपतियों को न्यासी बना देना और वंचितों को इस संबंध में कोई चुनाव न देना यथास्थिति स्वीकार करने को कहना एक तरह की जदस्ती है।
गांधीजी न्यासिता द्वारा यथास्थिति में परिवर्तन का प्रस्ताव करते हैं। वे एक ओर पूंजीपतियों को हिंसक क्रांति एवं न्यासिता में किसी एक को चुनने का प्रस्ताव करते हैं वहीं दूसरी ओर श्रमिकों को यह स्पष्ट हिदायत देते है कि "हृदय परिवर्तन का कयामत के दिन तक इंतजार करने की आवश्यकता नहीं है। जिस क्षण उन्हें ऐसा लगे कि पूँजीपति इसके लिए तैयार नहीं है, शोषण को कायम रखना चाहता है श्रमिकों को यह पूरा
अधिकार है कि वे उसके विरुद्ध सत्याग्रह कर दें। राज्य से भी कानून बना कर सम्पत्ति के राज्यसत्करण की बात कहते हैं।
8. एक अल्पकालिक समाधान के रूप में न्यासिता ठीक है। दमन नैतिक रूप से गलत है परंतु समाधान को संपत्तिशालियों के हृदय परिवर्तन पर छोड़ना ज्यादा कारगर नहीं है।
इस आलोचना का संबंध भी न्यासिता को हृदय परिवर्तन का पर्याय मानने का परिणाम है। न्यासिता में केवल हृदय परिवर्तन ही नहीं बल्कि संघर्ष, राज्यसत्करण और उपभोक्ता द्वारा किया गया बहिलकार भी शामिल है। यह एक बेहतर समाज की रचना का दीर्घकालिक उपाय है।
9. यह सिद्धांत पूँजीवाद में वर्ग सत्ता (क्लास पॉवर) की समस्या को दूर नहीं करता। साथ ही यह सामाजिक श्रेणीक्रम को बनाए रखना चाहता है। गाँधीजी प्रथमतः पूँजीवाद के मूल आधारों को ही समाप्त करने पर बल देते हैं। वह वर्ग विभाजन को स्वीकारते हैं परंतु इसमें अनिवार्यतः हिंसक वर्ग संघर्ष को स्वीकार नहीं करते हैं। साथ ही गाँधीजी पूँजीवाद के आधारों अतिरिक्त मूल्य एवं उत्पादन साधनों पर पूँजीपति के अधिकार इन दोनों को परिवर्तित करते हैं अर्थव्यवस्था को स्थानीय और आवश्यकता आधारित बना कर वह विनिमय मूल्य एवं उपयोगिता मूल्य के अंतर को समाप्त करने का प्रयास कर अतिरिक्त मूल्य को ही समाप्त करते हैं और बृहद लोगों द्वारा उत्पादन संभव बनाकर वह उत्पादन के साधनों (मिन्स एंड टूल्स ऑफ प्रोडक्शन) पर आम जनता को अधिकार प्रदान कर उसका (मार्क्सवादी शब्दों में सर्वहाराकरण करते हैं। स्वामित्व परिवर्तन का जिक्र हम कर ही चुके हैं। जहाँ तक बात सामाजिक श्रेणीक्रम को बनाए रखने की तो यह उचित नहीं है क्योंकि न्यासिता सभी को शरीर-श्रम पर आधारित अर्थव्यवस्था का अंग बनाता है। इसमें छुआछूत, अस्पृश्यता के लिए कोई स्थान नहीं है। वह श्रमाधारित समाज को जन्म देता है जो अपने मूल में समतामूलक है।
उपर्युक्त आलोचनाओं एवं उनके प्रत्युत्तरों के तलाशने के बाद हम यह कह सकते हैं कि अधिकांश आलोचनाएं निम्नलिखित दो कारणों से उत्पन्न होती है. न्यासिता सिद्धांत को उसकी सम्पूर्णता में न समझकर उसे हृदय परिवर्तन तक हो सीमित करना।
इसकी अहिंसक प्रणाली सम्पूर्ण विवेचन यह दर्शाता है कि औद्योगिक संबंधों एवं श्रम संपवाद पर गांधीजी ने एक सुव्यवस्थित सिद्धांत प्रस्तुत किया है जो सत्य एवं अहिंसा पर आधारित होने के कारण विशिष्ट है। इसीलिए वह कहते हैं "न्यासिता" का मेरा सिद्धांत कोई कामचलाऊ सिद्धांत नहीं है निश्चित रूप से यह कोई छद्मावरण नहीं है। मुझे पक्का विश्वास है कि अन्य सभी सिद्धांतों का लोप हो जाने के बाद भी यह सिद्धांत जीवित रहेगा।" साथ ही एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए भी वह कहते हैं कि "यूक्लिड की बिंदु की परिभाषा की तरह पूर्ण न्यासिता भी एक अमूर्त विचार है और इसे प्राप्त करना भी उतना ही असभव है। लेकिन अगर हम उसके लिए प्रयास करते रहे तो हम धरती पर समानता स्थापित करने की दिशा में अन्य किसी उपाय की अपेक्षा (न्यासिता के सिद्धांत पर आचरण करके) अधिक प्रगति कर सकते हैं। हरिजन, 16/12/1939, पृ. 376)
यह सिद्धांत अपने सत्य व अहिंसा के आधारों के कारण पूर्ववत मार्क्सवादी एवं पूंजीवादी सिद्धांतों से पृथक हो जाता है। कहीं-न-कहीं इसका मूल आधार मनुष्य एवं उसके प्रयोजन की व्याख्या में निहित है। न्यासिता अहिंसक प्रक्रिया को माध्यम बनाकर स्वामित्व परिवर्तन की पहल करता है जो स्वयं में क्रांतिकारी विचार है।
महात्मा गाँधी का ट्रस्टीशिप सिद्धांत सत्ता सम्पत्ति तथा एकाधिकार के खिलाफ एक प्रकार जनवादी आंदोलन का प्रतीक है। औद्योगिक क्षेत्र में महात्मा गाँधी न तो पूँजीवादी नियंत्रण के पक्ष में है और न तो राज्य नियंत्रण के बहाने नौकरशाही के क्यांकि दोनों का आधार शोषण एवं हिंसा है। गांधीजी का न्यासिता सिद्धांत संपत्ति, मुद्रा, समय और कौशल के प्रति हमारे दृष्टिकोण को बदलता है। गाँधी विचार के विद्वान श्री मन्ननारायण (1973) ने ट्रस्टीशिप विचार की व्याख्या करते हुए इसमें सामाजिक अंकेक्षण (सोशल ऑडिट) की अवधारणा को जोड़ा। प्रो. जे.डी. सेठी के अनुसार न्यासिता के पीछे आधारभूत उद्देश्य एक अहिंसक एवं शोषणयुक्त संपत्ति संबंध बनाना है। यह संपत्ति या स्वामित्व का विरोधी नहीं है। बल्कि सम्पत्ति की उत्पत्ति एवं प्रयोग के तरीकों पर ध्यान केंद्रित करता है। यह आवश्यकता आधारित उत्पादन, समानतापूर्ण वितरण और सामाजिक न्याय पर आश्रित है। फ्रांसिस फ्रैंकल(1978) ने अपनी पुस्तक 'इंडियाज पॉलिटिकल इकानॉमी (1947-1977) में
लिखा कि गाँधी दृष्टि में न्यासिता सिद्धांत अकेला नहीं है रचनात्मक कार्यक्रम उसके साथ संलग्न है। न्यासिता सिद्धांत और रचनात्मक कार्यक्रम आर्थिक व राजनीतिक सत्ता के वितरण के लिए क्रांतिकारी परिणाम प्रस्तुत करते हैं। न्यासिता अभिजात्य वर्ग के औचित्य के आधार में परिवर्तन लाने का कारक है। यह समूल परिवर्तन को बढ़ावा देने वाला है।
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