नर्मदा बचाओ आंदोलन - Narmada Bachao Andolan
नर्मदा बचाओ आंदोलन - Narmada Bachao Andolan
नर्मदा बचाओ आंदोलन भारत में क्रियाशील पर्यावरण आंदोलनों की परिपक्वता का उदाहरण है। यह आंदोलन नर्मदा नदी परियोजना से उभरा है। नर्मदा नदी परियोजना भारत के तीन प्रमुख राज्यों गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र से संबन्धित परियोजना है। सन् 1987 से नर्मदा नदी पर तैयार की जा रही नर्मदा घाटी परियोजना (जिसमें दो महापरियोजनाएं सम्मिलित हैं- प्रथम, गुजरात में सरदार सरोवर परियोजना और द्वितीय, मध्य प्रदेश में नर्मदा सागर परियोजना) सबसे बड़ी इवान बहुउद्देशीय नदी पाटी परियोजना है जो सिवाई, उत्पादन, बिजली, पेयजल आपूर्ति, बढ़ व सूखे की संभावनाओं पर प्रतिबंध लगाने के प्रयोजन से नियोजित है। यह परियोजना तो बहुत ही लाभप्रद प्रतीत होती है परंतु इसके परिणाम भी बहुत ही भयप्रद है। अनुमानतः इस जलाशय में 37,000 हेक्टेयर भूमि जलमग्न हो जाएगी और इस जलमग्न भूमि में 11.000 हेक्टेयर वन सम्मिलित हैं। साथ ही इससे 248 गाँव में निवासरत लगभग एक लाख लोग विस्थापित हो आएंगे।
उपरोक्त भयप्रद परिणामों की प्रतिध्वनि के रूप में सर्वप्रथम स्थानीय लोगों द्वारा इसका विरोध प्रदर्शन किया गया और यह विरोध प्रमुख रूप से पुनर्वास से संबन्धित था। उसके बाद स्थानीय स्वयंसेवी संगठनों द्वारा इसे एक अन आंदोलन के रूप में संगठित किया गया और विस्थापन, पुनर्वास, आजीविका, संस्कृति आदि प्रकार की समस्याओं को उठाया गया। इस परियोजना के विरोध ने अब एक जन आंदोलन के रूप में विकराल रूप धारण कर लिया था। 1980 87 के दौरान जनजातियों के अधिकारों की समर्थक गैर-सरकारी संस्था अक वाहनी के नेता अनिल पटेल ने जनजातिय लोगों के पुर्नवास के अधिकारों को लेकर हाईकोर्ट व सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के परिणामस्वरूप गुजरात सरकार ने दिसम्बर 1987 में एक पुर्नवास नीति की घोषणा की दूसरी ओर 1988 में इस आंदोलन ने औपचारिक रूप से नर्मदा पाटी परियोजना से संबन्धित सभी कार्यों पर रोक की मांग की। इससे लड़ने के लिए लाखों लोग अपने घरों से बाहर निकले और यह प्रतिज्ञ की कि वे वापस घरों में जाने कि अपेक्षा डूब जान पसंद करेंगे। 1989 में मेघा पाटेकर द्वारा लाए गये नर्मदा बचाओ आंदोलन ने सरदार सरोवर परियोजना तथा इससे विस्थापित लोगों के पुर्नवास की नीतियों के क्रियांवयन की कमियों पर प्रकाश डाला। इस आंदोलन के कारण विश्व बैंक ने सरदार सरोवर परियोजना से अपने हाथ खींच लिए और एक हद तक यह आंदोलन सफल रहा। यथा
1. 1993 में मन सरोवर से विश्व बैंक का प्रस्थान
2. 1994-99 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सरोवर बांध की निर्मिति पर प्रतिबंध
3. 1999-2000 में महेश्वर बांध से विदेशी निवेशकों ने अपने हाथ वापस लिए
4. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रभावित लोगों के पुनर्वास का आदेश
5. 2003 में राष्ट्रिय पुनर्वास नीति की स्वीकारोक्ति
6. 2005 में सूचना के अधिकार की प्राप्ति
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