नव सामाजिक आंदोलन - Neo Social Movement
नव सामाजिक आंदोलन - Neo Social Movement
सामाजिक आंदोलनों को लंबे समय से चले आ रहे निरंतर सामूहिक प्रयास के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। सामान्य तौर पर ये ऐसे प्रयत्न होते हैं जो सरकार की नीतियों के विरुद्ध खड़े होते हैं और परिवर्तन के लिए प्रतिबद्ध होते हैं। नव सामाजिक आंदोलन भी परिवर्तन की मांग ही करते हैं परंतु इनमें वे आंदोलन आते हैं जिन मांगों को अभी तक नजरंदाज कर दिया गया था अथवा अत्यंत कम महत्व दिया गया था।
नव सामाजिक आंदोलन के आंदोलन होते हैं जो उत्तर-आधुनिक राजनीति के अंतर्गत आते हैं। इका सरोकार मानवीय जीवन की गुणवत्ता का उत्तरोत्तर विकास करना होता है। ये वे आंदोलन हैं जो मानव जीवन में फैले अन्य के प्रति नवीन चेतना से प्रोत्साहित होकर समकालीन परिदृश्य में उभरकर सामने आए हैं। इन्हें नव सामाजिक आंदोलन का सम्बोधन इसलिए दिया जाता है क्योंकि इनमें पहचान, अस्मिता और स्वायत्ता से जुड़े ऐसे मसलों पर ध्यान केन्द्रित किया गया है जो किसी वर्ग विशेष से संबन्धित मसले नहीं हैं और ये सामाजिक आंदोलन के आधुनिक स्वरूप को दशति हानव सामाजिक आंदोलनों का मूल उद्देश्य केवल राज्य की सत्ता में सुधार करना ही नहीं है अपितु इनके साथ-साथ वैयक्तिक व सामूहिक नैतिकता को भी सुदृढ़ करना है।
मोटे तौर पर, अस्मितापरक आंदोलनों को नव सामाजिक आंदोलन की संज्ञा दी जा सकती है। इन आदोलनों में किसी वर्ग विशेष अथवा किसी समूह विशेष का सरोकार नहीं होता है, यह सामूहिक हित के लिए संचालित होता है। भारत में इन आंदोलनों का आरंभ 70 के दशक से माना जाता है। नव सामाजिक आंदोलनों में पर्यावरणीय आंदोलन, नारीवादी आंदोलन, मानवाधिकार आंदोलन, छात्र आंदोलन आते हैं। 1960-70 के दशक में यूरोपीय व अमेरिकी समाज व्यापक आधार वाले बढ़े आंदोलनों के गवाह रहे हैं जो कि अपनी प्रकृति में मूलतः मानवतावादी, सांस्कृतिक एवं भौतिक बाद से परे की बात करने वाले थे।
इन आंदोलनों के उद्देश्य एवं मूल्य अनिवार्यतः सार्वभौमिक थे। उनके कार्य मनुष्य के सार तत्व को बनाये रखने एवं उन स्थितियों को बनाये रखने वाले थे जो मनुष्य को बेहतर जीवन स्थितियां मुहैया कराने में दे सके। अपने पहले के आंदोलनों से नव सामाजिक आंदोलन इस बात में समान है कि यह भी फैक्ट्रियों में मजदूरी बढ़ाने में आर्थिक अन्याय व शोषण के मुद्दों पर संघर्षरत रहते है।
नव-सामाजिक आंदोलन विविधता बहुलता' का स्वीकार करते हैं। इनका यह बहरूपीपन नस्लवाद विरोध, परमाणुकरण विरोध, निःशस्त्रीकरण, स्त्रीवादी आंदोलन, पर्यावरण वादी आंदोलन, स्थानीयता बाद एवं जाति, नागरिक स्वतंत्रता इत्यादि में प्रकट होता है जो कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता व शांति के मुद्दे है।
वार्तालाप में शामिल हों