इतिहास दर्शन - philosophy of history

इतिहास दर्शन - philosophy of history

मानव बौद्धिक चिन्तन से युक्त प्राणी है इसीलिए यह रचनात्मक भी है। प्रत्येक मनुष्य अपनी रचनात्मकता से समाज को रचनात्मक शक्ति देता रहा है और समाज के सम्पूर्ण प्रगति के आवर्तन में योगदान देता रहा है। मानव इस रचनात्मकता और बौद्धिक विकास की शाश्वत गतिशीलता के कारण मूल्यों की खोज में लगा रहा है। समय के साथ मूल्यों की स्थापना में मानव ने चमत्कारी विकास भी किया। अतः मूल्यों के संयोजन की में आवश्यकता इतिहास लेखन की मूल आवश्यकता है। मानविकी इतिहास मूल्यों के संयोजन के साथ मानक जीवन का बौद्धिक विकास है। मानव की बौद्धिक रचनात्मकता ने बौद्धिक विकास या कि भाषा के विकास के साथ मूल्यों का सतत् विकास किया, जो कभी राजनैतिक, कभी धार्मिक कभी आध्यात्मिक और कभी दार्शनिक तथा कभी सांस्कृतिक कलात्मक और आर्थिक मूल्यों से भी जुड़ा रहा। प्रत्येक युग मूल्यों की स्थापना की चेष्टा में गतिशील होता है। 


जब वह प्रे व्यक्ति समाज में मूल्यों की स्थापना करने में अपने को असफल पाता है, तो वह महापुरुष या महामानव की कल्पना करता है, जो मूल्यों का काल्पनिक चरम बिन्दु होता है। यही आगे के मूल्यों का संरक्षक बनता जाता है। मानव सृजनशीलता और मूल्यों की सतत् खोज के प्रयास में अपने व्यक्तित्व का विस्तार और परिष्कार करता है।


इतिहास बुद्धि की उपज के साथ इतिहासवेता युग ने इतिहास के प्रति भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण को जन्म दिया। इस ऐतिहासिक दृष्टि में 18वीं शताब्दी में इतिहास के साथ दर्शन शब्द जोड़ा हिगेल, एक्टर शा ट्याबनवी, ई.एच. बाय एवं आर.जी कालिंगउड ने इतिहास-दर्शन पर चिन्तन प्रस्तुत किया और इतिहास को मानव जीवन का आवश्यक अध्ययन बना दिया। 'इतिहास दर्शन' शब्द को सर्वप्रथम बोल्लेयर ने 18वीं शताब्दी में खोजा लेकिन वे इसका अर्थ आलोचनात्मक एवं वैज्ञानिक इतिहास से अधिक नहीं समझते थे अट्ठारहवी शताब्दी के अन्तर में, यही नाम हीगेल एवं अन्य लेखकों के द्वारा प्रयोग किया गया।

आचार्य जी कालिगड ने अपनी पुस्तक 'द आइडिया ऑफ हिस्ट्री में इस उपवाक्य को अत्यन्त भिन्न स्तर पर लिया है और उसकी व्याख्या करते हुए उन्होंने दर्शन मनोविज्ञान, जीवविज्ञान और समाजशास्त्र की चर्चा की और इतिहासकार को इस सभी अनुशासनों से सम्पन्न बताया है।


इतिहास को विज्ञान और कला मानने की परम्परा चली इतिहास को विज्ञान से भी आगे की चीज मानने की बात उठी फलतः जीवन के अध्ययन के साथ उसकी उपयोगिता को समझा गया। भारतीय इतिहास रचना संश्लेषणात्मक एवं रही है और आध्यात्मिकता में उसने इतिहास को कता के रूप में प्रस्तुत किया।