अस्पृश्यता निवारण के क्षेत्र में महात्मा गांधी की प्रासंगिकता - Relevance of Mahatma Gandhi in the field of removal of untouchability

अस्पृश्यता निवारण के क्षेत्र में महात्मा गांधी की प्रासंगिकता - Relevance of Mahatma Gandhi in the field of removal of untouchability


महात्मा गांधी अस्पृश्यता निवारण के संदर्भ में सदैव तत्पर रहे। उन्हों ने हरिजनों के साथ सदैव सहानुभूति एवं सक्रियता रखी। ये हुआत के विरोध में कहते है कि यदि मेरा जन्म पुन्न हो तो मैं ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य या शूह के रूप में न हो बल्कि अतिशुद्र के रूप में हो ताकि मैं पूरी तरह को तथा उनको इस दुःखों एवं कष्टों से छुटकारा दिला सकूँगांधी जी अस्पृश्यता के निवारण के तिथे पूरी ताकत के साथ लड़ने की बात करते हैं तथा कहते हैं कि विजय लक्ष्य की प्राप्ति में नहीं, अपितु उसके लिए अथक प्रयास में निहित है। आज भी भारत में जाति प्रथा कायम है और आवश्यकता है कि इसके निवारण के लिए गांधी के विचारों का पालन किया जाये।


लैंगिक असमानता एवं गांधी की प्रासंगिकता महात्मा गांधी औरत को पुरुष के बराबर गोग्य एवं महत्वपूर्ण मानते हैं। कुछ मामलों में तो वह औरत के ममत्व, स्नेह, प्रेम को ज्यादा स्थान देते हैं तथा कहते है कि इन मूल्यों का संरक्षण औरत ही करती एवं मानवता को संबर्द्धित करती हैं। वे कहते हैं कि औरत को खुद की आवरू के रक्षण के लिए ताकतवर नहीं चारित्रिक निर्मल बनना होगा। क्योंकि जो स्त्री ताकतके बल पर खुद की रक्षा करती है ताकत के खत्म होने पर वह परास्त हो जायेगीपर चारित्रिक निर्मलता के सामने सभी लोग शुक जायेंगे औरत एवं पुरूष को मानवता के विकास में समान महत्त्व देकर नैर्गिक समानता को गांधी जी प्रासंगिक बनाते है।