अहिंसा की वैज्ञानिक अवधारणा - Scientific Concept of Nonviolence
अहिंसा की वैज्ञानिक अवधारणा - Scientific Concept of Nonviolence
इस प्रकार गांधी जी के लिए सत्य और अहिंसा में कोई भेद नहीं है। उनके शब्दों में अपने विशुद्धतम रूप में अहिंसा का अर्थ है अधिकतम प्रेमा गांधी के सत्याग्रह संबंधी विचार को समझने से पूर्व यह आवश्यक है कि उनके अहिंसा संबंधी विचार पर दृष्टिगत कर लिया जाए। इसका कारण है कि गांधी के लिए अहिंसा न केवल एक धार्मिक तर्क है अपितु एक वैज्ञानिक एवं ऐतिहासिक तर्क भी है। गांधीजी के लिए धर्म से तात्पर्य किसी औपचारिक अथवा संप्रदायगत धर्म से नहीं है वरन समस्त धर्मों के मूल में जो धर्म है, उससे है। गांधीजी हिन्दू धर्म इस्लाम धर्म, जैन धर्म आदि में अहिंसा को सभी धर्मों के अनिवार्य तत्व के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
अहिंसा को वैज्ञानिक सिद्धांत की भांति प्रस्तुत करते हुए गांधी विज्ञान के संसजक बल, "अधिकेन्द्री बलव गुरुत्वाकर्षण बल सिद्धान्तोंको मानव जीवन व इतिहास में प्रेम के अस्तित्वगत नियम के रूप में स्थापित करते है।
"वैज्ञानिक बताते है कि जिन अणुओं से मिलकर हमारी पृथ्वी की रचना हुई है उनके बीच यदि संसंजक बल या संसक्तिशाल बल विद्यमान न हो तो पृथ्वी खंड-खंड हो जायेगी और हमारा अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, और जिन प्रकार पदार्थों में संसंजक बल है उसी प्रकार सभी चेतना पदार्थों में भी यह बल उपस्थित होना चाहिए और चेतन पदार्थों में इस संसंक्तिशील बल का नाम है 'प्रेम', हमें इसके दर्शन पिता-पुत्र में, भाई-बहन में, मित्र-मित्र में होते हैं। लेकिन हमें समस्त जगत के बीच इस बत के प्रयोग का अभ्यास डालना चाहिए.
इसी प्रयोग में हमारा ईश्वर का ज्ञान निहीत है। जहां प्रेम है वही जीवन है पूणा विनाश की ओर से जाती। है। मेरा मानना है कि मानवजाति की ऊर्जा का कुल योग हमारे अपकर्ष के लिए नहीं बल्कि हमारे उत्कर्ष के लिए है और यह प्रेम के नियम अचेतन किंतु निश्चित प्रवर्तन का परिणाम है। मात्र यह तथ्य कि मानवजाति का अस्तित्व बरकरार है इस बात का प्रमाण है कि संसक्तिशील बल विच्छेदक बल से अधिक शक्तिशाली है; अभिकेन्द्री बल से बढ़कर है।"
जिस प्रकार गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से बंध कर अपनी कक्षा में स्थित है उसी प्रकार सारा समाज अहिंसा के सूत्र से बंधा है। लेकिन जब गुरुत्वाकर्षण के नियम की खोज हुई तो इस खोज के अनेक ऐसे परिणाम सामने आये जिन का ज्ञान हमारे पूर्वजों को नहीं था। इसी प्रकार जब समाज की रचना सोच-समझकर अहिंसा के नियमानुसार की जाएगी तो उआ की संरचना की भौतिक विशिष्टताएं जैसी आज है, उन से भिन्न होगी।" गांधी जी अहिंसा को ऐतिहासिक आधार पर भी पुष्ट करने की कोशिश करते हैं। उनके अनुसार अब तक के इतिहास को देखने की दृष्टि अगर परिवर्तित की जाए तो अहिंसा एक मूल्य के तौर पर हमारे सामने आता है।
अहिंसा मानवीय अनुभव और इतिहास से समर्पित हैं। आधुनिक सभ्यता की इतिहास दृष्टि को स्पष्ट तौर प्रस्तुतकरते हैं जहां वह आधुनिक सभ्यता से प्रेरित इतिहास को मानते हैं। आगे वह कहते हैं कि लगातार युद्धों, संघर्ष, हिंसा के बाद भी संसार टिका हुआ है यह अहिंसा के कारण ही संभव है।
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