महात्मा गांधी के अहिंसक संघर्ष में कष्ट सहने की प्रवृत्ति - The tendency to suffer in the non-violent struggle of Mahatma Gandhi

महात्मा गांधी के अहिंसक संघर्ष में कष्ट सहने की प्रवृत्ति - The tendency to suffer in the non-violent struggle of Mahatma Gandhi

अहिंसक संघर्ष गांधी की दृष्टि में केवल हिंसा के माहौल में ही किया जा सकता है। हिंसा तत्पर होती है तो अहिंसा हिंसाके सुरसामयी मुख को भर देता है। हिंसा दूसरों को कष्ट देती है तो अहिंसा खुद को कष्ट देती है। विरोधी के अत्याचार का विरोध अहिंसक तरीके से करते समय अपने अंदर कष्ट सहने की क्षमता एवं साहस होने की आवश्यकता होती है। इस तरह अहिंसा एक योग है जो अपनी आत्मा को शोधित करने का रास्ता बतलाती है। इसे खुद से आत्मा के शोध का आधार भी माना जा सकता है। इस तरह से अहिंसा का पुजारी खुद के साथ हिंसा तो कर सकता है पर औरों से हिंसा नहीं कर सकता है। अहिंसक संघर्ष आत्मिक प्रतिरोध: महात्मा गांधी जी अहिंसा का आत्मशुद्धि का साधन मानते थी। अहिंसा दोहरा वरदान के प्रति यह अनुशीलत करने वाले को आत्मासिद्धी के प्राप्ति में सहयोग देती है साथ- साथ विरोधियों के व्यवहार में बदलाव करके न्याय की व्यवस्था करती है। मनुष्य की दो शरीर है। स्थूल शरीर एवं सूक्ष्म शरीर के चारों तरफ अनेक प्रकार के संस्कार पाये जाते हैं। ये संस्कार ही अपने प्रकृति के अनुसार व्यक्ति को विविध कमों में क्रियाशील करते हैं। जब संस्कार तामसी प्रवृत्ति के होते हैं तो व्यक्ति के लिए अनेक प्रकार की दिक्कते आती है। वह हिंसात्मक कार्य में सलिप्त होता है। अहिंसा के पक्ष पर चलकर इन संस्कारों को खत्म करके आत्मकिक प्रतिरोध किया जा सकता है।