सत्य : अर्थ एवं परिभाषा - Truth : Meaning and Definition

सत्य : अर्थ एवं परिभाषा - Truth : Meaning and Definition

सत्य की अवधारणा गांधीय विमर्श का मूल तत्व है। सत्य के साथ प्रयोग गांधी के जीवन का मूल ध्येय है। उनके समस्त चिंतन का स्रोत सत्य की अवधारणा है। दार्शनिक प्रत्ययों से अलग उन्होंने सत्य के व्यावहारिक एवं दैनदिन आयाम को प्रकट करने में ज्यादा रूचि दिखाई। हालांकि उनके सत्य की अवधारणा में दार्शनिक पुट भी मिलता है। सत्य उनके लिए एक जीवन शैली के रूप में था। सत्य वस्तुत: अपने अस्तित्व एवं उसे परिभाषित करने की खोज कही जा सकती है। इसलिए उन्हें अपने जीवन को सत्य के प्रयोग के रूप में अभिव्यक्त किया और सत्य की इसी खोज से सत्याग्रह, स्वदेशी बुनियादी तालीम, ट्रस्टीशिप जैसे सिद्धांत उत्पन्न हुए।

गांधी जी के लिए दो शब्द बहुत महत्वपूर्ण है- 'सत्य' एवं अहिंसा अथवा प्रेम'


गांधी जी के अनुसार “सत्य सर्वोच्च सिद्धांत है, जिसमें अन्य अनेक सिद्धांत समाविष्ट है। यह सत्य केवल वाणी का सत्य नहीं है अपितु विचार का भी है.. आगे वह कहते हैं कि सत्य प्रत्येक मनुष्य हृदय में वास करता है और मनुष्य को इसे वहीं खोजना चाहिए, सत्य जिसे जैसा दिखाई दे वह उसी से निर्देशित हो। लेकिन किसी को यह अधिकार नहीं है कि वह सत्य का जिस रूप में दर्शन करता है, उसके अनुसार चलने के लिए दूसरे लोगों पर जोर जबरदस्ती करें।


साधारण शब्दों में कहें तो अस्तित्व का नियम ही सत्य है। गांधी जी हमेशा इस बात पर जोर देते है कि चूंकि निरपेक्ष सत्य को जानना कठिन है? अतः जिस सापेक्ष सत्य को जानते है उसी के अनुसार आचरण करें। यहाँ कुछ आलोचक यह प्रश्न उठातेहै कि गांधीजी का यह कथन अस्पष्ट है क्योंकि यदि समाज में हर व्यक्ति अपने सत्य पर बना रहे तो अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। इस आलोचना पर विचार करने से लगता है कि यह कथन को आधा-अधूरा समझना है। गांधी के सत्य की अवधारणा में अपृथक रूप से अवधारणा जुड़ी है वह है- अहिंसा। यहां अहिंसा का तात्पर्य है कि सत्य को जानने और मानने का सबको अधिकार है परंतु मनवाने का अधिकार नहीं है।

गांधी जी के लिए सत्य एवं अहिसा अभेद रूप से जुड़े हुए हैं। उनके शब्दों में :


अहिंसा के बिना सत्य का शोध और उसकी प्राप्ति असंभव है। अहिंसा और सत्य एक दूसरे से इस प्रकार गुथे हुए है कि उन्हें पृथक करना प्राय: असंभव है। वे सिक्के, बल्कि कहिए की धातु की चिकनी और बिना छाप वाली चक्रिका के दो पहलू है। कौन बता सकता है कि सीधा पहलू कौन सा है और उल्टा कौन-सा ? फिर भी अहिंसा साधन है और सत्य साध्य है। साधन वही है जो हमारी पहुंच के भीतर हो और इस प्रकार अहिंसा हमारा सर्वोपरि कर्तव्य है। यदि हम साधन को ठी रखें तो देर सवेर साध्य तक पहुंच ही जाएंगे। एक बार इस मुद्दे को समझ जाएं तो अंतिम विजय असंदिग्ध है।"


आगे वे कहते हैं कि लेकिन मानवीय संबंधों में सत्य की सिद्धि का सिवा इसके और कोई साधन नहीं है कि हम अहिंसा का व्यवहार करें अहिंसा का दृढ़ता के साथ आचरण अनिवार्यत हमें सत्य तक ले जाता है जो हिंसा के व्यवहार से संभव नहीं है। इसीलिए अहिंसा पर मेरा दृढ विश्वास है। सत्य मेरे पास स्वभावतः आया। अहिंसा को मैंने संघर्ष करके अर्जित किया। लेकिन अहिंसा चूंकि साधन है, इसलिए स्वभावतः अपने दैनदिन जीवन में हमारा उससे सरोकार ज्यादा है। इसलिए हमारी जनता को अहिंसा की शिक्षा देना आवश्यक है। तदुपरांत सत्य की शिक्षा उसके स्वाभाविक परिणाम के रूप में आएगी।