सत्याग्रह के प्रकार - Types of Satyagraha
सत्याग्रह के प्रकार - Types of Satyagraha
सत्याग्रह का उपयोग अपने प्रियजनों के प्रति भी हो सकता है और होता है।
गांधीजी सत्याग्रह की अपनी प्रौद्योगिकी के कई व्यवहारिक रूप बताते हैं। जिसमें समझाना असहयोग, सविनय अवज्ञा, हड़ताल काराबंदी, उपवास आदि है।
1. समझानाः
अ) विरोधी को समझाकर समाधान भाव से काम करने का प्रयत्न करना सत्याग्रही का पहला तक्ष्य और सत्याग्रही की पहली सीढ़ा है।
ब) इस तरह समझाने का एक भी उपाय वह नहीं छोड़ेगा। इसमें वह अपने धारज और उदारता की पराकाष्ठा दिखायगा। इसके लिए मध्यस्त की भी सहायता ले सकता है। और जिनसे सिद्धांत का भग ना होता है वैसी सभी छूट देने को तैयार रहेगा।
क) समझाने का प्रयत्न निष्फल न हो जाने पर और खास तौर का कदम उठाने का समय आने पर वह विरोधा को आखिर मौका दिये बिना नहीं छोड़ेगा। शांति मैत्री
2. असहयोग :
असहयोग अपने आप में एक सकारात्मक अवधारणा है, चाहे ऊपरी तौर पर यह नकारात्मक हो लगे। असहयोग दोनों पक्षों को न्याय के आधार पर एक पवित्र सहयोग के लिए तैयार करता है। वस्तुतः यह तो "सहयोग की शुरूआत है क्योंकि "असहयोग आंदोलन का उद्देश्य यह है कि पारस्पारिक आदर और विश्वास की बुनियादी पर बिना किसी दबाव के सच्चे तथा प्रतिष्ठापूर्ण सहयोग के लिए रास्ता तैयार किया जाए"
‘वस्तुत:असहयोग जनसाधारण में अपनी गरिमा और शक्ति की भावना जागृत करने का एक प्रयास है। यह तभी संभव है जब उन्हें वह ज्ञान कराया जाए कि यदि वे अपनी अंतरात्मा को पहचान सकें तो उन्हें पशुबल से डरने की कोई आवश्यकता नहीं रहेगी।
असहयोग बुराई में अनजाने और अनिच्छापूर्वक भागीदारी करने के विरूद्ध किया गया प्रतिवाद है...बुराई के साथ असहयोग करना उसी प्रकार मनुष्य का कर्तव्य है जिस प्रकार अच्छाई के साथ सहयोग करना।
इस प्रकार असहयोग कोई निष्क्रिय स्थिति नहीं है, यह अत्यंत सक्रिय स्थिति है हिंसक प्रतिरोध या हिंसा से
अधिक सक्रिय निष्क्रिय प्रतिरोध एक गलत संज्ञा है। असहयोग शब्द का प्रयोग मैंने जिस अर्थ में किया है, उसमें इसका अहिंसक होना आवश्यक है और इसीलिए यह न दंडात्मक है और न द्वेष, दुर्भावना अथवा पूणा पर आधारित है।
गांधीजी ने असहयोग को गीता, कुरान, जेन्दअवेस्ता, बाइबिल के उदाहरण देकर असहयोग को नैतिक के साथ-साथ धर्मसम्मत भी बताया है।
असहयोग की सफलता की शर्तें बताते हुए गांधीजी ने तीन प्रमुख बातें कही "सफलता तभी संभव है जब पूरी समझ के साथ समवेत रूप से मिलकर असहयोग किया जाए। इसके लिए तीन बातें आवश्यक है- आदेश के अनुसार चलना, शांति और धैर्य तथा हिंसा से सदा दूर रहना इसके अलावा सत्याग्रह के सारे नियम भी इस पर लागू होते हैं। सत्याग्रह में रचनात्मक कार्यक्रम अनिवार्य रूप से शामिल है। असहयोग आंदोलन की शुरूआत करते समय भी गांधीजी असहयोग को निर्धारित कर वैकल्पिक व्यवस्था भी प्रस्तुत करते हैं। यहां ध्यान में रखना चाहिए कि सत्य और अहिंसा असहयोग आदोलन की बुनियाद है यही कारण था कि 1927 में चौरी-चौरा कांड के बाद जब असहयोग आंदोलन हिंसक हो गया तब गांधीजी ने उसे तत्काल स्थगित कर दिया। हिंसा की किसी भी सूक्ष्म स्तर तक की स्वीकृति गांधीजीको अस्वीकार थी क्योंकि वह सत्याग्रह की मूलभावना के ही विरूद्ध थी।
एक बार सूक्ष्म स्तर पर हिंसा की स्वीकृति बाद की कई हिंसक पटनाओं की स्वीकृति के लिए द्वार खोल सकती है अतएव यह अस्वीकार्य हुई। गांधी जी के अनुसार असहयोग हिंसा करना नहीं अपितु आत्मा त्याग और बलिदान करने के लिये आत्म संयम का दूसरा नाम है।"
3. सविनय अवज्ञा
गांधीजी के अनुसार सविनय अवज्ञा वैधानिक आंदोलन का विशुद्धतम रूप है। अनैतिक वैध कानूनों को शिष्ट रूप में भंग करना सविनय अवज्ञा है। सविनय अवज्ञा सभी मानी जा सकती है। जब वह वह सच्चे हृदय से की जाये।
- आदरभाव लिये हो।
संयमित हो।
कभी उद्धत रूप ग्रहण न करे। सुस्थापित सिद्धांतों पर आधारित हो।
स्वेच्छाचारिता के दोष से मुक्त हो। -उसके पीछे कोई द्वेष या घृणा की भावना ना हो।
पूर्व शर्त :
सविनय अवज्ञा के लिए पहली पूर्व शर्त यह है कि उसमें भाग लेने वाले की ओर से हिंसा शुरू न की जाये इसकी पक्की गारंटी हो। हिंसा भड़क उठने पर यह करना बेईमानी होगा वह राज्य अथवा सविनय प्रतिरोधकारियों के विरुद्ध अन्य तत्वों द्वारा प्रेरित थी।
यहां गांधीजी स्पष्ट रूप से एक बात बताते है कि सविनय अवज्ञा हिंसाके वातावरण में प्रगति नहीं कर सकता। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि सत्याग्रही के पास अब कोई उपाय शेष नहीं है। उसे सविनय अवज्ञा के अलावा अन्य उपाय ढूंढने होंगे।
स्वरूप:
गांधीजी सत्याग्रह को मूल रूप से धर्म से जोड़ते है इसलिये वह धर्म युद्ध का नाम देते हैं। उनके अनुसार धर्मयुद्ध जिसमें न कोई बातें गोपनीय रखने की होती है और न जिसमें धूर्तता तथा असल्य के लिए कोई स्थान नहीं होता।"
सविनय अवज्ञा दो तरह की हो सकती है। किसी विशेष अन्यायकारी हुक्म या कानून की, केवल उसी हुक्म या कानून को रद्द कराने भर के लिए और सहयोग के ही खास कदम की भांति, अन्याय अधर्म किये अथवा निर्दोष या तटस्थ जनता को अनुचित असुविधा पहुंचाये बिना तोड़े जा सकनेवाले, आमतौर से तमाम कानूनों की है।
यहां ध्यान देने की बात है कि गांधी जी सविनय अवज्ञा व अपराधिक (क्रिमिनल) अवज्ञा में भेद करते हैं उनके शब्दों में -
"अपराधिक कानून-भंजक कानून को गोपनीय रूप से तोड़ता है और दण्ड से अपने को दूर रखने की चेष्ठा करता है। सविनय प्रतिरोधी ऐसा नहीं करता। जिस राज्य में वह रहता है उसके कानूनों को वह सदा दण्ड-भव के कारण नहीं, बल्कि इसलिए मानता है कि वह उन्हें समाज के लिए हितकारी समझता है। परन्तु कभी-कभी ऐसे अवसर भी आ जाते है, यद्यपि ये बहुत ही कम होते हैं, जब वह कुछ कानुनों को इतना अन्यापूर्ण समझता है कि उसका पालन उसे अपमान जनक मालूक पड़ता है। तब वह खुलेआम किन्तु विनीत भाव से उनका भग करता है और आके लिए प्राप्त दण्ड को शांतिपूर्वक सहन करता है।
सविनय के शब्द में ही इसका मूल अर्थ समाहित है जो अहिंसा से अविभाज्य रूप से जुड़ा हुआ है। इसके
साथ गांधी आक्रामक रक्षात्मक सविनय अवज्ञा की बात करते हैं. "आक्रामक, आग्रही सविनय अवज्ञा अधिक होती है। यह किसी कानून की स्वैच्छिक अवज्ञा है। इस अवज्ञा में कोई नैतिक अथमता नहीं है और यह राज्य के विरुद्ध विद्रोह के प्रतीक रूप में की जाती है। इस प्रकार किसी राज्य की सुविधा के लिए निर्मित राजस्व या वैयक्तिक आचरण को नियंत्रित करने वाले कानून यद्यपि
ऐसे कानून स्वयं कोई कठिनाई नहीं उत्पन्न करते और उनके परिवर्तन की जरूरत नहीं की अवज्ञा आग्रहो और आक्रामण अवज्ञा होगी।"
दूसरी और रक्षात्मक सविनय अवज्ञा, ऐसे कानूनों की, जो स्वयं में बुरे है और जिनका पालन मानव प्रतिष्ठा
और आत्मविश्वास से मेल नहीं खाता, अनैच्छिक या हिचक के साथ अवज्ञा है। इस प्रकार शांतिपूर्ण उद्देश्य के लिए स्वयंसेवक दल गठित करना, ऐसे ही उद्देश्य से जनसभाएं करना, निषेधाज्ञा के बावजूद ऐसे लेखों को प्रकाशित करना जो हिंसा को समर्थन प्रोत्साहन नहीं देते रक्षात्मक सविनय अवज्ञा है। और शांतिपूर्ण धरना भी ऐसा ही है जो कि जनता को उन चीजों अथवा संस्था से विरत रखता है, जिसके विरूद्ध धरना दिया जाता है।
असहयोग की तरह सविनय अवज्ञा को भी गांधी रचनात्मक कार्यक्रम से जोड़ते है। उनके अनुसार वह
सविनय भंग, जिसके पीछे रचनात्मक प्रयत्न का बल न हो, न तो सविनय है, न अहिंसक सविनय अवज्ञाके बारे में गांधीजी का कहना था कि 'सविनय अवज्ञा तभी मानी जा सकती है जब वह सच्चे हृदय से की जाए आदरभाव लिए हो, संयमित हो, कभी उद्धत रूप ग्रहण न करें, सुस्थापित सिद्धांतो पर आधारित हो, स्वेच्छारिता के दोष से मुक्त हो और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसके पीछे कोई द्वेष या पूणा की भावना न हो।
गांधीजी सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा में भी अंतर को स्पष्ट करते हैं। सभी सविनय अवज्ञा सत्याग्रह का एक अंश होती है, मगर सभी सत्याग्रह तो सविनय अवज्ञा नहीं है।
साथ ही असहयोग व सविनय अवज्ञा के अंतर को भी समझना होगा। सविनय अवज्ञा और असहयोग मूलत: एक ही भावना से अनुप्राणित है फर्क बस इतना है कि सविनय अवज्ञा का संबंध किसी भी अनुचित कानून को मानने से इनकार करता है जबकि असहयोग किसी भी अन्यायपूर्ण वृत्ति या व्यवस्था के साथ सहयोग करने से मना करना है। इसलिए सविनय अवज्ञा के विरुद्ध प्रतिकार है जबकि असहयोग राजकीय अथवा गैर राजकीय किसी भी प्रकार के अनौचित्य का विरोध अहिंसा दोनों में ही मूल शर्त है।
4. उपवास:
गांधीजी उपवास पर चर्चा करते हुए इसे सत्याग्रह का एक शक्तिशाली अस्त्र बताते है साथ स्पष्ट करते हैं कि इसका प्रयोग हर कोई नहीं कर सकता। उनके शब्दों में उपवास करने की शारीरिक क्षमता से ही उसकी पात्रता निर्धारित नहीं की जा सकती। ईश्वर में जागृत आस्था के बिना इसका कोई उपयोग नहीं है। यह एक यांत्रिक प्रयास अथवा मात्र अनुकरण के रूप में कभी नहीं किया जाना चाहिए। उपवास की प्रेरणा व्यक्ति की आत्मा गहराई से आनी चाहिए इसलिए उपवास सदा एक विरल घटना होती है।
विशुद्ध उपवास में स्वार्थ, क्रोध, आस्थाहीनता अथवा अधैर्य का कोई स्थान नहीं हो सकता .. उसमें असीम धैर्य, दृढ संकल्प, उद्देश्य के प्रति अडिग निष्ठा, पूर्ण शांति तथा का अभाव होना परम आवश्यक है। लेकिन चूंकि मनुष्य के लिए इन सभी गुणों का तत्काल विकास कर पाना संभव नहीं है, इसलिए जिसने अहिंसा के नियमों के पालन का व्रत न लिया हो, उस सत्याग्रही को उपवास पर नहीं बैठना चाहिये। उपवास विशुद्ध सत्य तथा अहिंसा पर आधारित हो चाहिए।
यहां पर गांधीजी उपवास और आमरण उपवास में अंतर करते हुए कहते है कि आमरण उपवास सत्याग्रह के शस्त्रागार का अंतिम एवं सबसे शक्तिशाली शस्त्र है। यह एक पवित्र शस्त्र है। इस इसके संपूर्ण निहितार्थ के साथ स्वीकार करना चाहिए। महत्वपूर्ण स्वयं उपवास नहीं है, बल्कि उसका निहितार्थ
गांधीजी उपवास को एक शक्तिशाली चीज समझते थे और चाहते थे कि इसे यांत्रिक तरीके से नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार अनाडीपन के साथ करने पर यह खतरनाक साबित हो सकता है। इसके लिए पूर्ण आत्म-शुद्धीकरण की आवश्यकता होती है उससे भी कहीं ज्यादा आत्मशुद्धिकरण की जो केवल मन में ही प्रतिकार की भावना लेकर मौत का सामना करने के लिए चाहिए। पूर्ण बलिदान का एक ही ऐसा कृत्य समूची दुनिया के लिए काफी होगा। अक्सर कई आलोचक गांधीजी की आलोचना इस बात के लिए करते है की वह उपवास का प्रयोग दबाब की भांति करते थे और यह हिंसा है। यहां पर यह देखना जरूरी है सत्याग्रही के तौर पर गांधीजी ने हमेशा अन्याय के विरूद्ध हो इसका उपयोग किया या फिर अपनी आत्मशुद्धी के लिए।
गांधीजी स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि अगर विपक्षी को सत्याग्रह अनुचित मुद्दों को लेकर लगे तो कभी भी उसे उपवास की परवाह नहीं करनी चाहिए, भले ही इसके फलस्वरूप उपवास पर बैठे व्यक्ति की मृत्यु हो जाए। उनके शब्दों में अगर लोग ऐसे उपवासों की अपेक्षा करने की आदत डाल लें तो उनकी राय में, निकृष्ट उद्देश्यों को लेकर किए गए हैं, तो ऐसे उपवासों से जोर जबर्दस्ती और अनुचित प्रभाव का कलंक दूर हो जाएगा। अन्य सभी मानव संस्थाओं की तरह, उपवास जायज और नाजायज, दोनों प्रकार का हो सकता है" यदि कोई व्यक्ति, चाहे वह कितना ही जनप्रिय तथा महान हो, किसी अनुचित मुद्दे को उठाता है और इस अनौचित्य की रक्षा के लिए उपचास करता है तो यह उसके मित्रों, सहयोगियों और संबंधियों (जिनमें में अपनी गिनती भी करता हूँ।) का कर्तव्य है कि उसकी प्राणरक्षा के लिए अनुचित मुद्दे को मनवाने की अपेक्षा उसे मर जाने दें। उद्देश्य अनुचित हो तो शुद्ध से शुद्ध साधन भी अशुद्धबन जाते है। -से धरना
गांधीजी धरने का उद्देश्य नैतिक व आर्थिक सुधार मानते थे। उनकी नजरों में इसका राजनैतिक परिणाम एक गौण तत्व है। अतः इस प्रकाश में निम्न नियमों का उल्लेख किया।
1. दूकानों पर धरना देने में आपका ध्यान खरीदने वाले से जुड़ना चाहिए।
2. आपको कभी भी क्रेता या विक्रेता के प्रति असभ्य नहीं होना चाहिए।
3. आपको भीड आकर्षित नहीं करनी चाहिए या घेरा नहीं बनाना चाहिए।
4. आपका प्रयत्न मौन प्रयत्न होना चाहिए। -
5. आपको क्रेत या विक्रेता को अपनी सज्जनता से जीतना है, संख्या के भय से नहीं।
6. आपको यातयात में बाधा नहीं डालनी चाहिए।
7. आपको हाय-हाय नहीं चिल्लाना चाहिए या शमनिवाले अन्य उद्गार नहीं प्रकट करने चाहिए।
8. आपको प्रत्येक क्रेता की जानकारी होनी चाहिए तथा उसका पता, व्यववसाय आदि जानना चाहिए।
आपको उसके घर और हृदय में प्रवेश पाना चाहिए।
9. आपको बता और विक्रेता की कठिनाइयों का समझना चाहिए और जहा आप स्वयं उनको दूर न कर सकें, आपको अपने से बड़े कार्यकर्ता को इसकी सूचना देनी चाहिए।
10. अगर आप विदेशी वस्त्र की दुकान पर धरना दे रहे है तो आपको थोड़ी खादी या उसकी नमूना पुस्तिका राना चाहिए, जिसमें दाम लिखे हो। आपको पास का खादी भण्डार जानना चाहिए, जहा आप खरीदार को ले जा सकते है। यदि खरीदार खादी नहीं खरीदना चाहता और मिल के कपड़े पर जार देता है, तो आपको उसे दशा मिल बस्व दुकान देनी चाहिए।
11. आपको खरीदारों में बाटने के लिए अपने पास सम्बद्ध साहित्य रखना चाहिए।
12. आपको मैजिक लालटेन और भजन-दल के साथ या उनके बिना बुलूस या सभा का गठन करना चाहिए अथवा उसमें शामिल होना चाहिए।
13. आपको दिन भर के काम की एक सही डायरी रखनी चाहिए।
14. यदि आपको अपने प्रयत्न असफल होते लगे, तो निराश न हो किन्तु कारण और प्रभाव के सार्वभौम नियम पर भरोसा रखें और आश्वत रहे कि अच्छे विचार, बचन या कार्य निरर्थक नहीं जा सकते।
यहां स्पष्ट है कि गांधीजी सत्याग्रह कि प्रविधि काकितना विस्तार से वर्णन करते हैं। सत्याग्रह की विभिन्न प्रविधियों में बल मुख्यत: अहिंसा को आधार बनाकर कार्य करने पर है। इसके अतिरिक्त गांधीजी में समय समय पर धरने के संबंध में हड़ताल के संबंध में बहिष्कार, पिकेटिंग इत्यादि के संबंध में दिशानिर्देश जारी करते है तथा इन सभी कार्यक्रमों को रचनात्मक कार्यक्रम के साथ जोड़ते है।
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