इतिहास प्रक्रिया में साहित्य का मूल्य-बोध - Values of literature in the process of history

इतिहास प्रक्रिया में साहित्य का मूल्य-बोध - Values of literature in the process of history

मानव जीवन का इतिहास सम्पूर्ण मानव की समस्त उपलब्धियों का इतिहास है जो अपनी व्याख्या और परम्परा के संवहन में सक्रिय है, क्योंकि इतिहासकार, जो इतिहास का विश्लेषण करता है, स्वयं इतिहास का उत्पाद्य होता है। अतः इतिहास को एक प्रवाहमान प्रक्रिया के रूप में स्वीकार करके चला गया है इतिहास अनेक घटित घटनाओं का प्रक्रियाक्रम होते हुए भी मानव की सांस्कृतिक उपलब्धि को परिणति भी देता चलता है। साहित्य भी इन घटित घटनाओं या यथार्थ की सम्वेदना तथा अनुभूति का अनुभव के स्तर पर निर्माण ही है। मानव इतिहास के साथ उसके चिन्तन तथा ज्ञानार्जन का इतिहास जुड़ा हुआ है। इस प्रविधि में कुछ जानना या जानने का प्रयास करना ही इतिहास नहीं हो सकता, क्योंकि समस्त मानव ज्ञान का जब तक निर्वैयक्तीकरण नहीं होता तब तक उस ज्ञान की कोई परम्परा भी नहीं बन पाती। मनुष्य हमेशा अपने विचार को सबका विचार बना देने की कोशिश


ज्ञान की कोई परम्परा भी नहीं बन पाती। मनुष्य हमेशा अपने विचार को सबका विचार बना देने की कोशिश करता रहा है, ताकि वह विभिन्न वस्तुओं एवं जीवन प्रकृति के प्रति होने वाली प्रतिक्रिया को समस्त मानव समाज की प्रतिक्रिया होने की स्थिति तक ला सके। अतः व्यक्ति चेतना की सार्वभौमता के लिए अन्वेषण एवं प्रयास के परिणाम स्वरूप मनुष्य भाषा की खोज कर सका। अतः भाषा के विकास तक पहुंचकर वह एक समर्थ साधन तक पहुँच सका जिससे वह अपने विचार एवं भावों का विनिमय करने में समर्थ हुआ। मनुष्य जो कुछ बिन्तन करता है, उस चिन्तन और अनुभूति का संप्रेषण भी भाषा में ही करता है। अतः भाषा उसका साधन और साध्य दोनों है और साहित्य में भाषा को रूप के स्तर पर ग्रहण किया जाता है वह साहित्य का माध्यम नहीं है। भाषा एक व्यक्ति की चीज भी नहीं अपितु प्रतीकात्मक स्तर पर आद्यन्त रूप में सामाजिक चीज है। अतः भाषा में परम्परा का संवहन करने की अन्तिम शक्ति होती है।


वस्तुतः मानव जीवन का इतिहास आत्यतिक रूप में उसकी भाषा या अभिव्यक्ति की क्षमता का विकास है। भाषा में यह शक्ति भी है कि वह परम्परा का संवहन कर सके साथ ही वह नवीन सम्वेदनों को ग्रहण करके परम्परा में परिवर्तन कर सकने की सामर्थ्य रखती है। विज्ञान, दर्शन, तर्कशास्त्र, धर्मशास्त्र एवं समस्त मानव की विद्याओं की अभिव्यक्ति भाषा में ही सम्भव हुई साहित्य भाषा की संप्रेषणीयता का अन्तिम परिणाम है देवराज अनुसार • "मानवीय विधाएँ मुख्यतः मनुष्यों के न कर्मों और कर्मों के प्रभावों को अध्ययन करती हैं, जिनका स्वयं कर्म करने वाली तथा दूसरे मनुष्यों पर प्रभाव पड़ता है। किन्तु वे विधाएँ कतिपय ऐसी मानवीय स्थितियों का भी विचार करती हैं, जो किसी मनुष्य या मानव-समूह के सचेत संकल्प का परिणाम न होते हुए भी विभिन्न मनुष्यों की पारस्परिक क्रिया प्रतिक्रिया से उत्पन्न होती है और मनुष्यों को प्रभावित करती है दिवराज, संस्कृत का दार्शनिक विवेचन, पृ. 81)


साहित्य भी एक विद्या है, फिर भी मानव जीवन की रचना होने के कारण स्वयं मूल्य भी है। इसमें परम्परा को समाहित करके जीवन को परिष्कृत करने की अपार शक्ति होती है तथा साहित्य के माध्यम से ही समाज में मूल्यों की स्थापना भी होती है और कभी-कभी या प्रायः प्राचीन मूल्य तोड़े भी जाते हैं। समाज में विभिन्न मूल्यों का संश्लिष्ट साहित्य के माध्यम से ही होता रहा है। साहित्य में समस्त सांस्कृतिक मूल्यसमाहित होकर संश्लिष्ट रूप में आते हैं। साहित्य के स्तर तक पहुँच कर भाषा अत्यन्त समर्थ रूप ग्रहण कर लेती है, जिसमें लालित्य बोधीय मूल्य के साथ समस्त मानव मूल्यों का समाहार होता है।


रचनाकार मूल्यों को पकड़ता है, उन्हें मानव जीवन के वर्तमान से जोड़ता है और उनमें उन अपेक्षाओं को भी भरता चलता है, जिनकी समाज की गति और उत्कर्ष एवं परिष्कार हेतु आवश्यकता होती है। साहित्यकार का कार्य मूल्यों को ढोना नहीं अपितु मानव सृष्टि के साथ मूल्यों की ओर बढ़ना है, जिस प्रविधि में कुछ को छोड़ना भी आवश्यक होता है और नए को आत्मसात् करना।

अतः साहित्य अपने अंदर युग युग का इतिहास समेटे हुए है, उसमें मानव जीवन की समस्त उपलब्धियों का संगम है और सम्भावनाएँ भी साहित्य अपने सर्जनात्मक सातत्य में सांस्कृतिक मूल्यों का विकास औरण भी है। साहित्य में चेतना के स्तर पर समस्त युग समाहित होता है तो साहित्य युग निरपेक्ष मूल्यों का संवहन भी करता चलता है इस सन्दर्भ में कि साहित्य का विस्तार मानव-मन के साथ गतिशील होता है। साहित्य समाज से सम्बद्ध है, किन्तु परम्परा निहित होने पर भी नया होने की प्रक्रिया को आत्मसात् करता चलता है। अतः इतिहास की भाँति साहित्य भी गतिशील और लोचदार संस्था है।