युगीन मूल्यों की प्रक्रिया और साहित्य - Values Process and Literature
युगीन मूल्यों की प्रक्रिया और साहित्य - Values Process and Literature
काल एक निरन्तर प्रवाहमान, सूक्ष्म, मनुष्य की गोचरता से परे उसकी पकड़ के बाहर की चीज है। मनुष्य निरन्तर प्रवहणशील की धारा में अपनी सृजनात्मकता का प्रयोग करता चलता है और जो उसने समग्र विकास में सांस्कृतिक उपलब्धि की है, उसे जानना-समझना भी चाहता है। इस जानने के क्रम में वह अतीत का वर्तमान की आँखों से वर्तमान की समृद्धि एवं भविष्य की सम्भावनाओं के क्रम में ही देखता है। उसकी दृष्टि या कि देखने परखने की अपनी सीमा है। अतः वह अनन्त कालखण्डों में ही रुचि विशेष के साथ एक काल सीमा के अं प्रवृत्ति विशेष की प्रधानता को देखता और समझता है और उसे विशेष नाम भी दे डालता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि प्रत्येक युग सटे ईंट की भाँति है अपितु ये तरंगों की भाँति अजस रूप में प्रवाहित है जिसे अवरुद्ध करके मापा नहीं जा सकता है और न उसे परिवर्तित होने से रोका ही जा सकता है। अतः देश-काल के भीतर जब युग का निर्धारण किया जाता है तो निश्चिय ही उसमें मूल्यों का विशेष ध्यान दिया जाता है। समय साथ मानव कर्तुत्व के अन्तर्गत मूल्यों में अन्तर आता रहता है।
अतः मूल्यों की प्रधानता के आधार पर ही युग का निर्धारण होता है, क्योंकि युगीन क्रम में मूल्य परिवर्तित होते रहते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि मूल्य समाप्त हो जाते हैं अपितु उनके औचित्य का दृष्टिकोण बदलता रहता है जो मूल्य आज अत्यन्त आवश्यक एवं चरम मूल्य स्वीकार किए जाते हैं वे ही कल नितान्त रूप से हीन समझे जाते हैं। अतः मूल्य एक द्रव्य या गुण नहीं है अपितु वह एक अवस्था है, जिसकी स्थिति में है या नहीं है का कोई प्रश्न ही नहीं उठता यहाँ तो मात्र औचित्य का सवाल अर्थात् उसे ऐसा होना चाहिए है। मूल्य के स्तर पर नैतिकता का प्रश्न समाहित हो जाता है। यदि सुन्दर शब्द मूल्य के स्तर पर आता है तो वह संज्ञा न होकर सौन्दर्यात्मक मूल्य बन जाता है और तब इसका अर्थ होता है कि सौन्दर्य चरितार्थ है। 1 मानव का कर्तृत्वाभिमान सौन्दर्य को ही कलाओं के माध्यम से चरितार्थ करता है। अतः यह होने की प्रक्रिया औचित्य अनौचित्य का सम्बन्ध है और उसी के अनुसार युग का निर्धारण भी हो जाता है। युग के साथ मूल्यों का और मूल्यों के साथ मानव की सृजनशीलता और धारावाहिकता का अभिन्न सम्बन्ध है।
किसी भी युग के अनुसार उस युग का साहित्य भी होता है या यों कहा जाए कि साहित्य के द्वारा ही के विशेषतः किसी युग की चेतना का निर्धारण किया जा सकता है। किसी युग विशेष में प्रवृत्ति विशेष के इतिहास को निर्धारित करने में निरन्तरता और पृथकता की समस्या बनी रहती है। नलिन विलोचन शर्मा का मानना है, "एक तो तत्ववादी दृष्टिकोण है, जिसके अनुसार युग ऐसी इकाई है जिसकी प्रकृति का उद्भावन करना आवश्यक है और दूसरा सर्वथा भिन्न नामवादी दृष्टिकोण जो मानता है कि कोई भी विचारणीय कालखण्ड विवरण देने के निमित्त शाब्दिक व्यपदेश मात्र है। नामवादी दृष्टिकोण मान लेता है कि युग ऐसी वस्तु पर स्वेच्छाकृत बाह्यरोपण है जो अविच्छिन्न दिशा-रहित वपर्यस्तता है। इसका अर्थ है कि हमारे सामने एक तरफ तो निश्चित पटनाओं की असम्बद्ध श्रंखला रहती है और दूसरी तरफ विशुद्ध रूप से अन्तर्निष्ट व्यपदेश रहते हैं। किसी भी युग में पीढ़ियों, सामाजिक, बौद्धिक और अन्य सांस्कृतिक संस्थानों का धारावाहिक समावेश होता है जिनके सामूहिक परिवर्तन का प्रभाव साहित्यिक परिवर्तन पर पड़ता है।" (नलिन विलोचन शर्मा, वही पृ. 42 ) युग और उसकी परिवर्तन की प्रक्रिया के सन्दर्भ में नलिन विलोचन शर्मा का विचार निम्नवत है, "युग सार्वभौम परिणमन का उपखण्ड मात्र है उसका इतिहास मूल्यों की परिवर्तनीय योजना के प्रसंग में लिखा जा सकता है और यह भी सत्य है कि मूल्यों की ऐसी योजना को इतिहास से ही पाया जा सकता है।
इस प्रकार युग एक कालखण्ड है, जिसमें साहित्यिक स्वरूपों, प्रतिमानों और रूढ़ियों के ऐसे पद्धति विशेष का प्राधान्य हो, जिसके आविर्भाव विस्तार वैविध्य, समन्वय और तिरोभाव निर्धारित किए जा सकें।... का प्रकार का वर्ग नहीं है, बल्कि ऐसे स्वरूपों की एक विशेष प्रणाली से परिभाषित कालखण्ड है, जो ऐतिहासिक प्रक्रिया में कीलित होते हैं और उससे अलग नहीं किए जा सकते... यह स्पष्ट रूप से समझ लेना आवश्यक है कि कोई युग आदर्श प्रकार अथवा अमूर्त संस्थान अथवा वर्ग विभाजन की श्रेणी नहीं है, बल्कि एक ऐसा कालखण्ड है, जिसमें स्वरूपों की एक पूरी पद्धति की प्रधानता रहती है, जिसे कोई भी कलाकृति उसकी सम्पूर्णता में प्राप्त नहीं कर सकती।" (वही, पृ. 45-46) कोई युग ऐतिहासिक तभी हो सकता है जब प्रत्येक घटना समस्त पूर्ववर्ती अतीत की परिणति मानी जाए और उसके प्रभाव समस्त भविष्य में प्रलेखित हो सके।
सुमन राजे ने युग और धारा की प्रक्रिया एवं अध्ययन पद्धति पर विचार करने की बात उठाई है और उसको संक्षेप भागों में बांटा है, साथ ही उन तत्त्वों की ओर भी संकेत किया है, जो युग के अस्तित्व में पृथक् होते हैं। युग के अध्ययन की पद्धति इस प्रकार है।
1. युग की मूल चेतना किस प्रकार निर्धारित की जाए ? प्रत्येक युग में धाराओं की द्वन्द्वात्मक स्थिति होती
है।
• एक धारा हासमान होती है, दूसरी विकासमान, जो चेतना आगे चलकर विकसित होती है। वही युग की मूल चेतना है इतिहास के निर्माण में इसी का योग होता है।
ii. एक समस्या जीवित और जड़ भाषा की है। क्या केवल जीवित भाषा पर ही युग चेतना का प्रभाव पड़ता है या अन्य पर भी ? इसका अध्ययन आवश्यक है। तुलनात्मक अध्ययन के पश्चात् जीवित भाषा को काल का प्रतिनिधि माना जा सकता है।
iii युग के प्रमुख कवियों ने अपने काव्यादर्श को किस रूप में परिभाषित किया है। इससे भी चेतना समझने में सहायता मिल सकती है।
iv. किसी युग विशेष में, किसी कृति में जो परिवर्तन होते हैं, उसका प्रकार युग निर्धारण में सहायता देता है।
V. उस युग के आदर्श एवं अनुकरणार्थ कवि कौन-कौन है?
vi. उन आचार्यों का परिचय प्राप्त करना होगा जिनके बताए कायदे कानून विधि-निषेध और आदर्श इस काल
vii. उन लोकप्रिय किंवदन्तियों का विश्लेषण करना भी आवश्यक हो सकता है जो श्रेष्ठ समझे जाने वाले में स्वीकार किए गए।
कवियों और साहित्यकोश में प्रचलित हो गई थीं।
viii. उस युग में लिखित पूर्ववर्ती रचनाओं की टीका-टिप्पणियों का अध्ययन।
ix. सृजनात्मक समीक्षा के दिशाबोध करने में सहायक हो सकता है। (सुमन राजे, पू. 157)
उन्होंने आगे युग के पृथक् अस्तित्व के प्रमुख घटकों को निम्नलिखित प्रकार से प्रस्तुत किया है के
i. धोड़ा बहुत प्रभाव प्रायः सभी समकालीन धाराओं पर
I. भाषा के परिवर्तन की इकाई
iii वस्तु और रूप दोनों में परिवर्तन iv. मात्रात्मक एवं गुणात्मक परिवर्तन का अस्तित्व
दूर शिक्षा निदेशालय महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्य
एम.ए. हिन्दी पाठ्यक्रम MAHD010
V. सांस्कृतिक युग की दृष्टि से उसकी स्थिति क्या सांस्कृतिक दृष्टि से भी पृथक् सत्ता है ? Vi. अन्य ललित कलाओं के आधार पर उस युग की स्थिति का निर्धारण
vii. अन्य समकालीन भाषाओं में उस युग की स्थिति युग चेतना का केन्द्र कहाँ स्थित है ?
viii. उस युग का शैली वैज्ञानिक अध्ययन
इसके साथ ही देखा जाना अपेक्षित है कि एक समकालीन रचनाकार कितनी दूर तक दूसरे समकालीन रचनाकार का साझीदार है और कितनी दूर तक वह पृथक भी है। इस समानता और पृथकता के आधार पर कृति का मूल्य निर्धारित करने में सहायता मिलती है। दूसरी स्थिति यह भी देखी जानी चाहिए कि कोई विशेषता सम्पूर्ण खण्डों में पाई जा रही है या रूपान्तर के रूप में भिन्न होती जा रही है।
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