युवा: अर्थ और परिभाषा - Youth: Meaning and Definition

युवा किसी भी देश की महत्वपूर्ण पूजी में से एक होता है। आर्थिक अध्ययन बताते हैं कि 5 से 55 साल तक की उम्र में व्यक्ति उत्पादक तथा श्रम का स्रोत होता है। ऐसे में कोई भी देश यह चाहेगा कि उसके पास इस उम्र की जनसंख्या ज्यादा हो, क्योंकि व्यक्तिगत आय के रूप में इनकी सहभागिता ज्यादा होती है। जनसंख्या का यह हिस्सा बाकी तबकों (0 से 15 और 56 से आगे की उम्र वाले) का भार वहन करता है। ऐसे में इस मध्यम आयु की देश के अर्थव्यवस्था में भागीदारी काफ़ी महत्वपूर्ण मानी जाती है। राष्ट्रीय युवा नीति-2014 के अनुसार युवाओं को परिभाषित करते हुए उनकी आयु का निर्धारण 5 से 29 साल किया गया है। जनसंख्या में 15-29 वर्ष की आयु के युवा 27.5% हैं। नीति निर्माताओं को यह आशा है कि भारत 2025 तक अमेरिका, चीन, जापान के बाद वैश्विक घरेलू उत्पाद में लगभग 5.5 प्रतिशत से 6 प्रतिशत तक योगदान करने वाली विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। जहाँ एक ओर इनमें से अधिकांश देशों में श्रम शक्ति के वृद्धि होने का खतरामंडरा रहा है वहीं दूसरी और भारत में जनसांख्यिकीय रूपरेखा बहुत अनुकूल होने की आशा है। जैसे कि आँकड़े बताते है 2020 तक भारत की जनसंख्या 1.3 बिलियन से अधिक हो जाने की संभावना है जिसकी मध्यम आयु 28 वर्ष होगी, जो चीन और जापान की संभावित मध्यम आयु से काफ़ी कमहै। भारत की कामकाजी आबादी वर्ष 2020 तक बढ़कर 592 मिलियन होने की आशा है, जो केवल चीन से कम होगी (776 मिलियन), इसका अर्थ यह लागाया जा रहा है कि भारत के आर्थिक विकास में युवा महत्वपूर्ण योगदान करेंगे। इसे "जनसांख्यिकीय लाभ के रूप में देखा जाने लगा है। इस लाभको प्राप्त करने के लिए भारत को काफ़ी निवेश भी करना होगा, क्योंकि वर्तमान में युवाओं की स्थिति बड़ी खराब है। उनमें शिक्षा स्वास्थ्य, कौशल आदि को लेकर काफ़ी समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। अगर भारत को इस लाभ को प्राप्त करना है तो इस तबके को सामाजिक, शैक्षिक, स्वास्थ्य और कौशल आदि के लिए एक वातावरण उपलब्ध कराना होगा और इसके लिए उचित निर्देशों के साथ कार्यक्रमों का परिचालन करना होगा।


युवा वर्ग आर्थिक लाभ के लिए ही नहीं बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक राजनैतिक व्यवस्थाओं के लिए भी रीढ़ का काम करता है। इसलिए आर्थिक लाभ के साथ-साथ उक्त कारकों को भी युवाओं के विकास में स्थान मिलना चाहिए, क्योंकि एक स्वस्थ समाज ही आर्थिक लाभों का उचित और सुनियोजित विनिमय करता है। ऐसे में समाज कार्य की यह जिम्मेदारी है कि युवाओं को एक उन्नत मानव संसाधन के रूप में महत्व दिलाने की कोशिश करें इसके लिए सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा उनके लिए कल्याणकारी कार्यक्रमों का संचालन करे। साथ ही युवाओं में विचलन की स्थितियों में सुधार लाने के लिए निर्देशन, परामर्श की सुविधाएँ उपलब्ध कराए जिससे युवाओं का विकास हो।


युवा: अर्थ और परिभाषा - Youth: Meaning and Definition


समान्यत: युवा से तात्पर्यं लगाया जाता है कि एक ऐसा व्यक्ति जिसकी अपनी समझ विकसित हुई है या जो जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार है। ऐतिहासिक परिदृश्य में हम देखते हैं कि युवा की परिभाषा में काफ़ी उतार-चढ़ाव दिखाई देते है। हिंदू दर्शन में व्यक्ति की चार अवस्थामों का वर्णन मिलता है लेकिन उसमें कहीं भी युवा अवस्था का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता बावजूद इसके गृहस्थ आश्रम में व्यक्ति ज़िम्मेदारी लेने की स्थिति में होता है, ऐसा माना जाता था। बदलते समय में काफ़ी बदलाव आए औद्योगीकरण के कारण श्रमिकों की माँग बढ़ गई, जिसके पूर्ति के लिए स्वस्थ शरीर की आवश्यकता थी। इसकी पूर्ति के लिए बच्चों महिला और वृद्धों से ज़्यादा बेहतर श्रमिक के रूप में युवाओं की माँग थी।

किंतु नियोजक वादा मुनाफा कमाने के लिए महिला बच्चों और वृद्धों से भी काम ले रहे थे। इस शोषण के विरुद्ध न्याय की मांग हुई तब श्रमिकों के श्रम के घंटों का निर्धारण भी हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात इसमें और तेजी आई जिसमें श्रमिकों के लिए एक नियत पैमाना बन गया, जिसमें उनका आयु निर्धारण महत्त्वपूर्ण घटना थी। इसके बाद लगातार इसमें परिवर्तन दिखते हैं। इसमें से कुछ समकालीन परिवर्तन निमन्वत हैं संयुक्त राष्ट्र संघ(2013) एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है इसके अनुसार युवा 15 से 24 वर्ष तक की आयु का व्यक्ति है भारत की राष्ट्रीय युवा नीति-2014 में लिखा गया है कि युवा किसी निर्धारित आयुवर्ग से अधिक व्यापक श्रेणी है। प्राय: अनिवार्य शिक्षा छोड़ने तथा अपना पहला रोजगार पाने के बीच वाली आयु के व्यक्ति को युवा माना जाता है।" राष्ट्रीय युवा नीति-2013 में युवा को 13 से 35 वर्ष तक की आयु के व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया था, लेकिन बाद में राष्ट्रीय युवा नीति-2014 में अधिक सकेंद्रित दृष्टिकोणों को अपनाया गया, जिसमें युवा वर्ग को 15 से 29 वर्ष के रूप में परिभाषित किया गया है" साथ में यह जोड़ा गया है कि इस तथ्य को समझने कि जरूरत है कि इस आयुवर्ग में आने वाले सभी युवा व्यक्तियों का एक जैसे सरोकारों और जरूरतों वाले समान समूह मेंशामिल होना संभाव नहीं है तथा


उनकी भूमिकाएँ और उत्तरदायित्व अलग-अलग हैं मनोविज्ञान के क्षेत्र में युवा से तात्पर्य एक खास अवस्था से लगाया जाता है जिसमें विभिन्न शारीरिक परिवर्तन, सामाजिक असामजस्यता, आदि के अंतर्गत इसे दर्शाया जाता है लेकिन फिलहाल संयुक्तराष्ट्र एवं भारत की युवा नीति 2014 में रेखांकित युवा का आयु वर्ग और मनोविज्ञान के क्षेत्र में परिभाषित युवा का आयु वर्ग भिन्न भिन्न नजर आते हैं। ऐसा लगता है की नीति में युवाओं आयु वर्ग में किशोर अवस्था को भी जोड़ दिया गया है। मनोविज्ञान के क्षेत्र में किशोरावस्था से तात्पर्य 14 से 18 वर्ष की आयु वर्ग के रूप में परिभाषित किया जाता है। इस समय में व्यक्ति में अनेक प्रकार के परिवर्तन प्रदर्शित होते हैं या यूं कहें कि यह व्यक्ति के जीवन का क्रांतिकारी समय होता है जिसमें उद्विकास शिखर पर होता है। इस समय में अनेक प्रकार की परिपक्वता की ओर वह अग्रसर होता है, जैसे- शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक और व्यवहारिक आदि। यही वह समय है जब व्यक्ति का स्वविकसित होने लगता है। अपना मूल्यांकन अपने आसपास के लोगों, मित्रों के आधार पर करता है। वह अपने लिए एक आत्म अवधारणा तय कर लेता है और वैसे ही लोगों से मिलनाजुलना पसंद करता है। इस अवस्था में व्यक्तित्व प्रतिमानों का स्थिरीकरण व्यापक पैमाने पर होता है। हरलॉक ए. बी. (1955) Adolescent Development के अनुसार उन किशोरों और किशोरियों के व्यक्तित्व प्रतिमान अपेक्षाकृत अधिक उपयुक्त तथा समुचित होते हैं जो


1. लक्ष्य निर्धारण में वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण अपनाते हैं।


2. जो अपनी शक्ति तथा कमजोरियों का सही मूल्यांकन करते हैं।


3. जिनके स्व में स्थायित्व होता है।


4. जो अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट होते हैं तथा अपनी कमजोरीयों में सुधार का प्रयत्न करते हैं।


युवाओं की बुनियाद ही किशोरावस्था से शुरू होती है ऐसे में उन्हें उचित मार्गदर्शन मिलना बहुतारूरी है वरना उन में कुसमायोजन की समस्या पैदा हो सकती है। इसलिए माना जाता है कि किशोरों के मन में जो आत्म-अवधारणा है वही तय करती है कि उसका व्यक्तित्व कैसा होगा।


एरिक एरिक्सन (1963) अपनी मनोसामाजिक सिद्धांत में व्यक्ति के विकास के बारे में चर्चा करते हैं इस सिद्धांत में हम राष्ट्रीय युवा नीति 2014 में निर्धारित आयु वर्ग 15 से 29 को समझ सकते हैं। एरिक एरिक्सन अपने सिद्धांत में इस आयु वर्ग को दो वर्गों में विभाजितकरके समझाते हैं, पहली किशोर अवस्था (13 से 18) और दूसरी प्रारंभिक प्रौढ़ अवस्था ( 19 से 35) इसे हम निम्नवत समझेंगे.


1. किशोर अवस्था: इस अवस्था तक पहुंचते हुए व्यक्ति का काफ़ी विकास हो चुका होता है। ऐसे में वह अपनी पहचान बनाने एवं उसे प्रभावशालीता में तब्दील करने की आकांक्षा रखता है। इसलिए इस समय को पहचान संकट (Identity Crisis) के रूप में परिभाषित किया जाता है।


अपने लक्ष्य निर्धारित करते हुए वह उन तक पहुँच बनाने के लिए अपनी भूमिका कानिर्धारण कर व्यवहार करता है। एरिक्सन का कहना है कि जो किशोर इसमें असफल हो जाते हैं, उनमें भूमिका इंद्र एवं पहचान का संकट उभरता है। अपने आप को समायोजित न कर पाने के स्थिति में उनमें समर्पण एवं निष्ठा के विकास में अवरोध पैदा होते हैं। ऐसे में वह अनुकूल परिणाम प्राप्ति में असफल हो जाता है।


2. प्रारंभिक प्रौढ अवस्था इस अवस्था में मित्र-समूह में बढ़ोतरी हो जाती है जिसके चलते प्रतिस्पर्धा तथा सहयोग की भावना बढ़ जाती है साथ ही शारीरिक बदलाओं के कारण लैंगिकता का प्रभाव भी बढ़ता है। परिणामस्वरूप, अन्य लोगों के प्रति प्रेम की भावना मजबूत होने लगती है। इसके विपरीत निराशा, असफलता, हीनता एवं द्वंद्व होने पर एकाकीपन की प्रवृत्ति बढ़ती है व्यक्ति लोगों से दूर होने लगता है इसे अलगाव के रूप में परिभाषित किया जाता है। परिणामत उनके समायोजन का स्तर खराब हो जाता है।


अतः इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि युवा अवस्था ही वह बुनियादी अवस्था है जिसमें संवारने का मौका भी होता है तथा विचलित व्यवहार का स्रोत भी उपलब्ध होता है। यह ऐसी द्वंद्वात्मक स्थिति होती है, जिसमें उचित मार्गदर्शन महत्वपूर्ण आवश्यकता बन जाती है।